भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

हम्मीररासो १५७ कटि ग्रीव भुजा धर यों बिफरे १ । मनु काटि करे रस कृत्त हरे ॥ उड़ि रन्थ परे धर रुंड उठे। २चहुवाँन धरासह धार उठे ॥९३२॥ सिर मारत हाँक३ परे धर मैं। धर जुझत जुद्ध करै अरमैं ॥ कर जोर कटार सु अंग बहैं। बहु खंजर पंजर देह दहें ॥९३३॥ बहु रंचक४ मुष्ट कबन्ध परै५ । मल जुद्ध समृद्ध सुबीर करै ॥ पचरंग अनगिय खेत बन्यौ। बकसी६ तब साह सों बैन भन्यौ ॥९३४। भयभीत सु साह की फौज७ भगी । घमसाँन मसाँन सु ज्योति जगी ॥ परियो चकसी लखि नैन तबै । उलटो गज कीन८ सु साह जबै ॥९३५॥ इक संग उजोर९ न और नर । फिरि रोकिय१० साह अनंत भर ।॥ चहुवाँन धरम्म सु जानि कहै। यह मारत साहि सु पाप अहै ॥९३६॥ अभिषेक लिलाट कियौ इन कै। महि ईस कहावत है तिन कै११ ॥ धरि अग्र१२सु साह को पील जबै । १ बिहरे । २ बहु श्रोण धरा जु अपार उठे । ३ हक्क । ४ रंजक । ५ भरैं । ६ बकसी नृप साहि कौ आप हन्यौ । ७ सैन । ८ किन्न । ६ वजीर । १० रुक्किय । १२ विनके । १२ अग्ग । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri