हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० हम्मीररासो तुम जाँनत हो मम सकल भेव ॥९४८॥ अपबर्ग देहु तुम नाथ सिद्धि । तन छत्र धम्मे दीजे¹ प्रसिद्धि ॥ करि ध्याँन संभु निज सीस हथ्थ² । नृप तोरि कमल ज्यों किय अकथ्थ ॥६४६। यह सुनिय साह निज श्रवण बात । चलि हर मँदिर कौ साह् आत ॥ जलधार नैन लखि राव कर्म्म । कहि साहि मोहि दीनौ न मर्म ॥९५०॥ कछु दियौ हमें उपदेस नाहिं । तुम चले आप बैकुंठ माहिं ॥ तुम अभय बाँह दीनी जु सेष । जुग जुग नाँम राख्यो बिसेष ॥९५१॥ अरु महादानि तुम भए भूप । इच्छा सदाँन दीने अनूप ॥ जगदेव मोरध्वज तैं बिसेष । जस जयौ लोक तुम रक्खि सेख ॥९५२॥ वचनिका* ......आगै (अग्गै ) साह कै नीसान देखि राणी आसमती आपणा परिवार समेति परस्पर प्रहार करि खंग ( खग्ग ) प्रहार कर्च्यौ । जोहर करि देह त्यागी । सो राव हम्मीर ब्यौरो सुन्यौ और सिव कै बचन यादि कर्च्यौ । और यह निश्चय
१ दिजिय । २ मथ्थ ।
- हस्तलेख में एक पन्ने के न होने के कारण पूरी वचनिका नहीं दी जा सकी ।—संपादक CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri