हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १६१ जानी कि बर्ष चौदह १४ पूरे भए गढ़ की अवधि पूर्ण हुई तातैं यह सरीर राखनो (रख्खनो) उपहास्य है और छिन भंग सरीर कौ राखनो आछ्यौ नहीं। यह बिचारि सिव कै मंदिर गए और आप एक सेवग कनै राखि सिव कौ षोड़स प्रकार पूजन कर्यौ और यह बर्दान माँग्यौ कि हे सिव तुम ईश्वर हो। सेवक हृदय कै जाननहारे हो और सबकै प्रेरक हो तातैं हम्मीर (हमरी) यह प्रार्थना है मुक्ति दीजे तो सायुज्य दीजे। जन्म जन्म बिषैं छत्रीकुल मैं जन्म पाऊँ यह कहि कै खंग (खग्ग) आप हाथ ले कै सीस उतारचौ सिव पिंडी पै चढ़ाय दियौ तब सदाशिवजी प्रसन्न होय कै आसीर्बाद दियौ तिहारे कुल की जय होय ॥ दोहरा छंद साह कहत हम्मीर साँ, लेहु मोहि अब संग। धर्म रोति जानो सु तुम, सूर उदार अभंग ॥९५३॥ पद्धरी छंद मुसकाय सीस बोल्यौ सु बानि। तुम करो साह मम बचन कानि ॥ हम तुम सु एक जानो न और । तजि मोह देह त्यागो सु तौर ॥९५४॥ लीजे¹ सुमाँफ सागर सु जाय। तब मिलै आप² अप्पै सु आय ॥ यह कहिस सीस सुख मूँदि होत। तब साहि ग्याँन हृद भौ उदोत । ६५५॥ उठि साह सीस बदन सु कीन। करि प्रणाम संभु को ध्यान लीन ॥ १ लिजिय । २ अप्प । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri