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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

१६२ हम्मीररासो हजरत्त१ आय डेरै सु तब्ब। उज्जीर मीर बोले२ सु सब्ब ॥९५६॥ तुम जाहु सकल दिल्ली सथाँन। अलबृतहिं राज दीजे सु आँन॥ नहिं करो मोर अज्ञा सु भंग। सेवक्क धर्म्म यह है अभंग। ९५७॥ दोहरा छंद आयसु पाय सु साह की, चढ़े सकल सजि सैन। महरम खाँ उज्जीर तब, आए३ दिली सु ऐन ॥९५८॥ दयौ राज सिर छत्र धरि, अलाब्रूत्त तिहिं काल। घरि घरि अति आनंद जुत, यह बिधि प्रजा सुपाल ॥६५९॥ रणतभँवर कै खेत कौ, कीनौ सकल प्रमाँन। प्रथम हने रणधीर ने, बहुरि सेन परिवान ॥६६०॥ दोय लक्ख रूमी परे, दोऊ कुँवर उदार। सेन आरबी४ की जिती, हनी जु असी हजार ॥९६१॥ हने मीर द्वै सत सतरि, और सिकंदर साह। अट्ठ३ लक्ख खंघार कै, हने मीर निज आह ॥९६२॥ सवा सहस गजराज५ परे, दोय लख बाजि प्रसिद्ध। द्वादस लख सेना प्रबल, हनी हमीर सुसिद्ध ॥९६३॥ मस्तक राव हमीर कौ, किय६ सुमेर हर आप। मुक्ति७ द्वार सबई खुले, बिद्या बर्ष सुथाप ॥ ६४॥ छप्पय छंद बिदा कीन८ उज्जीर कूँच९ दिल्ली कौ कीनौ१०। १ हजरत्ति। २ बुले। ३ आयउ दिल्लिय ऐन। ३ अरब्बिय। ४ अष्ट। ५ गयमत्त। ६ कियौ। ७ मोक्ख द्वार सब खुल्लिये। ८ कियउ। ९ कुच्च। १० किन्नव, लिन्नव अंत्यानुप्रास। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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