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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

( ११ ) वृत्तांत कह सुनाया और उसी क्षण परिवार सहित वह दिल्ली से चल दिया। महिमाशाह जिस किसी राजा राव के पास जाता वह उसे शाह अलाउद्दीन का द्वेषी समझकर तुरंत ही अपने यहाँ से विदा कर देता। इसी प्रकार फिरते फिरते जब वह राव हम्मीर की ड्योढ़ी पर पहुँचा और उसने अपने आने की इत्तला कराई तो राव जी ने उसे बड़े ही संमानपूर्वक डेरा दिलवाया और दूसरे दिन अपने दरवार में बुलाया। दरवार में पहुँचकर महिमाशाह ने पाँच घोड़े, एक हाथी, दो मुलतानी कमान, एक तलवार, दो वाण, दो बहुमूल्य मोती और बहुत से ऊनी वस्त्र राव जी की नजर किए, जिनको राव जी ने सादर स्वीकार कर लिया। उसी समय मीर महिमाशाह ने अपनी बीती भी राव जी से निवेदन करके सविनय कहा- "मैं अल्लाउद्दीन के विरोधियों में से हूँ। यदि आपमें मेरी रक्षा करने की शक्ति हो तो शरण दीजिए अथवा मुझे भाग्य के भरोसे पर छोड़ दीजिए।" मीर के ऐसे वचन सुनकर हम्मीर ने कहा कि हे मीर मैं तुझे अभयदान देकर प्रण करता हूँ कि इस मेरे तनपिंजर में प्राण- पखेरू के रहते एक क्या सहस्रों बादशाह तेरा बाल बाँका नहीं कर सकते-यह रणथंभ का अभेद्य दुर्ग, ये अपने राजपूत वीर अथवा मैं स्वयं अपने को युद्धाग्नि में आहुति देने को प्रस्तुत हूँ परंतु तुझे न जाने दूँगा। इस प्रकार कहकर राव हम्मीर ने उसी समय मीर को पाँच लाख की जागीर का पट्टा कर दिया और तब से मीर आनंद- पूर्वक रणथंभौर के अभेद्य दुर्ग में रहने लगा। इधर वादशाह के गुप्तचरों ने उसके संमुख यह समाचार जा सुनाया जिसके सुनते ही अलाउद्दीन पूँछ कुचले हुए काले सर्प की तरह क्रोधित हो उठा; किंतु वजीर बहराम खाँ ने आगत उपद्रव के टालने अथवा मीर महिमा के पक्षपात की इच्छा से दूत को डाँटकर कहा कि जिस मीर को सात समुद्र पार भी ठिकाना देनेवाला कोई नहीं है उसे हम्मीर क्या रखेगा। इसपर दूत ने पुनः कहा कि यदि मेरी बातों में कुछ भी असत्य हो तो मैं उचित दंड पाने के लिये