हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
प्रस्तुत हूँ। दूत की ऐसी दृढ़ता देखकर अलाउद्दीन ने उसी समय आज्ञा दी कि हम्मीर को एक पत्र इस आशय का लिखा जाय कि वह मेरे अपराधी को स्थान न देवे क्योंकि अब तक वह मेरा मित्र है, न कि शत्रु। यदि वह अपने हठ से न हटे तो उसे उचित है कि वह सम्भल जाय, मैं क्षण मात्र में उसके समस्त दर्प और हठ को धूल में मिला दूँगा। अलाउद्दीन की आज्ञा पाते ही एक दूत को बहुत कुछ समझा बुझाकर रणथंभ की तरफ भेजा गया । दूत ने रणथंभ जाकर बादशाह का पत्र राव हम्मीर जी को दिया और कहा कि आप बादशाह अलाउद्दीन के बल, पुरुषार्थ और पराक्रम एवं अपने भविष्य के विषय में भी खूब सोच-विचारकर उत्तर दीजिए । इस पत्र का उत्तर राव जी ने इस प्रकार से लिखा कि मैं यह भली भाँति जानता हूँ कि आप दिल्ली के बादशाह हैं; परंतु मैं जो प्रण कर चुका हूँ, उसे अपने जीवन पर्यन्त छोड़ने का नहीं। इस- लिये उचित यही है कि आप अब मुझसे महिमाशाह के विषय में बात भी न करें, और जो कुछ आपसे बन पड़े उसके करने में विलंब भी न कीजिए। इस पत्र को पाकर बादशाह का क्रोध और भी बढ़ उठा परंतु राजमंत्रियों के समझाने-बुझाने पर उसने एक बार फिर राव हम्मीर के पास दूत भेजकर उसके मन की थाह ली। परंतु उस वीर पुरुष ने बड़े धैर्य और साहस के साथ फिर भी वही उत्तर दिया। राव हम्मीर जी के हठ और साहस के सामने बादशाह की बुद्धि भी चक्कर में पड़ गई, उसे भी अपने आगे पीछे का सोच पड़ गया। उसने विचार किया कि जब राव हम्मीर में इतना साहस है तब उसका कुछ कारण भी होगा, यदि न भी हो तो प्राण की परवाह न करनेवाले के सामने बिरले ही माई के लाल खड़े हो सकते हैं। सिंह हाथी से बहुत ही छोटा है किंतु वह अपने साहस और पुरुषार्थ ही से उसे मार डालता है। इसी प्रकार सोच विचार करते हुए बादशाह ने अपने सब दरबारियों को बुलाकर हम्मीर के हठ और अपने कर्तव्य की सूचना दी। तब उसके सब सरदारों ने जो हुजूर की ही 'हाँ'