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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

( १३ ) में 'हाँ' मिला दी, सिर्फ एक वृद्ध पुरुष ने कहा कि उस चहुआन के फेर में न पड़िए, रणथंभ पर चढ़ाई करना सहज नहीं है । परंतु वृद्धू की इस बात पर ध्यान भी न दिया गया । अलाउद्दीन ने उसी समय आज्ञा दी कि यथासंभव शीघ्र ही फौज तय्यार की जाय । बादशाह की आज्ञा पाते ही जहाँ तहाँ पत्र भेजकर सोरठ, गिरनार और पहाड़ी देशों के अनेक राजपूत सरदार बुलाए गए । तब तक इधर शाही वैतनिक फौज भी तय्यार हो गई और फौज के लिये आवश्यक रसद वरदास भी इकट्ठी हो गई । निदान इस प्रकार अरबी, काबुली, रूमी इत्यादि मुसलमान वीरों की सत्ताईस लाख जंगी फौज और अठारह लाख परिकर कुल ४५ लाख मनुष्य, ५००० हाथी और पाँच लाख घोड़ों की भीड़ भाड़ लेकर अलाउद्दीन ने रणथंभ गढ़ पर चढ़ाई करने को चैत्र मास की द्वितीया संवत् ११३८ को कूच किया । जिस समय यह शाही दल बल राव हम्मीर जी की सरहद में पहुँचा उस समय वहाँ की प्रजा में कोलाहल मच गया । अलाउद्दीन के आज्ञानुसार सब सैनिक सिपाही प्रजा को नाना प्रकार के कष्ट देने लगे । इसलिये सब लोग भाग-भागकर रणथंभ के गढ़ में शरण के लिये पुकारने लगे । इसी प्रकार निरपराधी प्रजा का खून करते हुए जब यह दल बल “नल हारणों गढ़” के किले पर पहुँचा तब वहाँ के किलेदार ने तीन दिन पर्यंत शाही फौज का मुकाबिला किया । किंतु अंत में किले पर बादशाही दखल हो गया । इसलिये यहाँ का किलेदार भी रणथंभ को दौड़ गया और उसने बादशाह के अगनित दल बल का समाचार विधिवत् राव हम्मीर जी के संमुख निवेदन किया । इस समाचार के पाते हम्मीर की बंक भृकुटी और भी टेढ़ी हो गई, कमल समान नेत्र अग्नि-शिखा से लाल हो उठे, बाहु और ओठ फड़कने लगे । रावजी का ऐसा ढंग देखकर अभयसिंह प्रमार, भूरसिंह राठौर, हरिसिंह बघेला, रणदूला चहुआन और अजमतसिंह इन पाँच सरदारों ने २०००० फौज लेकर शाही फौज को रास्ते में रोक लिया