हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
( १३ ) में 'हाँ' मिला दी, सिर्फ एक वृद्ध पुरुष ने कहा कि उस चहुआन के फेर में न पड़िए, रणथंभ पर चढ़ाई करना सहज नहीं है । परंतु वृद्धू की इस बात पर ध्यान भी न दिया गया । अलाउद्दीन ने उसी समय आज्ञा दी कि यथासंभव शीघ्र ही फौज तय्यार की जाय । बादशाह की आज्ञा पाते ही जहाँ तहाँ पत्र भेजकर सोरठ, गिरनार और पहाड़ी देशों के अनेक राजपूत सरदार बुलाए गए । तब तक इधर शाही वैतनिक फौज भी तय्यार हो गई और फौज के लिये आवश्यक रसद वरदास भी इकट्ठी हो गई । निदान इस प्रकार अरबी, काबुली, रूमी इत्यादि मुसलमान वीरों की सत्ताईस लाख जंगी फौज और अठारह लाख परिकर कुल ४५ लाख मनुष्य, ५००० हाथी और पाँच लाख घोड़ों की भीड़ भाड़ लेकर अलाउद्दीन ने रणथंभ गढ़ पर चढ़ाई करने को चैत्र मास की द्वितीया संवत् ११३८ को कूच किया । जिस समय यह शाही दल बल राव हम्मीर जी की सरहद में पहुँचा उस समय वहाँ की प्रजा में कोलाहल मच गया । अलाउद्दीन के आज्ञानुसार सब सैनिक सिपाही प्रजा को नाना प्रकार के कष्ट देने लगे । इसलिये सब लोग भाग-भागकर रणथंभ के गढ़ में शरण के लिये पुकारने लगे । इसी प्रकार निरपराधी प्रजा का खून करते हुए जब यह दल बल “नल हारणों गढ़” के किले पर पहुँचा तब वहाँ के किलेदार ने तीन दिन पर्यंत शाही फौज का मुकाबिला किया । किंतु अंत में किले पर बादशाही दखल हो गया । इसलिये यहाँ का किलेदार भी रणथंभ को दौड़ गया और उसने बादशाह के अगनित दल बल का समाचार विधिवत् राव हम्मीर जी के संमुख निवेदन किया । इस समाचार के पाते हम्मीर की बंक भृकुटी और भी टेढ़ी हो गई, कमल समान नेत्र अग्नि-शिखा से लाल हो उठे, बाहु और ओठ फड़कने लगे । रावजी का ऐसा ढंग देखकर अभयसिंह प्रमार, भूरसिंह राठौर, हरिसिंह बघेला, रणदूला चहुआन और अजमतसिंह इन पाँच सरदारों ने २०००० फौज लेकर शाही फौज को रास्ते में रोक लिया
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और वे ऐसे पराक्रम से लड़े कि बादशाही सेना के पैर उखड़ गए और बड़े बड़े अमीर उमरा जहाँ तहाँ भागने लगे। उस समय अला- उद्दीन के वजीर महिरज खाँ ने कहा—"मैने पहले ही अर्ज किया था कि एक तो राजपूत अपनी बात रखने के लिये जान देने की कभी परवाह नहीं करते, फिर भी उस पहाड़ी किले पर फतह पाना.बहुत ही मुश्किल काम है"। किंतु बादशाह ने फिर भी उसकी बात यों ही टाल दी और आगे कूच करने की आज्ञा दी। इस युद्ध में अलाउद्दीन के ३०००० सिपाही, डेढ़ सौ घोड़े और कई एक अमीर उमरा काम आए किंतु राव हम्मीर के १२५. सिपाही और १० सर्दार खेत रहे और अभयसिंह प्रमार के सीस में बहुत गहरे गहरे २१ घाव लगे। अलाउद्दीन ने रणथंभ गढ़ के पास पहुँचकर चारों तरफ से किले को घेरकर फौज का पड़ाव डाल दिया और फिर से एक दूत के हाथ पत्र भेजकर राव हम्मीर जी से कहला भेजा कि अब भी मेरे अपराधी मीर महिमाशाह को मेरे पास हाजिर करके मुझसे मिलो तो मैं तुम्हारे अपराध को क्षमा कर दूँगा। इस बार राव जी ने जो उत्तर दिया वह इस प्रकार था—"मैं जानता हूँ तू बादशाह है, परंतु मैं भी उस चहुआन कुल में से हूँ जिसने सदैव मुसलमानों के दाँत खट्टे किए हैं। ख्वाजा मीराँ पीर का एक लाख अस्सी हजार दल बल अजमेर में चहुआनों ने ही खपाया था। पुनः बीसलदेव जी ने सोन- गरा का शाका किया, उसी वंश के पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को सात बार पकड़कर छोड़ दिया। बस मैं उसी चहुआन कुल में हूँ और तू भी उसी पीर मर्द औलिया खानदान का मुसलमान है। देख अब किसकी टेक रहती है। हे यवनराज, तू निश्चय रख, मेरी टेक यह है कि सूर्य चाहे पूर्व से पश्चिम में आने लगे, समुद्र मर्यादा छोड़ दे, शेष पृथ्वी को त्याग दे, अग्नि शीतल हो जाय, परंतु राव हम्मीर का अटल प्रण नहीं टल सकता। देख अलाउद्दीन, संसार में जो जन्म लेता है वह एक दिन मरता अवश्य है; अथवा जिसकी उत्पत्ति है उसका नाश होता ही है। फिर इस क्षणभंगुर शरीर के
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लिये शरणागत को त्यागकर अपने कुल में मैं कलंक नहीं लगाना चाहता । तुझे कितना दर्प है जो अपने सामने दूसरे को वीर नहीं गिनता । इस पृथ्वी पर रावण, मेघनाद सरीखे अभिमानी और अतुल बलशाली वीर पानी के बबूले की तरह बिला गए । यवनराज ! मनुष्य नहीं रहता, परंतु उसके कर्त्तव्य की कहानियाँ अवश्य रहती हैं । अतएव अब तुझे जो सूझे सो कर । मैं भी सब तरह से तैयार हूँ ।” अलाउद्दीन के दूत को इस प्रकार उत्तर देकर राव हम्मीर जी शिवालय मे जाकर शिवार्चन करने लगे। धूप, दीप नैवेद्य संयुक्त विधिवत् पूजा करके जिस समय राव जी ध्यानमग्न थे उसी उसो समय शिवालय में आकाशवाणी हुई कि हे हम्मीर तुमसे और अला- उद्दीन से १२ वर्ष पर्य्यंत संग्राम होगा । तत्पश्चात् आषाढ़ सुदी ११ को तुम्हारा शाका पूर्ण होगा जिससे संसार में चिरकाल तक तुम्हारा यश बना रहेगा । शिव जी से इस प्रकार वरदान पाकर राव जी ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शूर वीर सरदारों को युद्ध के लिये सन्नद्ध होने की आज्ञा दी । उसी समय हम्मीर के चाचा राव रणधीर ने, जो कि “छाड़गढ़” के किले के स्वामी थे, हम्मीर से कहा कि श्रीमान् क्षमा करें इस समय मेरे हाथ देखें । इधर हम्मीर जी का पत्र पाते ही अलाउद्दीन लाल पीला सा हो उठा और उसने उसी समय रणथंभ के किले पर चारों ओर से गोले और बाणों की वर्षा करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा पाते ही मुसलमान सेनानायक मुहम्मद अली रणथंभ के अजेय दुर्ग को पाने के लिये प्रयत्न करने लगा । इधर से राव रणधीर ने भी किले की बुर्जी पर से अग्निवर्षा करने की आज्ञा दी और आप कुछ सैनिकों सहित मुसलमानी सेना में वह इस प्रकार धँस पड़ा जैसे भेड़ों के समूह में भेड़िया धँसता है । निदान पहली वरणी राव रणधीर और मुहम्मद अली की हुई जिसे राव जी ने एक ही हाथ में दो कर दिया । यह देखकर उसका पीठ-नायक अजमत खाँ राव जी के
( १६ ) संमुख आया। किंतु राव रणधीर ने उसे भी मार गिराया। अजमत खाँ के गिरते ही मुसल्मानी सेना के पैर उखड़ गए। इस युद्ध में मुसलमान सेना के अस्सी हजार अस्त्रधारी खेत रहे और राव रणधीर के केवल एक हजार जवान मारे गए। मुहम्मद मीर के मारे जाने पर जब मुसल्मानी फौज भागने लगी तब अलाउद्दीन ने वादित खाँ को सेनानायक बनाया। वादित खाँ ने बड़े धैर्य और दृढ़ता से उत्तेजनाजनक वाक्य कहकर, बिखरी हुई फौज को बटोरकर, राजपूत वीर राव रणधीर का सामना किया किंतु अंत में उसे भी भूत सेना- नायकों के भाग्य में भाग लेना पड़ा। वादित खाँ के मरते ही सारी सेना में कुहराम मच गया। अला- उद्दीन स्वयं निस्तेज होकर पोर पैगंबरों को पुकारने लगा। तब वजीर महम्मद खाँ ने कहा कि इस प्रकार संमुख युद्ध करके जय पाना तो कठिन है। इसलिये कुछ सेना यहाँ छोड़कर छाड़गढ़ के किले पर चढ़ाई की जाय। उस किले में राव रणधीर के लोग रहते हैं। निदान अपने परिवार पर भीड़ पड़ी देखकर यदि राव रणधीर शरण में आ जाय तो फिर अपनी जय होने में कोई संदेह नहीं है। निदान वजीर की बात मानकर बादशाह ने वैसा ही किया; किंतु पाँच वर्ष व्यतीत हो गया और छाड़गढ़ का किला हाथ न आया। वरन् इसी में एक नवीन बात यह निकल पड़ी कि दिन भर तो हम्मीर जी युद्ध करते और रात को रणधीर का धावा पड़ता जिससे शाहं सेना अत्यंत व्याकुल हो उठी। बड़े बड़े अमीर उमरा मिट्टी मोल मारे जाने लगे। अधिक क्या, आरंभ से अंत तक जितनी लड़ाइयाँ हुईं उन सब में राजपूत वीरों की ही जय हुई। निदान जब अलाउद्दीन की तरफ के अब्दुलकरीम, करम खाँ, यूसफ जंग इत्यादि बड़े बड़े बुद्धि- मान् योद्धा सरदार मारे गए और राव रणधीर जी तथा हम्मीर जी का बाल भी न बाँका हुआ, तब अलाउद्दीन घबरा उठा और फिर से अमीर उमरावों की सभा करके अपने उद्धार का उचित उपाय विचारने लगा।
( १७ ) इसी समय राव रणधीर जी ने हम्मीर जी से कहा कि यदि चित्तौर से दोनों कुमार बुला लिए जायँ तो अच्छा हो। इसपर राव जी ने भी “अच्छा” कह दिया। तब राव रणधीर ने रणथंभ का सब समाचार लिखकर चित्तौर भेज दिया। उक्त समाचार के पाते ही दोनों राजकुमार तीस हजार राठौर, आठ हजार चहुआन, और पाँच हजार प्रमार राजपूतों की सेना लेकर रणथंभ को चले आए। दोनों राजकुमारों को देखकर राव हम्मीर जी ने प्रसन्नता- पूर्वक उन्हें गले लगा लिया और मीर महिमा को शरण देने के कारण अलाउद्दीन से रार बढ़ जाने का हाल भी विधिवत् वर्णन कर सुनाया, जिसे सुनते ही दोनों राजकुमारों का मुख प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने वीर रस में उन्मत्त होकर मदांध मृगराज की भाँति झूमते हुए राव जी से कहा कि अब तक आपने परिश्रम किया अब तनिक हमारा भी पराक्रम देख लीजिए। यों कहकर दोनों राजकुमार रनिवास में गए। राव हम्मीर की रानी आसुमती के चरण छूकर वे बोले कि हे माता आप कृपा कर हमारे मस्तक पर मौर बाँधकर हमें युद्ध करने का आशीर्वाद दीजिए। दोनों राजकुमारों के ऐसे वचन सुनकर आसुमती ने भी सुतस्नेह से सने हुए वाक्यों से संबोधन करते हुए उन्हें कलेजे से लगा लिया और अपने हाथों उनके शीश पर मौर बाँधा और केशरी बाना पहिनाकर उन्हें युद्ध में जाने को बिदा किया। जिस समय आसुमती कुमारों का श्रृंगार कर रही थी उस समय छाड़गढ़ के किले में इस प्रकार घनघोर रव हो रहा था कि जिससे दिशाओं के दिग्पाल चौकन्ने हो रहे थे। यह खरभर देखकर अला- उद्दीन ने अपने मंत्री से पूछा कि आज छाड़गढ़ में यह उत्सव किसलिये हो रहा है। तब एक अमीर ने उत्तर दिया कि राव हम्मीर जी के छोटे भाई के पुत्रों ने स्वयं युद्ध के लिये सिर पर मौर बाँधा है। उसी के उत्सव में यह गान-वाद्य हो रहा है। यह सुनकर बाद- शाह ने जमाल खाँ को बुलाकर कहा कि तुमने ही पृथ्वीराज को कैद २
( १८ ) किया था; आज भी अगर तुम दोनों राजकुमारों को पकड़ लोगे तो मेरी अत्यंत प्रसन्नता के पात्र होगे। इस प्रकार समझा-बुझाकर उस दिन के युद्ध के लिये अलाउद्दीन ने मीर जमाल को सेनानायक बनाया। इधर से दोनों राजकुमार केसरिया बाना पहिने, सीस पर मुकुट, हाथों में रणकंकण बाँधे अपने अपने तेज तुरंगों पर सवार सोलह हजार राजपूतों की सेना के बीच में ऐसे भले मालूम देते थे मानों रणबाँकुरे देवताओं के दल में इंद्र और कुबेर सुशोभित हो रहे हों। दोनों वीर सेना सहित उज्ज्वल नेजे और खड्ग चमकाते हुए मुसलमान सेना में इस प्रकार धँस पड़े जैसे काले काले बादलों में बिजली विलीन हो जाती है। इधर अलाउद्दीन से उत्तेजित किए हुए यवन-दल ने उन राजकुमारों को घेर लिया और जमाल खाँ बड़े वेग से उन दोनों राजकुमारों पर टूटा। वे वीर राजकुमार भी बड़ी धीरता से उसका सामना करने लगे। यह देखकर राव हम्मीर जी ने वीर शंखोदर को कुमारों की सहायता के लिये भेजा। इसपर इधर से अरबी फौज का धावा हुआ। राजपूत और मुसल- मान सेना में इस प्रकार विकट मार होने लगी कि किसी को अपना बिगाना न सूझता था। इसी समय जमाल खाँ ने अपना हाथी राजकुमारों के सामने बढ़ाया। तब कुमार ने तलवार का ऐसा हाथ मारा कि एक ही हाथ में लोहे का टोप कटते हुए मीर जमाल की खोपड़ी के दो टूक हो गए। जमाल खाँ को गिरता देखकर वालन खाँ ने धावा किया। इधर से वीर शंखोदर ने बढ़कर उसका मुख रोका। निदान सायंकाल तक बराबर लोहा झरता रहा। दोनों कुमार अपनी समस्त सेना के सहित स्वर्गगामी हुए। इस युद्ध में मुसलमानी फौज के ७५००० योद्धा खेत रहे। इस प्रकार दोनों राजकुमारों के मारे जाने पर राव रणधीर ने क्रोधित होकर किले पर से आग बरसाना आरंभ कर दिया। तब बादशाह ने कहला भेजा कि आप क्यों जान-बूझकर जान देने पर उतारू हुए हैं, आपके लड़कर मर जाने से इस झगड़े का अंत न
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होगा। यदि आप राव हम्मीर जी को समझाकर मीर महिमा को मेरे पास भेजवा दें तो आप वा राव हम्मीर जी दोनों सुख से राज्य करें और हम दिल्ली चले जायँ। किंतु बादशाह के पत्र का राव रणधीर ने केवल यही उत्तर दिया कि क्षत्रियों का यह धर्म नहीं है कि विषय-सुख-भोग की लालसा अथवा मृत्यु के डर से वे अपने धारण किए हुए धर्म को त्याग दें। राव रणधीर की ओर से इस प्रकार कोरा उत्तर पाकर अलाउद्दीन ने अपनी फौज को भी छाड़ के किले पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। अलाउद्दीन की आज्ञा पाते ही मुसलमानी फौज ने टिड्डी दल की तरह उमड़कर किले को चारों ओर से घेर लिया और वे किले पर से चलते हुए गोले, गोली, बाण बर्छों की विषम बौछार की कुछ भी परवाह न करके किले पर चढ़ दौड़े। मुसलमानी सेना जब किले में धंस पड़ी तब राजपूत लोग सर्वथा प्राण का मोह छोड़कर तलवार से काम लेने लगे। दोनों में अग्न्यास्त्रों का संचालन बिल्कुल बंद हो गया। केवल तबल, तलवार, बरछी, कटार, सेल से काम लिया जाने लगा। इसी रेलापेल में बादशाह के निज पेशकार (बगली) ने राव हम्मीर की तलवार के सामने आने की हिम्मत की किंतु वीर रणधीर के एक ही वार में उसके जीवन का वारा न्यारा हो गया, इसलिये उसके सहकारी रूमी सर्दार ने अपने ५० बलवान् योद्धाओं सहित रणधीर जी को घेर लिया। राव रणधीर ने इन पचासों सिपाहियों को मारकर रूमी सर्दार को भी दो टूक कर दिया। इसी प्रकार मार काट होते हुए राव रणधीर सहित जितने राजपूत वीर उस किले में थे सबके सब मारे गए और छाड़- गढ़ का किला बादशाह के हाथ आया। इस युद्ध में शाही फौज के दो बड़े बड़े सर्दार और एक लाख रूमी सैनिक खेत रहे और राव रणधीर के साथी ३०००० राजपूत काम आए। यह छाड़गढ़ का अंतिम युद्ध चैत्र सुदी ९ शनिवार को हुआ। बीस हजार केवल राजपूत मारे गए और एक हजार राजपूती स्त्रियाँ स्वयं जलकर भस्म हो गईं।
( २० ) छाड़गढ़ का किला फतह करके अलाउद्दीन ने अपने लश्कर की बाग़ रणथंभ गढ़ की ओर मोड़ी और कुँवार सुदी ९ शनिवार को क़िले के चारों तरफ घेरा डालकर दूत के हाथ राव हम्मीर जी के पास कहला भेजा कि अब भी यदि महिमाशाह को मेरे पास भेज दो तो मैं बिना किसी रोक टोक के दिल्ली चला जाऊँ । दूत की ऐसी बातें सुनकर राव हम्मीर जी ने कहा—रे मूर्ख दूत, मैं तुझसे क्या कहूँ, तेरे स्वामी अलाउद्दीन का मुझसे बार बार ऐसा कहला भेजना उचित नहीं है। विग्रह का निर्धारण किया जाता है तो केवल इसलिये कि जिसमें बंधु बांधवों का रक्तपात न हो किंतु अब मुझे इस बात का सोच बाक़ी न रहा । राव रणधीर सा चाचा और कुलदीपक दोनों कुमार भी जब इस युद्धाग्नि में अपने प्राण होम कर चुके तब मुझे अब सोच ही किस बात का है । जा तू अपने स्वामी से कह दे कि अब कभी मेरे पास संदेसा न भेजे । दूत ने वहाँ से आकर राव जी के बचन ज्यों के त्यों बादशाह से कह सुनाए । यह सुनकर अलाउद्दीन ने उसी समय गोलंदाजों को बुलाकर हुक्म दिया कि यहाँ से ऐसा गोला मारो कि क़िले के बुर्जो पर रखी हुई तोपें ठस होकर शांत हो जायँ । गोलंदाजों ने बादशाह की आज्ञा पालन करने के लिये यथासाध्य चेष्टा की किंतु वह निष्फल हुई । साथ ही क़िले पर से उतरे हुए गोलों की मार से लश्कर की बहुत सी तोपें ठस होकर चरख पर से गिर पड़ीं । यह देखकर बादशाह की बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। वह नाना प्रकार के तर्क वितर्क करता हुआ अपने कर्तव्य पर पछताने लगा । यह देखकर उसके वज़ीर ने उसे समझाया और रात्रि को क़िले की खाई पर पुल बाँधकर क़िले पर चढ़ जाने का मत पक्का किया, किंतु पानी की बाढ़ अधिक होने के कारण मुसलमान सेना को उससे भी हारना पड़ा । तब तो बादशाह अखंड रूप से डटकर रह गया और क़िले पर आक्रमण करने के लिये उपयुक्त समय आने की प्रतीक्षा करने लगा ।
( २१ ) एक दिन राव हम्मीर जी ने किले के सबसे ऊँचे हिस्से पर सभामंडप सजाया। उस सभामंडप में सगे संबंधियों सहित बैठा हुआ राव हम्मीर ऐसा ज्ञात होता था जैसे देव- ताओं के बीच में इंद्र शोभित होता है। स्वर्ण सिंहासन पर बैठे हुए राव हम्मीर जी के संमुख चंद्रकला नामक वेश्या नृत्य कर रही थी। चंद्रकला के प्रत्येक गीत से अलाउद्दीन की अपमानसूचक ध्वनि निकलती थी। साथ ही इसके बादशाह की ओर पदाघात करके उसने ऐसा विलक्षण कटाक्ष किया कि जिसे देखकर रावजी की सब सभा में आनंद सूचक एक बड़ी भारी ध्वनि हुई। यह देखकर अलाउद्दीन से न रहा गया। तब उसने कहा कि यदि कोई इस वेश्या को बाण से मारकर राव हम्मीर के रंग में भंग कर दे तो मैं उसे बहुत कुछ पारितोषिक दूँ। यह सुनकर मीर महिमा के भाई मीर गभरू ने कहा कि मैं श्रीमान् की आज्ञा का प्रतिपालन कर सकता हूँ। किंतु स्त्री पर शस्त्र चलाना वीरों का काम नहीं है। इसीलिये उस वेश्या को जीव से न मारकर केवल उसका अहित किए देता हूँ। यों कहकर मीर गभरू ने एक ऐसा बाण मारा कि जिससे उस वेश्या के पांव में ऐसी चोट लगी कि वह तुरत लोट पोट हो गई। वेश्या को गिरते देखकर राव जी आश्चर्य और क्रोध में आकर चारों ओर देखने लगे। तब मीर ने हाथ बाँधकर अर्ज किया कि यह बाण मेरे भाई मीर गभरू का चलाया हुआ है। श्रीमान् इस पर किसी प्रकार का खेद न करें और तनिक मेरा पराक्रम देखें। यह कहकर मीर महिमाशाह ने एक ऐसा बाण मारा कि अलाउद्दीन के सिर पर से उसका मुकुट उड़ गया। यह देखकर वजीर महरमखाँ ने अलाउद्दीन से कहा कि अब यहाँ ठहरना उचित नहीं है। इस महिमा के संचालन किए हुए बाण से यदि आप बच गए तो यह उसने पहले नमक का निर्वाह किया है। यदि वह हम्मीर का हुक्म पाकर अब को जो लक्ष्य कर के बाण मारे तो आपके प्राण बचने
कठिन हैं, अतएव मेरा तो यही विचार है कि अब यहाँ से दिल्ली को कूच कर जाना ही भला है। वजीर महरमखाँ की बात मानकर बादशाह ने उसी समय कूच की तय्यारी करने की आज्ञा दी । इधर जिस समय सारे लश्कर में चला- चल का सामान हो रहा था उसी समय राव हम्मीर जी. के सामान के कोषाध्यक्ष सुरजनसिंह ने आकर बादशाह के पैरों पर शिर धर दिया और कहा कि यदि श्रीमान् मुझे छाड़गढ़ का राज्य दे देना स्वीकार करें तो मैं सहज ही में रणथंभ के अजेय दुर्ग पर आपकी फतह करवा दूँ । इस पर अलाउद्दीन ने उसे बहुत कुछ ऊँची नीची दिखाकर कहा—सुरजनसिंह यदि मैं रणथंभ पर विजय पा जाऊँ तो छाड़ का राज्य तो दूँगा ही इसके अतिरिक्त तुम्हें इस प्रकार संतुष्ट करूँगा कि जिसमें तुम्हारा मन हर तरह से राजी हो जाय । बादशाह की बातों में आकर कृतघ्न सुरजन ने रणथंभ को फतह करवाने का बीड़ा उठा लिया। उसने उसी समय राव हम्मीर जी के पास जाकर कहा कि “श्रीमान् रसद बरदाश्त और गोली बारूद के खजाने चुक गए हैं, इसलिये किले में रहकर अपने हठ एवं मान मर्यादा की रक्षा होनी कठिन है, इसलिये वचन मानकर महिमाशाह को अलाउद्दीन के पास भेजकर उससे सुलह कर लीजिए ।” सुरजन की बात पर राव हम्मीर जी ने विश्वास न किया और आप स्वयं “जौंरा भौंरा” १ ( खजाने ) के पास जाकर जाँच की तो सुरजन का कहना वास्तव में सत्य पाया। तब तो राव जी को अत्यंत शोक और आश्चर्य
१ किंतु “जौंरा, भौंरा” ( खजाने ) वास्तव में खाली नहीं हुए थे । उनमें का सब माल सोमान नीची तह में ज्यों का त्यों भरा पड़ा था। राव हम्मीर जी को धोखा देने के लिये सुरजन ने ऊपर से सूखा चमड़ा डलवा दिया था जो कि पत्थर डालने पर खड़क उठा।
( २३ ) ने दबा लिया। यह देखकर महिमाशाह ने कहा कि यदि श्रीमान् आज्ञा दें तो अब मैं स्वयं अलाउद्दीन से जा मिलूँ जिससे वह दिल्ली चला जाय। यह सुनते ही राव जी के नेत्रों से आग की चिन- गारियाँ निकलने लगीं। उन्होंने कहा—महिमाशाह् क्या फिर यह समय आवेगा ? यदि मैं तुझे शाह के पास भेजकर रणथंभ का राज भोग करूँ तो संसार मुझे क्या कहेगा ? क्या इस कायर कर्तव्य से मेरा क्षत्रिय कुल सदैव के लिये कलंकित न होगा ? अब तो जो कुछ होना था हो चुका। इधर सुरजन ने बादशाह के पास आकर कहा कि मैं एक ऐसा अद्भुत कुचक्र चला चुका हूँ कि इस समय आप जो कुछ कहेंगे राव जी तुरंत स्वीकार कर लेंगे। यह सुनकर अलाउद्दीन ने हम्मीर जी के यहाँ कहला भेजा कि वह अपनी देवल रानी की बेटी चंद्रकला को मुझे देकर मुझसे क्षमाप्रार्थी हो तो मैं उसपर दया कर सकता हूँ। यह सुनते ही राव हम्मीर जी के क्रोध और शोक का ठिकाना न रहा। उन्होंने इसके उत्तर में अलाउद्दीन के पास कहला भेजा कि यदि उसे अपनी जान प्यारी है तो चार पीरों सहित अपनी प्यारी चिमना बेगम को मेरे पास भेजकर आप दिल्ली चले जावें अन्यथा मेरे हठ को हटाने की आशा न करें। हम्मीर जी के यहाँ से इस प्रकार कड़ाचूर उत्तर पाकर बादशाह ने कुपित होकर सुरजन से कहा—क्यों रे झूठे ! तू यही कहता था कि राव हम्मीर अब आजिज आ जायगा। इस अपमान से उस दुष्ट ने कुपित होकर कहा कि अच्छा अब देखिए क्या होता है। इधर राव जी बादशाह के दूत को उपर्युक्त उत्तर देकर तन क्षीण मन मलिन शोकातुर एवं व्यग्रचित्त अवस्था में रनवास में गए और रानी जी से उक्त बीतक की वार्ता करने लगे —“हे प्रिये ! अब क्या करूँ ? क्या महिमाशाह को अलाउद्दीन के पास भेजकर ही अपनी प्रजा की रक्षा करूँ ?” रावजी के ऐसे वचन सुनकर रानी ने क्रोध, शोक, लज्जा एवं आश्चर्य्य से भरे कंठ कहा— “ हे राजन्,
( २४ ) वीरकुल-शिरोमणि ! आज आपको बादशाह से लड़ते लड़ते १२ वर्ष हो गए। आज आपको यह कुलधर्म के विरुद्ध सलाह देने वाला कौन है ? हे प्राण प्यारे यह संसार सब झूठा है, अतएव इस संसार चक्र से संचालित दुःख और सुख भी अनित्य हैं, परंतु एक मात्र कीर्ति ही ऐसी वस्तु है कि जो इस संसार के अप्रतिहत चक्र से कुचली नहीं जा सकती। हे राजन् ! अपने हाथ से शीश काटकर देनेवाले राजा जगदेव, विद्याविशारद राजा भोज, परदुःखभंजन राजा विक्रमादित्य, दानवीर कर्ण इत्यादि कोई भी इस संसार में अब नहीं हैं परंतु उनके यश की पताका अद्य तक अक्षय स्वरूप से उड़ रही है और सदा उड़ेगी। महाराज ! धन यौवन सदैव नहीं रहता; मनुष्य ही क्या, आकाश में स्थित सूर्य और चंद्रमा भी एक- रस स्थिर नहीं रहते। जीवन, मरण, सुख, दुःख यह सब होनहार ही हैं तब अपने कर्तव्य से क्यों चूकिए। श्रीमान् आप इस समय अपने पूर्व पुरुष सोमेश्वर, पृथ्वीराज, जैतराव इत्यादि की वीरता और उनकी अक्षय कीर्ति का स्मरण कीजिए और तन धन सब कुछ जाय तो जाय परंतु शरणागत महिमाशाह और अपने धर्म हठ को न जाने दीजिए।” रानी की इस प्रकार उच्च उत्तम शिक्षा सुनकर राव जी के मुखार- बिंद पर प्रसन्नता की झलक पड़ गई। उन्होंने कहा “धन्य प्रिये ! बस मैं इतना ही चाहता था, अब मैं निश्चिततापूर्वक रण में प्राण दे सकता हूँ।” इस बात के सुनते ही रानी मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी, फिर कुछ सम्हलकर मधुर स्वर से बोली—“स्वामी, आप युद्ध कीजिए मैं आपसे पहले ही शाका करूंगी।” रानी जी से इस प्रकार बातें करके राव जी ने दरबार में आकर राज्य कोष को खोलवाकर याचकों को अयाची करने की आज्ञा दी और सब राजपूत सूर सामंतों के सामने “चतुरंग” से कहा कि अब मैं अपना कर्तव्य पालन करने पर उद्यत हूँ, रणथंभ की प्रजा और राजकुमार रतन की रक्षा आप कीजिए। उत्तम होगा कि आप
( २५ ) रतन को लेकर चित्तौर चले जायें। इसपर यद्यपि चतुरंग ने आना- कानी करके अपने को भी राव जी के साथ युद्ध में शामिल रखना चाहा किंतु रावजी के आग्रह करने पर उसे वही मानना पड़ा अर्थात् ५००० सैनिकों सहित 'रतन' को लेकर वह चित्तौर की तरफ गया । जब चतुरंग अल्हणपुर तक पहुँच गए तब राव हम्मीर जी ने अपने सब सर्दारों से कहा कि "अब धर्म्म के लिये प्राण न्यौछावर करने का समय निकट आ गया है अतएव जिनको मृत्यु प्यारी हो वे मेरे साथ रहें और जिन्हें जीवन प्यारा हो वे खुशी से घर चले जायें। राव हम्मीर जी के इस प्रकार कह चुकने पर मीर महिमा- शाह ने सब सूर वीर सर्दारों की तरफ से प्रतिनिधि स्वरूप हो अर्ज किया—हे राव जी ! ऐसा कौन पुरुष कुलांगार होगा जो आपको इस समय रणथंभ में छोड़कर अपने जीवन का सुख चाहेगा। देवता, मनुष्य, शूरवीर पुरुष किसी का भी जीवन स्थिर नहीं है। एक दिन मरेंगे सब, तब फिर ऐसे सुअवसर की मृत्यु को कौन छोड़े ? मरने से सब डरते हैं, संसार में केवल सती स्त्री और शूर वीर पुरुष ही ऐसे हैं जो मृत्यु को सदैव आलिंगन करने के लिये प्रस्तुत रहते हैं एव उन्हें मृत्यु में ही आनंद आता है। दूसरे दिन अरुणोदय होते ही राव जी ने शौचादि से निश्चिंत हो गंगाजल से स्नान कर शरीर में सुगंधित गंधादि लेपन कर केसर सने पीले वस्त्र धारण किए, माथे पर रत्नजटित मुकुट बाँधा और शूर वीरों के छत्तीसों बाने (हरबे) लगाकर प्रसन्नतापूर्वक वे ब्राह्मणों को संमान सहित दान देने लगे । इधर बात की बात में राठौड़, कूरम, गौड़, तँवर, पड़िहार, पारैच, पुंडीर, चहुआन, यादव, गहिलोत, सेंगर, पँवार इत्यादि जाति के कुलीन शूर वीर राजपूत लोग अपने अपने आने बाने से सजे हुए रणरंग में रत मदमाते गयंद की भाँति आकर राव जी के पास इकट्ठे होने लगे। उन आगत शूर वीर राजपूतों के माथे पर टेढ़ी पगड़ी, ललाट में केशर सौंधे गंध की त्रिपुंड, गले में तुलसी और रुद्राक्ष की माला, सिर पर लोहे के टोप,
( २६ ) शरीर पर झिलम-बख्तर, हाथों में दस्ताने, और यथा अंग छत्तीसों बाने सजे हुए थे। वे वीर योद्धा लोग साक्षात् शिव के गण से सुशो- भित होते थे। इधर तो इन सब शूर वीरों सहित राव जी गणेश, शिव, भगवती इत्यादि देवताओं का पूजन और परिक्रमा कर रहे थे उधर राजमहल के द्वार पर मेघ के समान बड़े दुरद दंतारे मत्तवारे हाथियों और वायु के वेग को उल्लंघन करनेवाले घोड़ों का घमासान जम रहा था। सूर्य निकलते निकलते राव हम्मीर जी अपने वीर योद्धाओं सहित इष्टदेव का स्मरण करते हुए राजमहल से बाहर हुए। राव जी के आते ही सब सेना व्यूहबद्ध हो गई। सबसे आगे फड़वाली साक्षात् काल की सी बिकराल कालिका का अवतार तोपें, उनके पीछे हथनार ऊँटनार जंबूर, तिनके पीछे हाथी, तिनके पीछे ऊँट, घड़मवार और फिर तुबकदार पैदल इत्यादि थे। उस समय बाल सूर्य की सुनहरी किरणों के पड़ने से सब साज बाज मे सुसज्जित चंचल घोड़े और गंधमय गंडस्थलवाले मतवाले हाथी बड़े ही भले मालूम होते थे। जिस समय राव जी की सवारी संपूर्ण रूप से सुसज्जित हो गई तो नौबत, नगाड़े, शंख, सहनाई, रणतूर, श्रृंगी, डफ इत्यादि रण-वाद्य बजने लगे, कड़खैत उच्च स्वर मे कड़खे गा-गाकर महज कठोरहृदय शूर वीरों के चित्त को उत्कर्ष देने लगे। इधर ये शूर वीर लोग उमंग में भरे हुए आगे बढ़ते जाते थे उधर आकाश में अप्सराओं के वृंद इस समर में शत्रु के संमुख प्राण को परित्याग करनेवाले वीरों को अपने हृदय का हार बनाने के लिये आकाश मार्ग से आ रही थीं। जिस प्रकार ये वीर लोग इधर झिलम, टोप, बख्तर, दस्ताने, कलगी, तुर्रा, सरपेच, तीर, तुबक, तेगा, तलवार, तबल, तोमर, तौरा नेत, बरछी, बिछुआ, बाँका, छुरी, पिस्तौल, पेश- कब्ज, कटार, परिघ, फरसा, दाब इत्यादि अस्त्र शस्त्र से सजे हुए थे उसी प्रकार उस तरफ सर्वांगसुंदरी नवयौवना अप्सराएँ भी सीसफूल, दावनी, आड़, ताटंक, हार, बाजूबंद, जोसन, पहुँची, पाजेब इत्यादि गहने और नाना प्रकार की रंग बिरंगी कंचुकी, चोली, चौबंद
इत्यादि वस्त्रों को धारण किए हुए आकाश-मार्ग में स्थित थीं। इस प्रकार जंग-रंगराते मद्माते राजपूत इधर से बढ़े और उधर से इसी तरह वाणों की बौछार करती हुई मुसलमान सेना भी पहाड़ों की कंदराओं में से टिड्डी सी निकल पड़ीं। दोनों सेनाओं में प्रथम तो धुँआधार तोप, तुवक, मौका, पिस्तौल इत्यादि अग्न्यास्त्रों से वर्षा हुई, परंतु जब वीरत्व के उत्साह से प्रोत्साहित हुई दोनों सेनाएँ समुद्र की तरह उमड़कर एक दुसरे से खिल्तमिल्त हो गईं उस समय एकदम तेगा, तलवार, तबल, छुरी, बिछुवा, कटार, गुर्ज, फर्सा इत्यादि की मार होने लगी। क्षण मात्र में वह आमोदमय रणभूमि साक्षात् करुणा और वीभत्स रस का समुद्र हो गई। जहाँ तहाँ घायल और मृतक शूर वीर सिपाहियों के शवों के ढेर के ढेर नजर आते थे। मृतक हाथी, घोड़ों के शव जहाँ तहाँ चट्टानों से दीखते थे और बहुतेरे नर-देह-रक्त की नदी में जहाँ तहाँ बहे जाते थे। उन पर बैठकर मांस भक्षण करते हुए कौवे, चील्ह, गिद्ध, कुही, बाज, कुर्रा और शृगाल इत्यादि जंतु अत्यंत भयानक रव मचाते थे। इस प्रकार कठिन मार मचने पर मुसलमान सेना के पैर उखड़ पड़े। यह देखकर वादशाह ने अपनी सेना को ललकारते हुए वजीर से कहा कि अब क्या किया जाय । तब वजीर ने कहा कि इस समय अपनी सेना की चार अनी करके प्रत्येक का भार दीवान, बाँके बगसी, मैं और आप स्वयं लेकर चार तरफ से आक्रमण करें, तब ठीक होगा। वादशाह ने उसकी संमति मानकर वैसा ही किया। इस बार उपयुक्त व्यूहबद्ध होने के कारण मुसलमान सेना ने बड़ी वीरता दिखाई। बादशाह ने पुकारकर कहा कि मेरा जो उमराव हम्मीर को पकड़कर लावेगा उसको बारह हजार की जागीर और दरबार में सबसे बड़ा मंसब मिलेगा। यह सुनकर अब्दुल नामक एक उमराव अपनी सेना सहित बड़े वेग से आगे बढ़ा। इधर राजपूत सेना ने उसके रोकने का यथासाध्य प्रयत्न किया, इस होड़ हौस में बड़ी कड़ी मार हुई, दोनों ओर के कई कमंद खड़े हुए। जब राव जी की तरफ़
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के २०० सवार, तीस हाथी और ६०० वीर जोधा काम आ चुके तब शेख महिमाशाह ने राव हम्मीर को सिर नवाकर कहा कि श्रीमान् अब बहुत हुआ। अब जरा मेरा भी पराक्रम देखिए। यह कहता हुआ वह बीच समरभूमि में आ खड़ा हुआ और बादशाह को संबोधन करके बोला—मैं महिमाशाह जो आपका अपराधी हूँ यह खड़ा हूँ अब पकड़ते क्यों नहीं ! अथवा जो कुछ करना हो करते क्यों नहीं ? अब अपनी इच्छा को पूर्ण कीजिए। महिमाशाह के ऐसे सगर्व वचन सुनकर अलाउद्दीन ने खुरासान खाँ की ओर देखकर कहा कि जो कोई इस शेख को जीवित पकड़ लावेगा उसे तीस हजार की जागीर, बारह हजारी मंसब, नौबत निशान और एक तलवार दूँगा। इस पर सड़की फौज के साथ इधर से खुरासान खाँ और राव हम्मीर की जय जयकार बोलते हुए उधर से महिमाशाह ने एक दूसरे पर आक्रमण किया। बादशाह ने अपनी सेना को उत्तेजित करने के लिये कहा इसको शीघ्र पकड़ो। शेख और खुरासान की सेना अनी तो एक दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगी और इधर ये दोनों वीर स्वयं आमने सामने जुटकर एक मात्र खङ्ग के सहारे पर खेलने लगे। अंत में महिमाशाह ने खुरासान खाँ को मार गिराया और उसके निशान इत्यादि ले जाकर राव जी को नजर किए। महिमाशाह ने राव हम्मीर जी के संमुख खड़े होकर कहा—हे शरणागत प्रणरक्षक वीर चहुआन, आपको धन्य है। आप राज्य, परिवार, स्त्री और सब राजसी वैभवों को तिलांजलि देकर जो एक मात्र मेरी रक्षा करने के लिये अपने हठ से न हटे यह अचल कीर्ति आपकी इस संसार में सनातन स्थिर रहेगी। उसने आँसू भर कहा—“हाय ! अब वह समय कब आवेगा कि मैं पुनः अपनी माता के गर्भ से जन्म धारण कर आपसे फिर मिलूँ।” यह सुनकर राव जी ने कहा हे वीर मीर, अधीर मत हो। जीवन मरण यह संसार का काम ही है इस विषय का पश्चात्ताप ही क्या ? फिर हम तुम तो एक ही अंश के अवतार हैं तो हम आप अवश्य एक ही
( २६ ) में लीन होंगे अतएव इन निःसार बातों का विचार करना तो वृथा ही है परंतु यह अवश्य है कि मनुष्य देह धारण कर इस प्रकार कीर्ति संपादन करने का समय कठिनता से प्राप्त होता है। राव हम्मीर जी के उपर्युक्त वक्तव्य का अंत होते ही वीरोचित उत्कर्ष से भरा हुआ मीर महिमाशाह रणक्षेत्र के मध्य में आ उप- स्थित हुआ । उसकी वरनी पर इधर से उसका छोटा भाई मीर गभरू उसके सामने जा जुटा। जिस समय ये दोनों वीर बांधव एक दूसरे पर प्रहार करने को थे कि अलाउद्दीन ने हँसकर कहा "मीर महिमा- शाह मैं सच्चे दिल से तेरी तारीफ करता हूँ। जिस वक्त से तूने दिल्ली छोड़ी उस वक्त से आज तक मुझको सिर न झुकाया, बस अब तुम खुशी से मेरे पास चले आओ मैं तुम्हारा कुसूर माफ करता हूँ और यह बेगम भी तुमको देना कबूल करता हूँ। साथ ही इसके गोरखपुर का परगना जागीर में दूँगा।" इस पर महिमाशाह ने मुस्कराते हुए सहज स्वभाव से उत्तर दिया कि अब आपका यह कहना वृथा है, आप जरा उन बातों का ख्याल भी तो कीजिए जो आपने उस समय कही थीं । यदि अब फिर से भी उसी माता की कुक्षि से जन्म लूँ तब भी राव जी को नहीं छोड़नेवाला हूँ। मीर महिमाशाह को बादशाह से बातें करते देखकर राव जी ने कुमक भेजी। इधर मीर गभरू ने भी कहा कि हे भाई, अब वृथा की दंत कथाओं के क्रंदन करने से क्या लाभ है, आओ इस सुअवसर पर हम और आप दोनों अपने अपने धर्म को पालन करते हुए स्वर्ग की सीढ़ी पर पैर देवें। यह कहते हुए दोनों भाई अपने अपने स्वामियों की जयकार मनाते हुए एक दूसरे से जुट पड़े। मीर गभरू ने अपने बड़े भाई महिमाशाह के पैर छूकर कहा "अब मुझे आज्ञा हो।" इसके उत्तर में महिमाशाह ने कहा कि "स्वामिधर्म पालन में दोष ही क्या है ?" पहले तो दोनों भाई परस्पर खङ्ग से लड़ते रहे किंतु जब बहुत देर हो गई तब दोनों अपने अपने घोड़ों पर से उतरकर परस्पर द्वंद्व युद्ध में प्रवृत्त हुए, और दोनों सेनाओं के देखते
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ही दोनों वीर भाई स्वर्ग को सिधारे। जब महिमाशाह मारा जा चुका तब अलाउद्दीन ने राव हम्मीर जी से कहा कि अब आप युद्ध न कीजिए; मैं आपकी अक्षय वीरता से अत्यंत प्रसन्न होकर आपको अपनी तरफ से पाँच परगने और देना स्वीकार करता हूँ और यह भी प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मेरे रहते आप स्वच्छंदतापूर्वक रणथंभ का राज्य कीजिए। इसके उत्तर में हम्मीर जी ने कहा कि अब आपका यह विचार केवल विडंबना है। अब जो कुछ भविष्य में होगा वही होगा, मैं इस क्षणभंगुर जीवन की अभिलाषा वा राज्यसुख के लोभ से अक्षय कीर्ति को त्यागनेवाला नहीं हूँ। रावण, दुर्योधन आदि वीरों ने कीर्ति के लिये ही तन को तिनका सा त्याग दिया, हम तुम दोनों एक ही पद्म ऋषि के अंश से उत्पन्न हैं, अतएव अब यही उचित है कि इस सुअवसर पर समर भूमि में अनित्य शरीर को विसर्जन करके हम आप स्वर्ग में सदैव के लिये सहवास करें। राव जी के ऐसे वचन सुनकर अलाउद्दीन ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। उधर से राजपूत सेना भी प्राण का मोह छोड़कर मदोन्मत्त मातंग की तरह मुसलमानों से जंग करने को वीरत्व के उमंग में भरी हुई उमड़ पड़ी। जिस समय दसों दिग्गजों के हृदय को कंपायमान करनेवाले रणवाद्यों को बजाती हुई दोनों सेनाएँ परस्पर मिल रही थीं उसी समय भोज नामक भीलों के सरदार ने राव जी से अपने हरावल में होने की आज्ञा माँगी। रावजी ने कहा कि तुम चित्तौर की रक्षा करो। इसपर उसने उत्तर दिया कि मुझे श्रीमान् की आज्ञा मानने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, परंतु मैंने जो आजन्म श्रीमान् की चरण-सेवा की है वह इसी अवसर के लिये; अतएव अब मुझे आज्ञा हो क्योंकि मैं अपने कर्त्तव्य के ऋण से उऋण होऊँ। यों कहकर भोजराज अपनी भोल सेना सहित आगे बढ़ा। उधर से मीर सिकंदर हरावल में हुआ। मुसल- मान सेना से तोप की गुरांवें छूटती थीं और भील तीरों की वर्षा
( ३१ ) करते थे। इसी समय भोजराज और सिकंदर का मुकाबला हुआ। इधर से भोजराज ने सिकंदर पर कटार का वार किया और उसने तलवार चलाई, निदान दोनों वीर एक ही समय धराशायी हुए। इस युद्ध में भोजराज के साथवाले दो हजार भील और सिकंदर की तरफ के तीस हजार कंधारी योद्धा काम आए और शाही सेना भाग उठी। उसी समय राव हम्मीर जी ने भोजराज की लाश के पास हाथी जा डटाया और उस वीर के मृतक शव को देखकर राव जी ने आँसुओं से नेत्र डबडबाई हुई अवस्था में कहा—धन्य हो वीरवर ! तुमने स्वामिसेवा में प्राण देकर अतुलित कीर्ति को संपादन किया। राव जी को रणक्षेत्र के बीच अचल भाव से स्थित देखकर अला- उद्दीन ने अपने भागते हुए वीरों से कहा—"रे मूर्ख मनुष्यो, तुमने जिस मेरे कारण आजन्म आनंद से जीविका निर्वाह की, अहर्निश आनंद आमोद में व्यतीत किए, आज तुम्हें लड़ाई का मैदान छोड़कर भागते हुए शरम नहीं आती।" इतना सुनते ही मुसलमान सेना भूखे बाघ या फुफकारते हुए सर्प की तरह लौट पड़ी। यहाँ राजपूत तो सदैव प्राण हथेली पर रखे हुए थे, दोनों में इस तरह कड़ाचूर मार पड़ी कि रणभूमि में रक्त की नदी बह निकली, उस वेग से बहती हुई शोणित सरिता में जहाँ तहाँ पड़े हुए हाथियों के शव वास्तविक चट्टानों से भासित होते थे, वीरों के हाथ पाँव जंघा इत्यादि कटे हुए अवयव जलचर जीव से तैरते ज्ञात होते थे, वीरों के सचिक्कन केश सिवार और ढाल कच्छप सी प्रतीत होती थी, नव युवा वीरों के कटे हुए मस्तक कमल से और उनके आरक्त बड़े बड़े नेत्र खंजन से खिलते हुए नजर आते थे। इस पसर में ७५ हाथी, सवा लाख घोड़े, ७०० निशानवाले और अगनित योद्धा काम आए। सिकंदर शाह, शेर खाँ, मरहम खाँ, मोहब्बत खाँ, मुदफ्फर या मुजफ्फर खाँ, नूर खाँ, निजाम खाँ इत्यादि मुसल- मान वीर मारे गए और राव जी की तरफ के भी नामी नामी चार सौ योद्धा खेत रहे।
( ३२ ) इसी मारामार में राव हम्मीर जी ने अपने हाथी को अलाउद्दीन के संमुख डटाए जाने की आज्ञा दी और कहला भेजा कि अबतक वृथा ही रक्त प्रवाह हुआ है अब आइए हमारा आपका द्वंद्व युद्ध हो और सब द्वंद्व समाप्त हो । राव जी का यह सँदेसा सुनकर अलाउद्दीन ने मंत्री से पूछा कि अब क्या करें । तब मंत्री ने उत्तर दिया कि उस चहुआन के बल प्रताप एवं पराक्रम से आप अपरिचित नहीं हैं अतएव मेरे विचार में तो यही आता है कि अब आप संधि कर लें तो सर्वथा भला है । निदान अलाउद्दीन ने वजीर की बात मानकर हम्मीर जी के पास संधि का प्रस्ताव भेजा परंतु उस वीर हम्मीर ने उत्तर दिया कि युद्धस्थल में उपस्थित होकर मित्रता का प्रस्ताव करना भला कौन सी नीति और बुद्धिमत्ता का काम है ! शत्रु के संमुख विनती करना नितांत कातरता अथवा दंभमय चतुरता का पता देता है । बादशाह के दूत को इस प्रकार नीतियुक्त उत्तर देकर राव जी ने अपने राजपूत वीरों को आज्ञा दी कि "हे वीरवर योद्धाओ, अब मेरी यही इच्छा है कि आप तोप, बाण, हथनार, चादर, जंबूर, बंदूक, तमंचा, बरछा, सेल, साँग इत्यादि हथियारों को त्यागकर केवल तलवार, छुरी, कटारी और विषाण से काम लो अथवा मल्लयुद्ध द्वारा ही अपने पराक्रम का परिचय देते हुए स्वर्ग की सीढ़ी पर पैर दो । साथ ही मेरी यह भी आज्ञा है कि बादशाह को न मारना ।" राव जी के इतना कहते ही राजपूत रावत, महावत से हकारे हुए हाथी की तरह अपने अपने उज्ज्वल शस्त्रों को चमकाते हुए चल पड़े । क्षुधित मृगराज की भाँति रणबाँकुरे राजपूतों का वेग मुसल- मानी सेना क्षण भर न सह सकी और बड़े बड़े सैनिक अमीर उमरा भेड़ की भाँति भाग उठे । राजपूत सेना ने अलाउद्दीन के हाथी को घेर लिया और उसे रावहम्मीर जी के संमुख ले आए । राव जी ने विह्वल हुए बादशाह को देखकर अपने सरदारों से कहा कि यह पृथ्वी-