हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ ) करते थे। इसी समय भोजराज और सिकंदर का मुकाबला हुआ। इधर से भोजराज ने सिकंदर पर कटार का वार किया और उसने तलवार चलाई, निदान दोनों वीर एक ही समय धराशायी हुए। इस युद्ध में भोजराज के साथवाले दो हजार भील और सिकंदर की तरफ के तीस हजार कंधारी योद्धा काम आए और शाही सेना भाग उठी। उसी समय राव हम्मीर जी ने भोजराज की लाश के पास हाथी जा डटाया और उस वीर के मृतक शव को देखकर राव जी ने आँसुओं से नेत्र डबडबाई हुई अवस्था में कहा—धन्य हो वीरवर ! तुमने स्वामिसेवा में प्राण देकर अतुलित कीर्ति को संपादन किया। राव जी को रणक्षेत्र के बीच अचल भाव से स्थित देखकर अला- उद्दीन ने अपने भागते हुए वीरों से कहा—"रे मूर्ख मनुष्यो, तुमने जिस मेरे कारण आजन्म आनंद से जीविका निर्वाह की, अहर्निश आनंद आमोद में व्यतीत किए, आज तुम्हें लड़ाई का मैदान छोड़कर भागते हुए शरम नहीं आती।" इतना सुनते ही मुसलमान सेना भूखे बाघ या फुफकारते हुए सर्प की तरह लौट पड़ी। यहाँ राजपूत तो सदैव प्राण हथेली पर रखे हुए थे, दोनों में इस तरह कड़ाचूर मार पड़ी कि रणभूमि में रक्त की नदी बह निकली, उस वेग से बहती हुई शोणित सरिता में जहाँ तहाँ पड़े हुए हाथियों के शव वास्तविक चट्टानों से भासित होते थे, वीरों के हाथ पाँव जंघा इत्यादि कटे हुए अवयव जलचर जीव से तैरते ज्ञात होते थे, वीरों के सचिक्कन केश सिवार और ढाल कच्छप सी प्रतीत होती थी, नव युवा वीरों के कटे हुए मस्तक कमल से और उनके आरक्त बड़े बड़े नेत्र खंजन से खिलते हुए नजर आते थे। इस पसर में ७५ हाथी, सवा लाख घोड़े, ७०० निशानवाले और अगनित योद्धा काम आए। सिकंदर शाह, शेर खाँ, मरहम खाँ, मोहब्बत खाँ, मुदफ्फर या मुजफ्फर खाँ, नूर खाँ, निजाम खाँ इत्यादि मुसल- मान वीर मारे गए और राव जी की तरफ के भी नामी नामी चार सौ योद्धा खेत रहे।