हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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ही दोनों वीर भाई स्वर्ग को सिधारे। जब महिमाशाह मारा जा चुका तब अलाउद्दीन ने राव हम्मीर जी से कहा कि अब आप युद्ध न कीजिए; मैं आपकी अक्षय वीरता से अत्यंत प्रसन्न होकर आपको अपनी तरफ से पाँच परगने और देना स्वीकार करता हूँ और यह भी प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मेरे रहते आप स्वच्छंदतापूर्वक रणथंभ का राज्य कीजिए। इसके उत्तर में हम्मीर जी ने कहा कि अब आपका यह विचार केवल विडंबना है। अब जो कुछ भविष्य में होगा वही होगा, मैं इस क्षणभंगुर जीवन की अभिलाषा वा राज्यसुख के लोभ से अक्षय कीर्ति को त्यागनेवाला नहीं हूँ। रावण, दुर्योधन आदि वीरों ने कीर्ति के लिये ही तन को तिनका सा त्याग दिया, हम तुम दोनों एक ही पद्म ऋषि के अंश से उत्पन्न हैं, अतएव अब यही उचित है कि इस सुअवसर पर समर भूमि में अनित्य शरीर को विसर्जन करके हम आप स्वर्ग में सदैव के लिये सहवास करें। राव जी के ऐसे वचन सुनकर अलाउद्दीन ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। उधर से राजपूत सेना भी प्राण का मोह छोड़कर मदोन्मत्त मातंग की तरह मुसलमानों से जंग करने को वीरत्व के उमंग में भरी हुई उमड़ पड़ी। जिस समय दसों दिग्गजों के हृदय को कंपायमान करनेवाले रणवाद्यों को बजाती हुई दोनों सेनाएँ परस्पर मिल रही थीं उसी समय भोज नामक भीलों के सरदार ने राव जी से अपने हरावल में होने की आज्ञा माँगी। रावजी ने कहा कि तुम चित्तौर की रक्षा करो। इसपर उसने उत्तर दिया कि मुझे श्रीमान् की आज्ञा मानने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, परंतु मैंने जो आजन्म श्रीमान् की चरण-सेवा की है वह इसी अवसर के लिये; अतएव अब मुझे आज्ञा हो क्योंकि मैं अपने कर्त्तव्य के ऋण से उऋण होऊँ। यों कहकर भोजराज अपनी भोल सेना सहित आगे बढ़ा। उधर से मीर सिकंदर हरावल में हुआ। मुसल- मान सेना से तोप की गुरांवें छूटती थीं और भील तीरों की वर्षा