हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३ ) ने दबा लिया। यह देखकर महिमाशाह ने कहा कि यदि श्रीमान् आज्ञा दें तो अब मैं स्वयं अलाउद्दीन से जा मिलूँ जिससे वह दिल्ली चला जाय। यह सुनते ही राव जी के नेत्रों से आग की चिन- गारियाँ निकलने लगीं। उन्होंने कहा—महिमाशाह् क्या फिर यह समय आवेगा ? यदि मैं तुझे शाह के पास भेजकर रणथंभ का राज भोग करूँ तो संसार मुझे क्या कहेगा ? क्या इस कायर कर्तव्य से मेरा क्षत्रिय कुल सदैव के लिये कलंकित न होगा ? अब तो जो कुछ होना था हो चुका। इधर सुरजन ने बादशाह के पास आकर कहा कि मैं एक ऐसा अद्भुत कुचक्र चला चुका हूँ कि इस समय आप जो कुछ कहेंगे राव जी तुरंत स्वीकार कर लेंगे। यह सुनकर अलाउद्दीन ने हम्मीर जी के यहाँ कहला भेजा कि वह अपनी देवल रानी की बेटी चंद्रकला को मुझे देकर मुझसे क्षमाप्रार्थी हो तो मैं उसपर दया कर सकता हूँ। यह सुनते ही राव हम्मीर जी के क्रोध और शोक का ठिकाना न रहा। उन्होंने इसके उत्तर में अलाउद्दीन के पास कहला भेजा कि यदि उसे अपनी जान प्यारी है तो चार पीरों सहित अपनी प्यारी चिमना बेगम को मेरे पास भेजकर आप दिल्ली चले जावें अन्यथा मेरे हठ को हटाने की आशा न करें। हम्मीर जी के यहाँ से इस प्रकार कड़ाचूर उत्तर पाकर बादशाह ने कुपित होकर सुरजन से कहा—क्यों रे झूठे ! तू यही कहता था कि राव हम्मीर अब आजिज आ जायगा। इस अपमान से उस दुष्ट ने कुपित होकर कहा कि अच्छा अब देखिए क्या होता है। इधर राव जी बादशाह के दूत को उपर्युक्त उत्तर देकर तन क्षीण मन मलिन शोकातुर एवं व्यग्रचित्त अवस्था में रनवास में गए और रानी जी से उक्त बीतक की वार्ता करने लगे —“हे प्रिये ! अब क्या करूँ ? क्या महिमाशाह को अलाउद्दीन के पास भेजकर ही अपनी प्रजा की रक्षा करूँ ?” रावजी के ऐसे वचन सुनकर रानी ने क्रोध, शोक, लज्जा एवं आश्चर्य्य से भरे कंठ कहा— “ हे राजन्,