भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

( २४ ) वीरकुल-शिरोमणि ! आज आपको बादशाह से लड़ते लड़ते १२ वर्ष हो गए। आज आपको यह कुलधर्म के विरुद्ध सलाह देने वाला कौन है ? हे प्राण प्यारे यह संसार सब झूठा है, अतएव इस संसार चक्र से संचालित दुःख और सुख भी अनित्य हैं, परंतु एक मात्र कीर्ति ही ऐसी वस्तु है कि जो इस संसार के अप्रतिहत चक्र से कुचली नहीं जा सकती। हे राजन् ! अपने हाथ से शीश काटकर देनेवाले राजा जगदेव, विद्याविशारद राजा भोज, परदुःखभंजन राजा विक्रमादित्य, दानवीर कर्ण इत्यादि कोई भी इस संसार में अब नहीं हैं परंतु उनके यश की पताका अद्य तक अक्षय स्वरूप से उड़ रही है और सदा उड़ेगी। महाराज ! धन यौवन सदैव नहीं रहता; मनुष्य ही क्या, आकाश में स्थित सूर्य और चंद्रमा भी एक- रस स्थिर नहीं रहते। जीवन, मरण, सुख, दुःख यह सब होनहार ही हैं तब अपने कर्तव्य से क्यों चूकिए। श्रीमान् आप इस समय अपने पूर्व पुरुष सोमेश्वर, पृथ्वीराज, जैतराव इत्यादि की वीरता और उनकी अक्षय कीर्ति का स्मरण कीजिए और तन धन सब कुछ जाय तो जाय परंतु शरणागत महिमाशाह और अपने धर्म हठ को न जाने दीजिए।” रानी की इस प्रकार उच्च उत्तम शिक्षा सुनकर राव जी के मुखार- बिंद पर प्रसन्नता की झलक पड़ गई। उन्होंने कहा “धन्य प्रिये ! बस मैं इतना ही चाहता था, अब मैं निश्चिततापूर्वक रण में प्राण दे सकता हूँ।” इस बात के सुनते ही रानी मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी, फिर कुछ सम्हलकर मधुर स्वर से बोली—“स्वामी, आप युद्ध कीजिए मैं आपसे पहले ही शाका करूंगी।” रानी जी से इस प्रकार बातें करके राव जी ने दरबार में आकर राज्य कोष को खोलवाकर याचकों को अयाची करने की आज्ञा दी और सब राजपूत सूर सामंतों के सामने “चतुरंग” से कहा कि अब मैं अपना कर्तव्य पालन करने पर उद्यत हूँ, रणथंभ की प्रजा और राजकुमार रतन की रक्षा आप कीजिए। उत्तम होगा कि आप

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास) · पृष्ठ 38, कुल 258 में से · BharatKosha