भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

( २३ ) ने दबा लिया। यह देखकर महिमाशाह ने कहा कि यदि श्रीमान् आज्ञा दें तो अब मैं स्वयं अलाउद्दीन से जा मिलूँ जिससे वह दिल्ली चला जाय। यह सुनते ही राव जी के नेत्रों से आग की चिन- गारियाँ निकलने लगीं। उन्होंने कहा—महिमाशाह् क्या फिर यह समय आवेगा ? यदि मैं तुझे शाह के पास भेजकर रणथंभ का राज भोग करूँ तो संसार मुझे क्या कहेगा ? क्या इस कायर कर्तव्य से मेरा क्षत्रिय कुल सदैव के लिये कलंकित न होगा ? अब तो जो कुछ होना था हो चुका। इधर सुरजन ने बादशाह के पास आकर कहा कि मैं एक ऐसा अद्भुत कुचक्र चला चुका हूँ कि इस समय आप जो कुछ कहेंगे राव जी तुरंत स्वीकार कर लेंगे। यह सुनकर अलाउद्दीन ने हम्मीर जी के यहाँ कहला भेजा कि वह अपनी देवल रानी की बेटी चंद्रकला को मुझे देकर मुझसे क्षमाप्रार्थी हो तो मैं उसपर दया कर सकता हूँ। यह सुनते ही राव हम्मीर जी के क्रोध और शोक का ठिकाना न रहा। उन्होंने इसके उत्तर में अलाउद्दीन के पास कहला भेजा कि यदि उसे अपनी जान प्यारी है तो चार पीरों सहित अपनी प्यारी चिमना बेगम को मेरे पास भेजकर आप दिल्ली चले जावें अन्यथा मेरे हठ को हटाने की आशा न करें। हम्मीर जी के यहाँ से इस प्रकार कड़ाचूर उत्तर पाकर बादशाह ने कुपित होकर सुरजन से कहा—क्यों रे झूठे ! तू यही कहता था कि राव हम्मीर अब आजिज आ जायगा। इस अपमान से उस दुष्ट ने कुपित होकर कहा कि अच्छा अब देखिए क्या होता है। इधर राव जी बादशाह के दूत को उपर्युक्त उत्तर देकर तन क्षीण मन मलिन शोकातुर एवं व्यग्रचित्त अवस्था में रनवास में गए और रानी जी से उक्त बीतक की वार्ता करने लगे —“हे प्रिये ! अब क्या करूँ ? क्या महिमाशाह को अलाउद्दीन के पास भेजकर ही अपनी प्रजा की रक्षा करूँ ?” रावजी के ऐसे वचन सुनकर रानी ने क्रोध, शोक, लज्जा एवं आश्चर्य्य से भरे कंठ कहा— “ हे राजन्,

( २४ ) वीरकुल-शिरोमणि ! आज आपको बादशाह से लड़ते लड़ते १२ वर्ष हो गए। आज आपको यह कुलधर्म के विरुद्ध सलाह देने वाला कौन है ? हे प्राण प्यारे यह संसार सब झूठा है, अतएव इस संसार चक्र से संचालित दुःख और सुख भी अनित्य हैं, परंतु एक मात्र कीर्ति ही ऐसी वस्तु है कि जो इस संसार के अप्रतिहत चक्र से कुचली नहीं जा सकती। हे राजन् ! अपने हाथ से शीश काटकर देनेवाले राजा जगदेव, विद्याविशारद राजा भोज, परदुःखभंजन राजा विक्रमादित्य, दानवीर कर्ण इत्यादि कोई भी इस संसार में अब नहीं हैं परंतु उनके यश की पताका अद्य तक अक्षय स्वरूप से उड़ रही है और सदा उड़ेगी। महाराज ! धन यौवन सदैव नहीं रहता; मनुष्य ही क्या, आकाश में स्थित सूर्य और चंद्रमा भी एक- रस स्थिर नहीं रहते। जीवन, मरण, सुख, दुःख यह सब होनहार ही हैं तब अपने कर्तव्य से क्यों चूकिए। श्रीमान् आप इस समय अपने पूर्व पुरुष सोमेश्वर, पृथ्वीराज, जैतराव इत्यादि की वीरता और उनकी अक्षय कीर्ति का स्मरण कीजिए और तन धन सब कुछ जाय तो जाय परंतु शरणागत महिमाशाह और अपने धर्म हठ को न जाने दीजिए।” रानी की इस प्रकार उच्च उत्तम शिक्षा सुनकर राव जी के मुखार- बिंद पर प्रसन्नता की झलक पड़ गई। उन्होंने कहा “धन्य प्रिये ! बस मैं इतना ही चाहता था, अब मैं निश्चिततापूर्वक रण में प्राण दे सकता हूँ।” इस बात के सुनते ही रानी मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी, फिर कुछ सम्हलकर मधुर स्वर से बोली—“स्वामी, आप युद्ध कीजिए मैं आपसे पहले ही शाका करूंगी।” रानी जी से इस प्रकार बातें करके राव जी ने दरबार में आकर राज्य कोष को खोलवाकर याचकों को अयाची करने की आज्ञा दी और सब राजपूत सूर सामंतों के सामने “चतुरंग” से कहा कि अब मैं अपना कर्तव्य पालन करने पर उद्यत हूँ, रणथंभ की प्रजा और राजकुमार रतन की रक्षा आप कीजिए। उत्तम होगा कि आप

( २५ ) रतन को लेकर चित्तौर चले जायें। इसपर यद्यपि चतुरंग ने आना- कानी करके अपने को भी राव जी के साथ युद्ध में शामिल रखना चाहा किंतु रावजी के आग्रह करने पर उसे वही मानना पड़ा अर्थात् ५००० सैनिकों सहित 'रतन' को लेकर वह चित्तौर की तरफ गया । जब चतुरंग अल्हणपुर तक पहुँच गए तब राव हम्मीर जी ने अपने सब सर्दारों से कहा कि "अब धर्म्म के लिये प्राण न्यौछावर करने का समय निकट आ गया है अतएव जिनको मृत्यु प्यारी हो वे मेरे साथ रहें और जिन्हें जीवन प्यारा हो वे खुशी से घर चले जायें। राव हम्मीर जी के इस प्रकार कह चुकने पर मीर महिमा- शाह ने सब सूर वीर सर्दारों की तरफ से प्रतिनिधि स्वरूप हो अर्ज किया—हे राव जी ! ऐसा कौन पुरुष कुलांगार होगा जो आपको इस समय रणथंभ में छोड़कर अपने जीवन का सुख चाहेगा। देवता, मनुष्य, शूरवीर पुरुष किसी का भी जीवन स्थिर नहीं है। एक दिन मरेंगे सब, तब फिर ऐसे सुअवसर की मृत्यु को कौन छोड़े ? मरने से सब डरते हैं, संसार में केवल सती स्त्री और शूर वीर पुरुष ही ऐसे हैं जो मृत्यु को सदैव आलिंगन करने के लिये प्रस्तुत रहते हैं एव उन्हें मृत्यु में ही आनंद आता है। दूसरे दिन अरुणोदय होते ही राव जी ने शौचादि से निश्चिंत हो गंगाजल से स्नान कर शरीर में सुगंधित गंधादि लेपन कर केसर सने पीले वस्त्र धारण किए, माथे पर रत्नजटित मुकुट बाँधा और शूर वीरों के छत्तीसों बाने (हरबे) लगाकर प्रसन्नतापूर्वक वे ब्राह्मणों को संमान सहित दान देने लगे । इधर बात की बात में राठौड़, कूरम, गौड़, तँवर, पड़िहार, पारैच, पुंडीर, चहुआन, यादव, गहिलोत, सेंगर, पँवार इत्यादि जाति के कुलीन शूर वीर राजपूत लोग अपने अपने आने बाने से सजे हुए रणरंग में रत मदमाते गयंद की भाँति आकर राव जी के पास इकट्ठे होने लगे। उन आगत शूर वीर राजपूतों के माथे पर टेढ़ी पगड़ी, ललाट में केशर सौंधे गंध की त्रिपुंड, गले में तुलसी और रुद्राक्ष की माला, सिर पर लोहे के टोप,

( २६ ) शरीर पर झिलम-बख्तर, हाथों में दस्ताने, और यथा अंग छत्तीसों बाने सजे हुए थे। वे वीर योद्धा लोग साक्षात् शिव के गण से सुशो- भित होते थे। इधर तो इन सब शूर वीरों सहित राव जी गणेश, शिव, भगवती इत्यादि देवताओं का पूजन और परिक्रमा कर रहे थे उधर राजमहल के द्वार पर मेघ के समान बड़े दुरद दंतारे मत्तवारे हाथियों और वायु के वेग को उल्लंघन करनेवाले घोड़ों का घमासान जम रहा था। सूर्य निकलते निकलते राव हम्मीर जी अपने वीर योद्धाओं सहित इष्टदेव का स्मरण करते हुए राजमहल से बाहर हुए। राव जी के आते ही सब सेना व्यूहबद्ध हो गई। सबसे आगे फड़वाली साक्षात् काल की सी बिकराल कालिका का अवतार तोपें, उनके पीछे हथनार ऊँटनार जंबूर, तिनके पीछे हाथी, तिनके पीछे ऊँट, घड़मवार और फिर तुबकदार पैदल इत्यादि थे। उस समय बाल सूर्य की सुनहरी किरणों के पड़ने से सब साज बाज मे सुसज्जित चंचल घोड़े और गंधमय गंडस्थलवाले मतवाले हाथी बड़े ही भले मालूम होते थे। जिस समय राव जी की सवारी संपूर्ण रूप से सुसज्जित हो गई तो नौबत, नगाड़े, शंख, सहनाई, रणतूर, श्रृंगी, डफ इत्यादि रण-वाद्य बजने लगे, कड़खैत उच्च स्वर मे कड़खे गा-गाकर महज कठोरहृदय शूर वीरों के चित्त को उत्कर्ष देने लगे। इधर ये शूर वीर लोग उमंग में भरे हुए आगे बढ़ते जाते थे उधर आकाश में अप्सराओं के वृंद इस समर में शत्रु के संमुख प्राण को परित्याग करनेवाले वीरों को अपने हृदय का हार बनाने के लिये आकाश मार्ग से आ रही थीं। जिस प्रकार ये वीर लोग इधर झिलम, टोप, बख्तर, दस्ताने, कलगी, तुर्रा, सरपेच, तीर, तुबक, तेगा, तलवार, तबल, तोमर, तौरा नेत, बरछी, बिछुआ, बाँका, छुरी, पिस्तौल, पेश- कब्ज, कटार, परिघ, फरसा, दाब इत्यादि अस्त्र शस्त्र से सजे हुए थे उसी प्रकार उस तरफ सर्वांगसुंदरी नवयौवना अप्सराएँ भी सीसफूल, दावनी, आड़, ताटंक, हार, बाजूबंद, जोसन, पहुँची, पाजेब इत्यादि गहने और नाना प्रकार की रंग बिरंगी कंचुकी, चोली, चौबंद

इत्यादि वस्त्रों को धारण किए हुए आकाश-मार्ग में स्थित थीं। इस प्रकार जंग-रंगराते मद्माते राजपूत इधर से बढ़े और उधर से इसी तरह वाणों की बौछार करती हुई मुसलमान सेना भी पहाड़ों की कंदराओं में से टिड्डी सी निकल पड़ीं। दोनों सेनाओं में प्रथम तो धुँआधार तोप, तुवक, मौका, पिस्तौल इत्यादि अग्न्यास्त्रों से वर्षा हुई, परंतु जब वीरत्व के उत्साह से प्रोत्साहित हुई दोनों सेनाएँ समुद्र की तरह उमड़कर एक दुसरे से खिल्तमिल्त हो गईं उस समय एकदम तेगा, तलवार, तबल, छुरी, बिछुवा, कटार, गुर्ज, फर्सा इत्यादि की मार होने लगी। क्षण मात्र में वह आमोदमय रणभूमि साक्षात् करुणा और वीभत्स रस का समुद्र हो गई। जहाँ तहाँ घायल और मृतक शूर वीर सिपाहियों के शवों के ढेर के ढेर नजर आते थे। मृतक हाथी, घोड़ों के शव जहाँ तहाँ चट्टानों से दीखते थे और बहुतेरे नर-देह-रक्त की नदी में जहाँ तहाँ बहे जाते थे। उन पर बैठकर मांस भक्षण करते हुए कौवे, चील्ह, गिद्ध, कुही, बाज, कुर्रा और शृगाल इत्यादि जंतु अत्यंत भयानक रव मचाते थे। इस प्रकार कठिन मार मचने पर मुसलमान सेना के पैर उखड़ पड़े। यह देखकर वादशाह ने अपनी सेना को ललकारते हुए वजीर से कहा कि अब क्या किया जाय । तब वजीर ने कहा कि इस समय अपनी सेना की चार अनी करके प्रत्येक का भार दीवान, बाँके बगसी, मैं और आप स्वयं लेकर चार तरफ से आक्रमण करें, तब ठीक होगा। वादशाह ने उसकी संमति मानकर वैसा ही किया। इस बार उपयुक्त व्यूहबद्ध होने के कारण मुसलमान सेना ने बड़ी वीरता दिखाई। बादशाह ने पुकारकर कहा कि मेरा जो उमराव हम्मीर को पकड़कर लावेगा उसको बारह हजार की जागीर और दरबार में सबसे बड़ा मंसब मिलेगा। यह सुनकर अब्दुल नामक एक उमराव अपनी सेना सहित बड़े वेग से आगे बढ़ा। इधर राजपूत सेना ने उसके रोकने का यथासाध्य प्रयत्न किया, इस होड़ हौस में बड़ी कड़ी मार हुई, दोनों ओर के कई कमंद खड़े हुए। जब राव जी की तरफ़

( २८ )

के २०० सवार, तीस हाथी और ६०० वीर जोधा काम आ चुके तब शेख महिमाशाह ने राव हम्मीर को सिर नवाकर कहा कि श्रीमान् अब बहुत हुआ। अब जरा मेरा भी पराक्रम देखिए। यह कहता हुआ वह बीच समरभूमि में आ खड़ा हुआ और बादशाह को संबोधन करके बोला—मैं महिमाशाह जो आपका अपराधी हूँ यह खड़ा हूँ अब पकड़ते क्यों नहीं ! अथवा जो कुछ करना हो करते क्यों नहीं ? अब अपनी इच्छा को पूर्ण कीजिए। महिमाशाह के ऐसे सगर्व वचन सुनकर अलाउद्दीन ने खुरासान खाँ की ओर देखकर कहा कि जो कोई इस शेख को जीवित पकड़ लावेगा उसे तीस हजार की जागीर, बारह हजारी मंसब, नौबत निशान और एक तलवार दूँगा। इस पर सड़की फौज के साथ इधर से खुरासान खाँ और राव हम्मीर की जय जयकार बोलते हुए उधर से महिमाशाह ने एक दूसरे पर आक्रमण किया। बादशाह ने अपनी सेना को उत्तेजित करने के लिये कहा इसको शीघ्र पकड़ो। शेख और खुरासान की सेना अनी तो एक दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगी और इधर ये दोनों वीर स्वयं आमने सामने जुटकर एक मात्र खङ्ग के सहारे पर खेलने लगे। अंत में महिमाशाह ने खुरासान खाँ को मार गिराया और उसके निशान इत्यादि ले जाकर राव जी को नजर किए। महिमाशाह ने राव हम्मीर जी के संमुख खड़े होकर कहा—हे शरणागत प्रणरक्षक वीर चहुआन, आपको धन्य है। आप राज्य, परिवार, स्त्री और सब राजसी वैभवों को तिलांजलि देकर जो एक मात्र मेरी रक्षा करने के लिये अपने हठ से न हटे यह अचल कीर्ति आपकी इस संसार में सनातन स्थिर रहेगी। उसने आँसू भर कहा—“हाय ! अब वह समय कब आवेगा कि मैं पुनः अपनी माता के गर्भ से जन्म धारण कर आपसे फिर मिलूँ।” यह सुनकर राव जी ने कहा हे वीर मीर, अधीर मत हो। जीवन मरण यह संसार का काम ही है इस विषय का पश्चात्ताप ही क्या ? फिर हम तुम तो एक ही अंश के अवतार हैं तो हम आप अवश्य एक ही

( २६ ) में लीन होंगे अतएव इन निःसार बातों का विचार करना तो वृथा ही है परंतु यह अवश्य है कि मनुष्य देह धारण कर इस प्रकार कीर्ति संपादन करने का समय कठिनता से प्राप्त होता है। राव हम्मीर जी के उपर्युक्त वक्तव्य का अंत होते ही वीरोचित उत्कर्ष से भरा हुआ मीर महिमाशाह रणक्षेत्र के मध्य में आ उप- स्थित हुआ । उसकी वरनी पर इधर से उसका छोटा भाई मीर गभरू उसके सामने जा जुटा। जिस समय ये दोनों वीर बांधव एक दूसरे पर प्रहार करने को थे कि अलाउद्दीन ने हँसकर कहा "मीर महिमा- शाह मैं सच्चे दिल से तेरी तारीफ करता हूँ। जिस वक्त से तूने दिल्ली छोड़ी उस वक्त से आज तक मुझको सिर न झुकाया, बस अब तुम खुशी से मेरे पास चले आओ मैं तुम्हारा कुसूर माफ करता हूँ और यह बेगम भी तुमको देना कबूल करता हूँ। साथ ही इसके गोरखपुर का परगना जागीर में दूँगा।" इस पर महिमाशाह ने मुस्कराते हुए सहज स्वभाव से उत्तर दिया कि अब आपका यह कहना वृथा है, आप जरा उन बातों का ख्याल भी तो कीजिए जो आपने उस समय कही थीं । यदि अब फिर से भी उसी माता की कुक्षि से जन्म लूँ तब भी राव जी को नहीं छोड़नेवाला हूँ। मीर महिमाशाह को बादशाह से बातें करते देखकर राव जी ने कुमक भेजी। इधर मीर गभरू ने भी कहा कि हे भाई, अब वृथा की दंत कथाओं के क्रंदन करने से क्या लाभ है, आओ इस सुअवसर पर हम और आप दोनों अपने अपने धर्म को पालन करते हुए स्वर्ग की सीढ़ी पर पैर देवें। यह कहते हुए दोनों भाई अपने अपने स्वामियों की जयकार मनाते हुए एक दूसरे से जुट पड़े। मीर गभरू ने अपने बड़े भाई महिमाशाह के पैर छूकर कहा "अब मुझे आज्ञा हो।" इसके उत्तर में महिमाशाह ने कहा कि "स्वामिधर्म पालन में दोष ही क्या है ?" पहले तो दोनों भाई परस्पर खङ्ग से लड़ते रहे किंतु जब बहुत देर हो गई तब दोनों अपने अपने घोड़ों पर से उतरकर परस्पर द्वंद्व युद्ध में प्रवृत्त हुए, और दोनों सेनाओं के देखते

( ३० )

ही दोनों वीर भाई स्वर्ग को सिधारे। जब महिमाशाह मारा जा चुका तब अलाउद्दीन ने राव हम्मीर जी से कहा कि अब आप युद्ध न कीजिए; मैं आपकी अक्षय वीरता से अत्यंत प्रसन्न होकर आपको अपनी तरफ से पाँच परगने और देना स्वीकार करता हूँ और यह भी प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मेरे रहते आप स्वच्छंदतापूर्वक रणथंभ का राज्य कीजिए। इसके उत्तर में हम्मीर जी ने कहा कि अब आपका यह विचार केवल विडंबना है। अब जो कुछ भविष्य में होगा वही होगा, मैं इस क्षणभंगुर जीवन की अभिलाषा वा राज्यसुख के लोभ से अक्षय कीर्ति को त्यागनेवाला नहीं हूँ। रावण, दुर्योधन आदि वीरों ने कीर्ति के लिये ही तन को तिनका सा त्याग दिया, हम तुम दोनों एक ही पद्म ऋषि के अंश से उत्पन्न हैं, अतएव अब यही उचित है कि इस सुअवसर पर समर भूमि में अनित्य शरीर को विसर्जन करके हम आप स्वर्ग में सदैव के लिये सहवास करें। राव जी के ऐसे वचन सुनकर अलाउद्दीन ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। उधर से राजपूत सेना भी प्राण का मोह छोड़कर मदोन्मत्त मातंग की तरह मुसलमानों से जंग करने को वीरत्व के उमंग में भरी हुई उमड़ पड़ी। जिस समय दसों दिग्गजों के हृदय को कंपायमान करनेवाले रणवाद्यों को बजाती हुई दोनों सेनाएँ परस्पर मिल रही थीं उसी समय भोज नामक भीलों के सरदार ने राव जी से अपने हरावल में होने की आज्ञा माँगी। रावजी ने कहा कि तुम चित्तौर की रक्षा करो। इसपर उसने उत्तर दिया कि मुझे श्रीमान् की आज्ञा मानने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, परंतु मैंने जो आजन्म श्रीमान् की चरण-सेवा की है वह इसी अवसर के लिये; अतएव अब मुझे आज्ञा हो क्योंकि मैं अपने कर्त्तव्य के ऋण से उऋण होऊँ। यों कहकर भोजराज अपनी भोल सेना सहित आगे बढ़ा। उधर से मीर सिकंदर हरावल में हुआ। मुसल- मान सेना से तोप की गुरांवें छूटती थीं और भील तीरों की वर्षा

( ३१ ) करते थे। इसी समय भोजराज और सिकंदर का मुकाबला हुआ। इधर से भोजराज ने सिकंदर पर कटार का वार किया और उसने तलवार चलाई, निदान दोनों वीर एक ही समय धराशायी हुए। इस युद्ध में भोजराज के साथवाले दो हजार भील और सिकंदर की तरफ के तीस हजार कंधारी योद्धा काम आए और शाही सेना भाग उठी। उसी समय राव हम्मीर जी ने भोजराज की लाश के पास हाथी जा डटाया और उस वीर के मृतक शव को देखकर राव जी ने आँसुओं से नेत्र डबडबाई हुई अवस्था में कहा—धन्य हो वीरवर ! तुमने स्वामिसेवा में प्राण देकर अतुलित कीर्ति को संपादन किया। राव जी को रणक्षेत्र के बीच अचल भाव से स्थित देखकर अला- उद्दीन ने अपने भागते हुए वीरों से कहा—"रे मूर्ख मनुष्यो, तुमने जिस मेरे कारण आजन्म आनंद से जीविका निर्वाह की, अहर्निश आनंद आमोद में व्यतीत किए, आज तुम्हें लड़ाई का मैदान छोड़कर भागते हुए शरम नहीं आती।" इतना सुनते ही मुसलमान सेना भूखे बाघ या फुफकारते हुए सर्प की तरह लौट पड़ी। यहाँ राजपूत तो सदैव प्राण हथेली पर रखे हुए थे, दोनों में इस तरह कड़ाचूर मार पड़ी कि रणभूमि में रक्त की नदी बह निकली, उस वेग से बहती हुई शोणित सरिता में जहाँ तहाँ पड़े हुए हाथियों के शव वास्तविक चट्टानों से भासित होते थे, वीरों के हाथ पाँव जंघा इत्यादि कटे हुए अवयव जलचर जीव से तैरते ज्ञात होते थे, वीरों के सचिक्कन केश सिवार और ढाल कच्छप सी प्रतीत होती थी, नव युवा वीरों के कटे हुए मस्तक कमल से और उनके आरक्त बड़े बड़े नेत्र खंजन से खिलते हुए नजर आते थे। इस पसर में ७५ हाथी, सवा लाख घोड़े, ७०० निशानवाले और अगनित योद्धा काम आए। सिकंदर शाह, शेर खाँ, मरहम खाँ, मोहब्बत खाँ, मुदफ्फर या मुजफ्फर खाँ, नूर खाँ, निजाम खाँ इत्यादि मुसल- मान वीर मारे गए और राव जी की तरफ के भी नामी नामी चार सौ योद्धा खेत रहे।

( ३२ ) इसी मारामार में राव हम्मीर जी ने अपने हाथी को अलाउद्दीन के संमुख डटाए जाने की आज्ञा दी और कहला भेजा कि अबतक वृथा ही रक्त प्रवाह हुआ है अब आइए हमारा आपका द्वंद्व युद्ध हो और सब द्वंद्व समाप्त हो । राव जी का यह सँदेसा सुनकर अलाउद्दीन ने मंत्री से पूछा कि अब क्या करें । तब मंत्री ने उत्तर दिया कि उस चहुआन के बल प्रताप एवं पराक्रम से आप अपरिचित नहीं हैं अतएव मेरे विचार में तो यही आता है कि अब आप संधि कर लें तो सर्वथा भला है । निदान अलाउद्दीन ने वजीर की बात मानकर हम्मीर जी के पास संधि का प्रस्ताव भेजा परंतु उस वीर हम्मीर ने उत्तर दिया कि युद्धस्थल में उपस्थित होकर मित्रता का प्रस्ताव करना भला कौन सी नीति और बुद्धिमत्ता का काम है ! शत्रु के संमुख विनती करना नितांत कातरता अथवा दंभमय चतुरता का पता देता है । बादशाह के दूत को इस प्रकार नीतियुक्त उत्तर देकर राव जी ने अपने राजपूत वीरों को आज्ञा दी कि "हे वीरवर योद्धाओ, अब मेरी यही इच्छा है कि आप तोप, बाण, हथनार, चादर, जंबूर, बंदूक, तमंचा, बरछा, सेल, साँग इत्यादि हथियारों को त्यागकर केवल तलवार, छुरी, कटारी और विषाण से काम लो अथवा मल्लयुद्ध द्वारा ही अपने पराक्रम का परिचय देते हुए स्वर्ग की सीढ़ी पर पैर दो । साथ ही मेरी यह भी आज्ञा है कि बादशाह को न मारना ।" राव जी के इतना कहते ही राजपूत रावत, महावत से हकारे हुए हाथी की तरह अपने अपने उज्ज्वल शस्त्रों को चमकाते हुए चल पड़े । क्षुधित मृगराज की भाँति रणबाँकुरे राजपूतों का वेग मुसल- मानी सेना क्षण भर न सह सकी और बड़े बड़े सैनिक अमीर उमरा भेड़ की भाँति भाग उठे । राजपूत सेना ने अलाउद्दीन के हाथी को घेर लिया और उसे रावहम्मीर जी के संमुख ले आए । राव जी ने विह्वल हुए बादशाह को देखकर अपने सरदारों से कहा कि यह पृथ्वी-

.( ३३ ) पति वादशाह है। अदंड्य है। इसलिये आप लोग इसे यों ही छोड़ दीजिए। निदान राजपूत सरदारों ने राव जी की आज्ञा मानकर अलाउद्दीन को उसकी सेना में पहुँचा दिया और वह भी उसी समय वहाँ से कूचकर दिल्ली को चला आया। उधर राव हम्मीर जी ने अपने घायलों को उठवाकर और बाद- शाही सेना से छीने हुए निशान लिवाकर निज दुर्ग की तरफ फेरा किया। राव जी ने भूलवश, अथवा विजय के उत्साहवश, शाही निशानों को आगे चलने की आज्ञा दी, यह देखकर रानी जी ने समझा कि रावजी खेत हार गए और यह किले पर शाही सेना आ रही है। ऐसा विचार कर रानीजी ने अन्यान्य सब परिवार की वीर महि- लाओं सहित प्रज्वलित अग्नि में शरीर होम कर शाका किया। जब राव जी ने किले में आकर यह दृश्य देखा तो सब सरदारों और सैनिकों को आज्ञा दी कि वे चित्तौर में जाकर कुँअर रतनसेन की रक्षा करें और आप शिव के मंदिर में जाकर नाना प्रकार के पूजन अर्चन करके यह वरदान माँगा कि अब जो मैं पुनः जन्म धारण करूँ तो इसी प्रकार वीर क्षत्रिय कुल में। और खड्ग खींचकर अपने ही हाथों से कमल के पुष्प के समान अपना माथा उतार शिव जी को चढ़ा दिया। जब यह समाचार अलाउद्दीन के कर्णगोचर हुआं तो राव जी के कर्त्तव्य पर पश्चात्ताप करता हुआ वह फौरन फिर आया और राव जी के संमुख खड़ा होकर अदब से प्रणाम करता हुआ बोला कि अब मुझे क्या आज्ञा है। यह सुनकर राव जी के मस्तक ने उत्तर दिया कि तुम जाकर समुद्र में शरीर छोड़ो तब हम तुम मिलेंगे। राव जी के शीश के वचन मानकर अलाउद्दीन ने वजीर महरम खाँ को आज्ञा दी कि वह सब लश्कर सहित दिल्ली जाकर "शाहजादा" अलावृत्त को तख्त पर बिठावे और वह आप उसी क्षण रामेश्वर को चला गया। वहाँ पर उसने रामेश्वर जी की पूजा की और उन्हीं का ३

[Page Number: ( ३४ )]

ध्यान और स्मरण करते हुए समुद्र में वह कूद पड़ा । इस प्रकार वादशाह के तन त्यागने पर राव हम्मीर जी और अलाउद्दीन और मीर महिमाशाह परस्पर स्वर्ग में गले मिले और अप्सराओं और देवताओं ने पुष्पवृष्टि की । इस प्रकार राव हम्मीर जी का यश-कीर्तन सुनकर राव चंद्रभान जी ने कवि जोधराज को बहुत सा दान दिया, और सब भाँति से प्रसन्न किया । चैत्र सुदी तृतीया वृहस्पतिवार संवत् १८८५ को ग्रंथ पूर्ण हुआ। यह जोधराज कृत हम्मीररासो का सारांश हुआ। इसमें दी हुई ऐतिहासिक बातों पर विचार करने के पहले मैं एक दूसरे कवि की लिखी हुई हम्मीर राव की कथा का सारांश देना चाहता हूँ। नयन- चंद्र सूरि नामक एक जैन कवि ने हम्मीर महाकाव्य नाम का एक ग्रंथ संस्कृत में लिखा है। नयनचंद्र जयसिंह सूरि का पौत्र था। वह ग्रंथ पंद्रहवीं शताब्दी का लिखा हुआ जान पड़ता है। सन् १८७८ में पंडित् नीलकंठ जनार्दन ने इस काव्य का एक संस्करण छपाया जिसकी भूमिका में उन्होंने काव्य का सारांश दिया है उससे नीचे लिखा वृत्तांत मैं हिंदी में उद्धृत करता हूँ। यहाँ पर इस ग्रंथ में दिया हुआ हम्मीरदेव के वंश का कुछ वृत्तांत दे देना उचित जान पड़ता है । चौहान वंश में दीक्षित वासुदेव नाम का एक पराक्रमी राजा हुआ । इसका पुत्र नरदेव था। इसके अनंतर हम्मीर तक वंशक्रम इस प्रकार है— चंद्रराज जयपाल जयराज सामंतसिंह गुयक नंदन

( ३५ ) चप्रराज हरिराज सिंहराज—इसने हेतिम नाम के मुसलमान सदार को मारा । भीम—सिंह का भतीजा और उसका दत्तक पुत्र । विग्रहराज—गुजरात के मूलराज को मारा । गंगदेव वल्लभराज राम चामुंडराज—हेजम्मुद्दीन को मारा । दुर्लभराज—शहाबुद्दीन को जीता । दुशल—कर्णदेव का मारा । बीसलदेव—शहाबुद्दीन को मारा । पृथ्वीराज—प्रथम अल्हण अनल—अजमेर में तालाब खुदवाया । जगदेव बीशल जयपाल गंगपाल सोमेश्वर—कर्पूरादेवी से विवाह किया । पृथ्वीराज—द्वितीय हरिराज गोविंद वाल्हण—प्रल्हाद और वाग्भट्ट दो पुत्र हुए । प्रह्लाद वीरनारायण—प्रह्लाद का पुत्र । वाग्भट्ट—वाल्हण का पुत्र । वाग्भट्ट के उत्तराधिकारी उनके पुत्र जैत्रसिंह हुए । उनकी रानी

( ३६ ) का नाम हीरादेवी था जो बहुत रूपवती और सर्वथा अपने उच्च पद के योग्य थी। कुछ काल में हीरादेवी गर्भवती हुई। उसकी इस अवस्था की वासनाओं से गर्भस्थित जीव की प्रवृत्ति और उसके महत्त्व का आभास मिलता था। कभी कभी उन्हें मुसलमानों के रक्त से स्नान करने की इच्छा होती। उसके पति उसकी अभिलाषाओं को पूरा करते; अंत में, शुभ घड़ी में, उसको एक पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथिवी की चारों दिशाओं ने सुंदर शोभा धारण की; सुखद समीर बहने लगा; आकाश निर्मल हो गया; सूर्य्य मृदुलता से चमकने लगा; राजा ने अपना आनंद ब्राह्मणों पर सुवर्ण बरसाकर और देवताओं की वंदना करके प्रगट किया। ज्योतिषियों ने बालक के मुहूर्त्तस्थान में पड़े हुए नक्षत्रों के शुभ योग का विचार करके भवि- ष्यद्वाणी की कि कुमार समस्त पृथिवी को अपने देश के शत्रु मुस- लमानों के रक्त से आर्द्र करेगा। बालक का नाम हम्मीर रखा गया। हम्मीर बढ़कर एक सुंदर और बलिष्ठ बालक हुआ उसने सब कलाओं को सीख लिया और शीघ्र ही वह युद्ध-विद्या में भी निपुण हो गया!, जैत्रसिंह के सुरत्राण और विराम दो और पुत्र थे, जो बड़े योद्धा थे। यह देखकर कि उनके पुत्र अब उनको राज्य के भार से मुक्त करने योग्य हो गए, जैत्रसिंह ने एक दिन हम्मीर से इस विषय में बातचीत की, और उन्हें किस रीति से चलना चाहिए इस विषय में उत्तम उपदेश देने के उपरांत, राज्य उनके (हम्मीर के) हवाले कर दिया, और वे आप वनवास करने चले गए। यह बात संवत् १३३९ (१२८३ ई०) में हुई।१ । छः गुणों और तीन शक्तियों से संपन्न होकर हम्मीर ने युद्ध के

१-ततश्च सवन्नववह्नि वह्निभूहायने माघवलक्षपक्षे । पौष्यां तिथौ हेलिदिने सपुष्ये दैवज्ञनिर्दिष्टबलेऽलिलग्ने ॥ सर्ग ८ श्लोक ५६

( ३७ ) हेतु प्रस्थान करने का संकल्प किया। पहले वह राजा अर्जुन की राजधानी सरसपुर में गया। यहाँ एक युद्ध हुआ जिसमें अर्जुन पराजित होकर अधीन हुआ। इसके अनंतर राजा ने गढ़मंडले पर चढ़ाई की, जिसने कर देकर अपनी रक्षा की। गढ़मंडले से हम्मीर धार की ओर बढ़ा। यहाँ एक राजा भोज राज्य करता था जो स्वनामधारी विख्यात राजा भोज के समान ही कवियों का मित्र था। भोज को पराजित करके सेना उज्जैन में आई जहाँ हाथी, घोड़े और मनुष्य क्षिप्रा के निर्मल जल में नहाए। राजा ने भी नदी में स्नान किया और महाकाल के मंदिर में जाकर पूजा की। बड़े समारोह के साथ वे उस प्राचीन नगरी के प्रधान मार्गों से होकर निकले। उज्जैन से हम्मीर चित्रकोट (चित्तोर) की ओर बढ़ा और मेढ़वार (मेवाड़) को उजाड़ करता हुआ आबू पर्वत पर गया। वेद के अनुयायी होकर भी यहाँ हम्मीर ने मंदिर में ऋषभदेव की पूजा की, क्योंकि बड़े लोग विरोधसूचक भेदभाव नहीं रखते। वस्तुपाल के स्तुति-पाठ के समय भी राजा प्रस्तुत थे। वे कई दिन तक वशिष्ठ की कुटी में रहे, और मंदाकिनी में स्नान करके उन्होंने अचलेश्वर की आराधना की। यहाँ अर्जुन की कृतियों को देखकर वे बहुत ही आश्चर्यित हुए। आबू का राजा एक प्रसिद्ध योद्धा था, किंतु उसके बल ने इस अवसरपर कुछ काम न किया और उसे हम्मीर के अधीन होना पड़ा। आबू छोड़कर राजा वर्द्धनपुर आए और उस नगर को उन्होंने लूटा तथा नष्ट किया। चंगा की भी यही दशा हुई। यहाँ से अज- मेर की राह से हम्मीर पुष्कर को गए जहाँ उन्होंने आदिवराह की आराधना की। पुष्कर से राजा शाकंभरी को गए। मार्ग में मरहटा १, खंडिल्ला, चमदा और काँकरौली लूटे गए। काँकरौली में १-इस नाम का एक स्थान जोधपुर राज्य में है। जोधपुर राज्य में नाडोल नाम का एक गाँव है जहाँ आशापुर देवी का स्थान है। रणथंभ से यदि नाडोल जाया जाय तो मेड़ता बीच में पड़ेगा।

( ३८ ) त्रिभुवनेंद्र उनसे मिलने आए और अपने साथ बहुत सी अमूल्य भेंट लाए। इन विशद कार्यों को पूरा करके हम्मीर अपनी राजधानी को लौट आए। राजा के आगमन से वहाँ बड़ी धूम हुई। राज्य के सब से बड़े कर्म्मचारी धर्मसिंह के साथ दल बाँधकर अपने विजयी राजा की अगवानी के लिये बाहर आए। मार्ग के दोनों ओर प्रेमी प्रजा अपने राजा के दर्शन के हेतु उत्सुक खड़ी थी। इसके कुछ दिन पीछे हम्मीर ने अपने गुरु विश्वरूप से कोटियज्ञ का फल पूछा और उनसे यह उत्तर पाकर कि इस यज्ञ के पूरा करने से स्वर्ग लोक प्राप्त होता है राजा ने आज्ञा दी कि कोटियज्ञ की तय्यारी की जाय। चट देश के सब भागों से विद्वान ब्राह्मण बुलाए गए, और यज्ञ पवित्र शास्त्रों में लिखे विधानों के अनुसार समाप्त किया गया। ब्राह्मणों को खूब भोजन कराकर उन्हें भरपूर दक्षिणा दी गई। इसके उपरांत राजा ने एक महीने तक के लिये मुनिव्रत ठाना। जब कि रणथंभौर में ये सब बातें हो रही थीं, दिल्ली में, जहाँ अलाउद्दीन राज्य करता था, कई परिवर्त्तन हुए। रणथंभौर में जो कुछ हो रहा था उसका समाचार पाकर उसने अपने छोटे भाई उलुगखाँ १ को सेना लेकर चौहान प्रदेश पर चढ़ाई करने और उसको उजाड़ देने की आज्ञा दी। उसने कहा "जैत्रसिंह हम लोगों को कर देता था; पर यह उसका बेटा न कि केवल कर ही नहीं देता वरन् हम लोगों के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिये प्रत्येक अवसर ताकता रहता है। यह उसकी शक्ति को नष्ट करने का अच्छा अवसर है।" ऐसी आज्ञा पाकर उलुगखाँ ने ८०००० सवार लेकर रणथंभौर प्रदेश पर चढ़ाई की। जब यह सेना वर्णनाशा नदी पर पहुँची तब उसने देखा कि सड़कें, जो शत्रु के प्रदेश को गई हैं, सवारों के चलने योग्य नहीं हैं। इससे वह कई दिन वहाँ टिका रहा; इस बीच में उसने आस पास के गाँवों को जलाया और नष्ट किया। १-मालिक मुईजुद्दीन उलुगखाँ। ब्रिग्स ने अपने फिरिश्ता के अनुवाद में इसको "अल्फखाँ" लिखा है।

( ३९ ) यहाँ रणथंभौर में मुनिव्रत पूरा न होने के कारण राजा स्वयं युद्धक्षेत्र में न जा सकते थे। अतएव उन्होंने भीमसिंह और धर्म्मसिंह अपने सेनापतियों को आक्रमणकारियों को भगाने के लिये भेजा।° राजा की सेना वर्णनाशानदी के किनारे एक स्थान पर आक्रमण- कारियों पर टूट पड़ी और उसने शत्रुओं को, जिनके बहुत से लोग मारे गए, परास्त किया। इस जयलाभ से संतुष्ट होकर भीमसिंह रणथंभौर की ओर लौटने लगा, और उलुगखाँ अपनी सेना का प्रधान अंग साथ लिए छिपकर उसके पीछे पीछे बढ़ने लगा। अब यह हुआ कि भीमसिंह के सिपाही, जिन्होंने लूट में बहुत सा धन पाया था, उसको रक्षापूर्वक अपने अपने घर ले जाने को व्यग्र थे, और इसी व्यग्रता में उन्होंने अपने नायक को पीछे छोड़ दिया जिसके साथ केवल अनुचरों की एक छोटी सी मंडली रह गई। जब इस प्रकार भीमसिंह हिंदावत घाटी के बीचोबीच पहुँचा तब उसने विजय के अभिमान में उन नगाड़ों और बाजों को जोर से बजाने की आज्ञा दी जिनको उसने शत्रु से छीना था। इस कार्य का फल अचिंत्यपूर्व और आपत्तिजनक हुआ। उलुगखाँ ने अपनी सेना को छोटे छोटे दलों में भीमसिंह का पीछा करने की आज्ञा दे रखी थी और बाजा बजाते ही उसे शत्रु के ऊपर जयलाभ की सूचना समझ, उसपर टूट पड़ने का आदेश दे रखा था। अतः जब मुसल्मानों के पृथक् पृथक् दलों ने नगाड़ों का शब्द सुना तब वे चारों ओर से घाटी में आ पहुँचे, और उलुगखाँ भी एक ओर से आकर भीमसिंह से युद्ध करने लगा। हिंदू सेनापति कुछ काल तक यह बेजोड़ की लड़ाई लड़ता रहा, पर अंत में घायल हुआ और मारा गया। शत्रु के ऊपर यह जयलाभ पाकर उलुगखाँ दिल्ली लौट गया। यज्ञ पूरा होने के उपरांत हम्मीर ने युद्ध का वृत्तांत और अपने सेनापति भीमसिंह की मृत्यु का समाचार सुना। उन्होंने धर्म्मसिंह को भीमसिंह का साथ छोड़ने के लिये धिक्कारा, उसको अंधा कहा क्योंकि वह यह न देख सका कि उलुगखाँ सेना के पीछे पीछे था।

( ४० )

उन्होंने उसको क्लीव भी कहा क्योंकि, वह भीमसिंह की रक्षा के लिये नहीं दौड़ा। इस प्रकार धर्म्मसिंह को धिक्कारकर ही संतुष्ट न होकर राजा ने उस दोषी सेनापति को अंधा करने और उसको क्लीव करने की आज्ञा दी। सेनानायक के पद पर भी धर्म्मसिंह के स्थान पर भोजदेव हुए, जो राजा के एक प्रकार से भाई होते थे और धर्म्मसिंह को देश निकालने का दंड भी सुनाया जा चुका था पर भोजदेव के बीच में पड़ने से उसका बर्ताव नहीं हुआ। धर्म्मसिंह इस प्रकार अवयवभग्न और अपमानित होकर राजा के इस व्यवहार से अत्यंत दुःखित हुआ, और उसने बदला लेने का संकल्प किया। अपने संकल्पसाधन के हेतु उसने राधादेवी नाम की एक वेश्या' से, जिसका दरबार में बहुत मान था, गहरी मित्रता की। राधादेवी नित्य प्रति जो कुछ दरबार में होता उसकी रत्ती रत्ती सूचनां अपने अंधे मित्र को देती। एक दिन ऐसा हुआ कि राधादेवी बिल- कुल उदास और मलिन घर लौटी, और जब उसके अंधे मित्र ने उसकी उदासी का कारण पूछा तब उसने उत्तर दिया कि आज राजा के बहुत से घोड़े वेधरोग से मर गए इससे उन्होंने मरे नाचने और गाने की ओर बहुत थोड़ा ध्यान दिया, और जान पड़ता है कि बहुत दिन तक यही दशा रहेगी। अंधे पुरुष ने उसे प्रसन्न होने को कहा क्योंकि थोड़े ही दिनों में सब फिर ठीक हो जायगा। उसे केवल राजा से यह जताने का अवसर देखते रहना चाहिए कि यदि धर्म्म- सिंह अपने पहले पद पर फिर हो जाय तो वह राजा को जितने घोड़े हाल में मरे हैं उनसे दूने भेंट करे। राधादेवी ने अपना काम सफाई से किया, और राजा ने लोभ के वश में होकर धर्म्मसिंह को उसके पहले पद पर फिर आरूढ़ कर दिया। धर्म्मसिंह इस प्रकार फिर से नियुक्त होकर बदले ही का विचार करने लगा। राजा का लोभ बढ़ाता गया और उसने अपने अत्याचार और लूट से प्रजा की ऐसी हीन दशा कर दी कि वह राजा से घृणा करने लगी। वह किसी को, जिससे कुछ थोड़ा रुपया, कोई भी रखने

( ४१ ) योग्य पदार्थ—मिल सकता था, न छोड़ता। राजा, जिसका कोष वह भरता था, अपने अंधे मंत्री से बहुत प्रसन्न रहता जिसने, सफलता से फूलकर भोजदेव से उसके विभाग का लेखा माँगा। भोज जानता था कि वह उसके पद से कुढ़ता है, अतः उसने राजा के पास जाकर धर्म्मसिंह के समस्त षड्यंत्र की बात कही और मंत्री के अत्याचार से रक्षा पाने के लिये उनसे प्रार्थना की। किंतु हम्मीर ने भोज की बात पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और कहा कि धर्म्मसिंह को पूरा अधि- कार सौंपा गया है, वह जो उचित समझे कर सकता है, इसलिये यह आवश्यक है कि और लोग उसकी आज्ञा मानें। भोज ने जब देखा कि राजा का चित्त उसकी ओर से फिर गया है तब उसने अपनी संपत्ति जब्त होने दी और धर्म्मसिंह के आज्ञानुसार उसे लाकर राजा के भांडार में रखा। पर कर्त्तव्य के अनुरोध से वह अपने नायक केसाथ अब भी जहाँ कहीं वे जाते जाता रहता था। एक दिन राजा बैजनाथ के मंदिर में पूजन के हेतु गए और भोज को अपने दल में देखकर उन्होंने एक सभासद् से, जो पास खड़ा था, व्यंग्यपूर्वक कहा कि 'पृथ्वी अधम जनों से भरी है; किंतु पृथ्वों पर सबसे अधम जीव कौआ है, जो क्रुद्ध उल्लू से अपने पर नोचवाकर भी अपने पुराने पेड़ों पर के घोंसले में पड़ा रहता है।' भोज ने इस व्यंग्य का अर्थ समझा और यह भी जाना कि यह उसी पर छोड़ा गया है। अत्यंत दुखी होकर वह घर लौट गया और उसने अपने अपमान की बात अपने छोटे भाई पीतम से कही। दोनों भाइयों ने अब देश छोड़ने का संकल्प किया, और दूसरे दिन भोज हम्मीर के पास गया और उसने बड़ी नम्रता से तीर्थाटन के हेतु काशी जाने की अनुमति माँगी। राजा ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और कहा कि काशी क्या जी चाहे तो तुम और आगे जा सकते हो—तुम्हारे कारण नगर उजड़ जाने का भय नहीं है।' इस अविनीत वचन का उत्तर भोज ने कुछ न दिया। वह प्रणाम करके चला गया और उसने तुरंत काशी के हेतु प्रस्थान कर दिया। राजा भोजदेव के चले जाने से प्रसन्न हुआ और उसने

( ४२ ) कोतवाल का पद, जो ( उसके जाने से ) खाली हुआ, रतिपाल को प्रदान किया । जब भोज शिरसा पहुँचा तब उसने अपने दिन के फेर पर विचार किया और संकल्प किया कि इन अपमानों का बिना बदला लिए न रहना चाहिए । चित्त की इसी अवस्था में वह अपने भाई पीतम के साथ योगिनीपुर गया और वहाँ अलाउद्दीन से मिला । मुसलमान सरदार अपने दरबार में भोज के आ जाने से बहुत प्रसन्न हुआ । उसने बड़े आदर से उसके साथ व्यवहार किया और जगरा का नगर तथा इलाका उसे जागीर में दिया । अब से पीतम तथा भोज के परि- वार के और लोग यहाँ रहने लगे और वह आप ( भोज ) दरबार में रहने लगा । अलाउद्दीन का अभिप्राय हम्मीर का वृत्त जानने का था इस लिये भेंट और पुरस्कार से दिन दिन भोज की प्रतिष्ठा बढ़ाने लगा और वह भी धीरे धीरे अपने नए स्वामी के हित-साधन में तत्पर हुआ । भोज को अपने पक्ष में समझ अलाउद्दीन ने एक दिन उससे अकेले में पूछा कि हम्मीर को दबाने का कोई सुगम उपाय है । भोज ने उत्तर दिया कि हम्मीर ऐसे राजा पर विजय पाना कोई सहज काम नहीं है । जिससे कुंतल, मध्यदेश, अंग और कांची तक के राजा भयभीत रहते हैं, जो छः गुणों और तीन शक्तियों से संपन्न, एक विशाल और प्रबल सेना का नायक है, जिसकी ओर समस्त राजा शंका करते और आज्ञा मानते हैं, कई राजाओं को दमन करनेवाला पराक्रमी विराम जिसका भाई है, जिसकी सेवा में महिमासाह तथा और दूसरे निःशंक मोगल सरदार रहते हैं, जिसने उसके भाई को हराकर स्वयं अलाउद्दीन को छकाया । भोज ने कहा कि न केवल हम्मीर के पास योग्य सेनापति ही हैं वरन् वे सबके सब उससे स्नेह रखते हैं। एक ओर के सिवाय और कहीं लोभ दिखाना असंभव है । हम्मीर की सभा में केवल एक ही व्यक्ति ऐसा है जो अपने को बेच सकता है-जैसे दीपक के लिये वायु का झोंका, कमल के लिये मेघ, सूर्य