हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२ ) कोतवाल का पद, जो ( उसके जाने से ) खाली हुआ, रतिपाल को प्रदान किया । जब भोज शिरसा पहुँचा तब उसने अपने दिन के फेर पर विचार किया और संकल्प किया कि इन अपमानों का बिना बदला लिए न रहना चाहिए । चित्त की इसी अवस्था में वह अपने भाई पीतम के साथ योगिनीपुर गया और वहाँ अलाउद्दीन से मिला । मुसलमान सरदार अपने दरबार में भोज के आ जाने से बहुत प्रसन्न हुआ । उसने बड़े आदर से उसके साथ व्यवहार किया और जगरा का नगर तथा इलाका उसे जागीर में दिया । अब से पीतम तथा भोज के परि- वार के और लोग यहाँ रहने लगे और वह आप ( भोज ) दरबार में रहने लगा । अलाउद्दीन का अभिप्राय हम्मीर का वृत्त जानने का था इस लिये भेंट और पुरस्कार से दिन दिन भोज की प्रतिष्ठा बढ़ाने लगा और वह भी धीरे धीरे अपने नए स्वामी के हित-साधन में तत्पर हुआ । भोज को अपने पक्ष में समझ अलाउद्दीन ने एक दिन उससे अकेले में पूछा कि हम्मीर को दबाने का कोई सुगम उपाय है । भोज ने उत्तर दिया कि हम्मीर ऐसे राजा पर विजय पाना कोई सहज काम नहीं है । जिससे कुंतल, मध्यदेश, अंग और कांची तक के राजा भयभीत रहते हैं, जो छः गुणों और तीन शक्तियों से संपन्न, एक विशाल और प्रबल सेना का नायक है, जिसकी ओर समस्त राजा शंका करते और आज्ञा मानते हैं, कई राजाओं को दमन करनेवाला पराक्रमी विराम जिसका भाई है, जिसकी सेवा में महिमासाह तथा और दूसरे निःशंक मोगल सरदार रहते हैं, जिसने उसके भाई को हराकर स्वयं अलाउद्दीन को छकाया । भोज ने कहा कि न केवल हम्मीर के पास योग्य सेनापति ही हैं वरन् वे सबके सब उससे स्नेह रखते हैं। एक ओर के सिवाय और कहीं लोभ दिखाना असंभव है । हम्मीर की सभा में केवल एक ही व्यक्ति ऐसा है जो अपने को बेच सकता है-जैसे दीपक के लिये वायु का झोंका, कमल के लिये मेघ, सूर्य