हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
( ४३ ) के लिये रात्रि, यती के लिये स्त्रियों का संग, दूसरे गुणों के लिये लोभ वैसे ही हम्मीर के लिये अप्रतिष्ठा और नाश का कारण यह एक व्यक्ति है। भोज ने कहा कि वह समय भी हम्मीर के विरुद्ध चढ़ाई करने के लिये अनुपयुक्त नहीं है। इस वर्ष चौहान प्रदेश में खूब अन्न हुआ है। यदि किसी प्रकार अलाउद्दीन उसे रखने के पहले ही किसानों से छीन सके तो वे जो कि अंधे व्यक्ति के अत्याचार से पहले ही से पीड़ित हैं, हम्मीर का पक्ष छोड़ने पर सम्मत हो सकते हैं। अलाउद्दीन को भोज का विचार पसंद आया और उसने तुरंत उलुगखाँ को एक लाख सवारों की सेना लेकर हम्मीर के देश पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। उलुगखाँ की सेना एक प्रवल धारा के समान जिन प्रदेशों से होकर निकलती उनके अधिपतियों को नरकट के समान नवाती चली जाती। सेना इसी ढंग से हिंदावत पहुँच गई। तब उसके आने का समाचार हम्मीर तक पहुँचाया गया। इस पर उस हिंदू राजा ने एकसभा की और विचार किया कि किन उपायों का अवलंबन करना अच्छा होगा। यह निश्चय हुआ कि वीरम और राज्य का शेष आठ बड़े पदाधिकारी शत्रु से युद्ध करने जायँ। तुरंत राजा के सेनानायकों ने सेना को आठ भागों में विभक्त किया और आठों दिशाओं से आकर वे मुसलमानों पर टूट पड़े। वीरम पूर्व से आया और महिमासाह पश्चिम से। जाजदेव दक्षिण से और गर्भारूक उत्तर की ओर से बढ़ा। रतिपाल अग्निकोण से आया और तिचर मोगल ने वायुकोण से आक्रमण किया। रणमल ईशानकोण से आया और वैचर ने नैऋत्य की ओर से आकर आक्रमण किया। राजपूत लोग बड़े पराक्रम के साथ अपने कार्य में तत्पर हुए। उनमें से कई एक ने शत्रु की खाइयों को मिट्टी और कूड़े करकट से भर दिया, कई एक ने मुसलमानों के लकड़ी के घेरों में आग लगा दी। कुछ लोगों ने उनके डेरों (खेमों) की रस्सियों को काट डाला। मुसलमान लोग शस्त्र
( ४४ ) लेकर खड़े थे और डींग हाँककर कहते थे कि हम राजपूतों को घास के समान काट डालेंगे । दोनों दल साहसपूर्वक जी खोलकर लड़े, किंतु राजपूतों के लगातार आक्रमण के आगे मुसल्मानों को हटना पड़ा । अतएव उनमें से बहुतों ने रणक्षेत्र त्याग दिया और वे अपना प्राण लेकर भागे । कुछ काल पीछे समस्त मुसल्मानी सेना ने इसी रीति का अनुसरण किया और वह कायरता से युद्धक्षेत्र से भागी; राजपूतों की पूरी विजय हुई । जब युद्ध समाप्त हो गया तब सीधे सादे राजपूत लोग युद्धस्थल में अपने मरे और घायल लोगों को उठाने आए । इस खोज में उन्होंने बहुत सा धन, शस्त्र, हाथी और घोड़े पाए । शत्रु की बहुत सी स्त्रियाँ उनके हाथ आईं । रतिपाल ने आते हुए प्रत्येक नगर में उनसे मट्ठा बेचवाया । हम्मीर शत्रु के ऊपर अपने सेनापतियों की इस विजयप्राप्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए । इस घटना के उपलक्ष में उन्होंने एक बड़ा दरबार किया । दरबार में राजा ने रतिपाल को सोने की सिकरी पहनाई, और उसकी तुलना युद्ध के हाथी से की जो सुवर्ण के पट्टे का अधिकारी होता है । दूसरे सरदार और सिपाही लोग भी अपनी अपनी योग्यता के अनुसार पुरस्कृत किए गए और अनुग्रहपूर्वक उन्हें अपने अपने घर जाने की आज्ञा मिली । मोगल सरदारों के सिवाय और सब लोग चले गए । हम्मीर ने यह बात देखी और कृपापूर्वक उनसे रह जाने का कारण पूछा । उन्होंने उत्तर दिया कि कृतघ्न भोज को, जो जगरा में जागीर भोग रहा है, दंड देने के पहले हम तलवार म्यान में करना और अपने घर जाना बुरा समझते हैं । उन्होंने कहा कि राजा के संबंध के कारण ही हम लोगों ने उसे अब तक जीता छोड़ा है; किंतु अब वह इस सहनशीलता के योग्य नहीं रहा क्योंकि उसी की प्रेरणा से शत्रु ने रणथंभौर प्रदेश पर चढ़ाई की थी । अतएव उन्होंने जगरा पर चढ़ाई करके भोज पर आक्रमण करने की अनुमति मांगी । राजा ने
प्रार्थना स्वीकार की और दोनों मोगलों ने तुरंत जगरा की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने नगर को घेरकर ले लिया और पीतम को कई और मनुष्यों के साथ बंदी बनाकर वे उसे फिर रणथंभौर ले आए। उलुगखाँ पराजय के पीछे तुरंत दिल्ली लौट गया और जो कुछ हुआ था अपने भाई से उसने सब कह सुनाया। उसके भाई ने उस पर कायरता का दोष लगाया; अपने भागने का दोष उसने यह कहकर मिटाया कि उस अवस्था में मेरे लिये केवल एक यही उपाय था जिससे इस संसार में एक बेर फिर मैं आपका दर्शन करता और चौहान से लड़ने के लिये दूसरा अवसर पाता। उलुगखाँ ने बात गढ़ कर छुट्टी भी न पाई थी कि क्रोध से लाल भोज भीतर आया। उसने अपने उपवस्त्र को पृथ्वी पर बिछा दिया और उसपर इस प्रकार लोटने और अंडबंड बकने लगा जैसे उस पर प्रेत चढ़ा हो। अला- उद्दीन को उसका यह विलक्षण आचरण कुछ कम बुरा नहीं लगा; उसने उसका कारण पूछा। भोज ने उत्तर दिया कि मेरे लिये इस विपत्ति को कभी भूलना कठिन है जो आज मुझपर पड़ी है; क्योंकि महिमासाह ने जगरा में जाकर मुझ पर आक्रमण किया और मेरे भाई पीतम को बंदी करके हम्मीर के पास ले गया। भोज ने कहा— लोग घृणा से मेरी ओर उँगली दिखाकर अब यही कहेंगे कि यह एक ऐसा मनुष्य है जिसने अधिक पाने के लालच से अपना सर्वस्व खो दिया। असहाय और अनाथ होकर मैं पृथ्वी पर अब भी बेखटके नहीं लेट सकता क्योंकि वह समस्त पृथ्वी हम्मीर की है; इसीलिये मैंने अपना वस्त्र बिछा दिया है जिसमें उसी पर मैं उस शोक में छटपटाऊँ जिसने मुझमें खड़े रहने की शक्ति भी नहीं रहने दी है। अपने भाई की सहायता की कथा से अलाउद्दीन के हृदय में क्रोध की अग्नि पहले ही से जल उठी थी अब भोज की ये बातें उस अग्नि में आहुति के समान हुईं। हृदय के आवेग में अपनी पगड़ी को पृथ्वी पर पटककर उसने कहा कि 'हम्मीर की मूर्खता उस मनुष्य
( ४६ )
की सी है जो समझता है कि मैं सिंह के कपाल पर पैर रख सकता हूँ, और प्रतिज्ञा की कि मैं चौहानों की समस्त जाति ही को नष्ट कर डालूँगा। उसने तुरंत अनेक देशों के राजाओं के पास पत्र भेजे और हम्मीर के विरुद्ध लड़ाई में योग देने के लिये उन्हें बुलाया। अंग, तैलंग, मगध, मैसूर, कलिंग, वंग, भोट, मेड़पाट, पंचाल, बंगाल, थमिम, भिल्ल, नेपाल तथा दाहल के राजा और कुछ हिमालय के सरदार अपना अपना दल आक्रमणकारी सेना में भरने को लाए। इस बहुरंगिनी सेना में कुछ लोग ऐसे थे जो युद्ध की देवी के प्रेम से आए थे, और कुछ ऐसे थे जो लूट की चाह से आक्रमणकारियों के दल में भरती हुए थे। कुछ लोग केवल उस घमासान युद्ध के दर्शक ही होने के हेतु आए थे जो होनेवाला था। हाथी, घोड़ों, रथों और मनुष्यों की इतनी कसमस थी कि भीड़ में कहीं तिल रखने की जगह नहीं थी। इस भारी समारोह के साथ दोनों भाई नसरतखाँ और उलुगखाँ रणथंभौर प्रदेश की ओर चले। अलाउद्दीन छोटे से दल के साथ इस अभिप्राय से पीछे रह गया जिसमें राजपूतों को यह भय बना रहे कि अभी बादशाह के पास सेना बची है। सेना की संख्या इतनी अधिक थी कि मार्ग में नदियों का जल चुक जाता था इससे यह आवश्यक हुआ कि सेना किसी एक स्थान पर कुछ घंटों से अधिक न ठहरे। कूच पर कूच बोलते दोनों सेना- पति रणथंभौर प्रदेश की सीमा पर पहुँच गए। इससे आक्रमण- कारियों के हृदयों में भिन्न भिन्न भाव उत्पन्न हुए। वे लोग जो पहली लड़ाई में संमिलित नहीं हुए थे कहते थे कि विजय पाना निश्चित है क्योंकि राजपूतों के लिये ऐसी सेना का सामना करना असंभव है। किंतु पहली लड़ाई के योद्धा लोग ऐसा नहीं समझते थे और अपने साथियों से कहते थे कि याद रखना हम्मीर की सेना से सामना करना है अतएव युद्ध के अंत तक डींग हाँकना बंद रखना चाहिए। जब सेना उस घाटी में पहुँची जहाँ उलुगखाँ की पराजय और
( ४७ ) दुर्गति हुई थी तब उसने अपने भाई को शिक्षा दी कि अपनी शक्ति हो पर बहुत भरोसा न करना चाहिए, वरन, चूँकि स्थान विकट और हम्मीर की सेना बली और निपुण है, इससे यह चाल चलनी चाहिए कि किसी को हम्मीर की सभा में भेज दें जो दो चार दिन तक संधि की बातचीत में उन्हें बहलाए रहे; और इस बीच में सेना कुशलपूर्वक पर्वतों को पार करे और अपनी स्थिति दृढ़ कर ले। नसरतखाँ ने अपने भाई की इस अनुभवपूर्ण बात को माना, और मोलहणदेव उन बातों का प्रस्ताव करने के लिये भेजा गया जिनसे मुसल्मान लोग हम्मीर के साथ संधि कर सकते थे। बातचीत होने तक हम्मीर के लोगों ने आक्रमणकारी सेना को उस भयानक घाटी को बे-रोक टोक पार करने दिया। अब खाँ ने अपने भाई को तो उस मार्ग के एक पार्श्व में स्थित किया जो मंडी पथ कहलाता था और उसने स्वयं श्रीमंड़प के दुर्ग को छेंका। साथी राजाओं के दल जैत्रसागर के चारों ओर टिकाए गए। दोनों पक्ष अपनी अपनी घात में थे। मुसल्मानों ने समझा कि हम आक्रमण आरंभ करने के लिये धूर्त्तता से उत्तम स्थिति पा गए हैं; उधर राजपूतों ने विचारा कि शत्रु अंतर्भाग में इतनी दूर बढ़ आए हैं कि वे अब हमसे किसी प्रकार भाग नहीं सकते। रणथंभौर में खाँ के दूत ने राजा की आज्ञा से दुर्ग में प्रवेश पाया; जो कुछ उसने वहाँ देखा उससे उसपर राजा के प्रताप का आतंक छा गया। उसके हेतु जो दरबार हुआ उसमें वह गया, और आवश्यक शिष्टाचार के उपरांत उसने साहसपूर्वक उस सँदेसे को कहा जो लेकर वह आया था। उसने कहा 'मैं विख्यात अलाउद्दीन के भाई उलुगखाँ और नसरतखाँ का दूत होकर राजा के दरबार में आया हूँ; मैं राजा के हृदय में, यदि संभव हो, तो यह बात जमाने के लिये आया हूँ कि अलाउद्दीन ऐसे महाविजयी का सामना करना कैसा निष्फल है और उन्हें अपने सरदार से संधि कर लेने की संमति देने आया हूँ।' उसने हम्मीर से संधि के लिये यह चंद शर्तें
बतलाई—"चाहे आप मेरे सरदार को एक लाख मोहर, चार हाथी और तीन सौ घोड़े भेंट करें और अपनी बेटी अलाउद्दीन को ब्याह "दें, अथवा उन चार विद्रोही मोगल सरदारों को मेरे हवाले कर दें जो अपने स्वामी के कोपभाजन होकर अब आप की शरण में रहते हैं।" दूत ने फिर कहा "यदि आप अपने राज्य और प्रताप को शांति- पूर्वक भोगना चाहते हों तो इन दो में से किसी शर्त को मानकर अपना अभिप्राय सिद्ध करने के लिये आपको अच्छा अवसर मिला है; इससे आपको शत्रुओं का नाश करनेवाले वादशाह अलाउद्दीन की कृपा और सहायता प्राप्त होगी जिसके पास असंख्य दृढ़ दुर्ग, सुसज्जित शस्त्रागार और मेगजीन हैं, जिसने देवगढ़ ऐसे ऐसे अग- णित अजेय दुर्गों पर अधिकार करके महादेव को भी लज्जित किया क्योंकि उनकी ( महादेव की ) ख्याति तो अकेले त्रिपुर के गढ़ को सफलतापूर्वक अधिकृत करने से हुई है।" हम्मीर जो दूत के वचन अधीर होकर सुनता रहा इस अपमा- नकारी सँदेसे से बहुत ही क्रुद्ध हुआ और उसने श्री मोल्हणदेव से कहा कि यदि तुम भेजे हुए दूत न होते तो जिस जीभ से तुमने ये अपमान-सूचक बातें कही हैं वह काट ली गई होती। हम्मीर ने न केवल इन शर्तों में से किसी को मानना अस्वीकार ही किया वरन् अपनी ओर से उतने खड्ग के आघात स्वीकार करने के लिये अला- उद्दीन से प्रस्ताव किया जितनी मुहर हाथी और घोड़े माँगने का उसने साहस किया, और दूत से यह भी कहा कि मुसलमान सर- दार का इस रणभिक्षा को अस्वीकार करना सूअर खाने के बराबर होगा। बिना और किसी शिष्टाचार के दूत सामने से हटा दिया गया। रणथंभौर की सेना युद्ध के लिये सुसज्जित होने लगी। बड़ी योग्यता और पराक्रम के सेनापति भिन्न भिन्न स्थानों की रक्षा के हेतु नियुक्त हुए। दुर्ग की दीवारों पर रक्षकों को धूप से बचाने के लिये इधर उधर डेरे गाड़े गए। कई स्थानों पर उबलता हुआ तेल
( ४६ )
और राल रखी गई कि यदि आक्रमणकारियों में से कोई निकट आने का साहस करे तो उसके शरीर पर वह छोड़ दी जाय, उपयुक्त स्थानों पर तोपें चढ़ा दी गईं। अंत में मुसलमानी सेना भी रण- थंभौर दुर्ग के सामने आई। कई दिन तक घमासान युद्ध होता रहा। नसरतखाँ अचानक एक गोली के लगने से मर गया और बरसात के आ जाने पर उलुगखाँ को लड़ाई बंद करनी पड़ी। वह दुर्ग से कुछ दूर हट गया और उसने अलाउद्दीन के पास अपनी भयानक स्थिति का समाचार भेजा। उसने नसरत खाँ का शव भी समाधिस्थ करने के निमित्त उसके पास भेज दिया। अलाउद्दीन ने यह समाचार पाकर तुरंत रणथंभौर की ओर प्रस्थान किया। यहाँ पहुँचकर उसने तुरंत अपनी सेना को दुर्ग के द्वार की ओर बढ़ाया और उसे छेंक लिया। हम्मीर ने इन कार्यों की तुच्छता सूचित करने के लिये दुर्ग की दीवारों पर कई जगह सूप के झंडे गड़वा दिए। इससे यह अभिप्राय झलकता था कि दुर्ग के संमुख अलाउद्दीन के आगमन से राजपूतों को कुछ भी बोझ वा कष्ट नहीं मालूम होता था। मुसलमान सरदार ने देखा कि उससे साधारण धैर्य और साहस के मनुष्यों से पाला नहीं पड़ा है, और उसने हम्मीर के पास सँदेसा भेजकर यह कहलाया कि मैं तुम्हारी वीरता से बहुत प्रसन्न हूँ, और ऐसा पराक्रमी शत्रु चाहे जिस बात की प्रार्थना करे उसे मानने में मैं प्रसन्न हूँ। हम्मीर ने उत्तर दिया कि यदि अलाउद्दीन जो मैं चाहूँ उसे देने में प्रसन्न है तो मेरे लिये इससे बढ़कर संतोष-की बात और कोई नहीं होगी कि वह दो दिन मेरे साथ युद्ध करे, और मुझे आशा है कि मेरी यह प्रार्थना स्वीकृत होगी। मुसलमान सरदार ने इस उत्तर की यह कहकर बड़ी प्रशंसा की कि वह सर्वथा उसके प्रतिद्वंद्वी के साहस के योग्य है और उससे दूसरे दिन युद्ध रोपने का वचन दिया। इसके अनंतर अत्यंत भीषण और कराल युद्ध हुआ। इन दो दिनों में मुसलमानों के कम से कम ८५००० आदमी मारे गए। दोनों योद्धाओं के बीच कुछ दिन विश्राम
४
( ५० ) करना निश्चित होने पर लड़ाई कुछ काल के लिये बंद हुई। इस बीच में एक दिन राजा ने दुर्ग के प्राचीर पर राधादेवी का
- नाच कराया; उनके चारों ओर बड़ा जमाव था। यह स्त्री क्रम से क्षण क्षण पर घूमती हुई, जिसे संगीत जाननेवाले ही अच्छी तरह समझ सकते थे, जान-बूझकर अपनी पीठ अलाउद्दीन की ओर फेर लेती थी जो किले से थोड़ी दूर नीचे अपने डेरे में बैठा यह देख रहा था। कोई आश्चर्य नहीं कि वह इस आचरण से रुष्ट हुआ, और कोप करके अपने पास के लोगों से उनसे कहा कि क्या मेरे असंख्य साथि- यों में कोई ऐसा है जो इस स्त्री को इतनी दूर से एक तीर से मारकर गिरा सकता है। एक सरदार ने उत्तर दिया कि मैं केवल एक आदमी को जानता हूँ जो यह काम कर सकता है, वह उड़्डानसिंह है जिसे बादशाह ने कैद कर रखा है। कैदी तुरंत छोड़ दिया गया और अला- उद्दीन के पास लाया गया जिसने उसे उस सुंदर लक्ष्य पर अपना कौशल दिखाने की आज्ञा दी। उड़्डानसिंह ने आज्ञानुसार वैसा ही किया, और एक क्षण में उस वीरांगना की सुंदर देह बाण से विद्ध कर दुर्ग की दीवार पर से सिर के बल नीचे गिरी। इस घटना से महिमासाह को बहुत क्रोध हुआ और उसने राजा से अलाउद्दीन के साथ भी वही व्यवहार करने की अनुमति माँगी जो उसने बेचारी राधादेवी के साथ किया था। राजा ने उत्तर दिया कि मुझे तुम्हारी धनुर्विद्या का असाधारण कौशल विदित है, किंतु मैं नहीं चाहता कि अलाउद्दीन इस रीति से मारा जाय क्योंकि उसकी मृत्यु से मेरे साथ शस्त्र ग्रहण करनेवाला कोई पराक्रमी शत्रु न रह जायगा। महिमासाह ने तब प्रत्यंचा चढ़े हुए बाण को उड़्डान- सिंह पर छोड़ा और उसे मार गिराया। महिमासाह के इस कौशल ने अलाउद्दीन को इतना सशंकित कर दिया कि वह तुरंत अपने डेरे को झील के पूर्वीय पार्श्व से हटाकर पश्चिम की ओर ले गया जहाँ पर आक्रमणों से अधिक रक्षा हो सकती थी। जब डेरा हटाया गया तब राजपूतों ने देखा कि शत्रु ने नीचे नीचे सुरंग तैयार कर ली है, और
( ५१ )
खाई के एक भाग पर मिट्टी से ढका हुआ लकड़ी और घास का पुल बाँधने का यत्न किया है । राजपूतों ने इस पुल को तोपों से नष्ट कर दिया, और सुरंग में खौलता हुआ तेल डालकर उन लोगों को मार डाला जो भीतर काम कर रहे थे । इस प्रकार अलाउद्दीन का गढ़ लेने का सब यत्न निष्फल हुआ । उसी समय वर्षा से भी उसे बहुत कष्ट होने लगा जो मूसलाधार होती थी । अतएव उसने हम्मीर के पास संदेसा भेजा कि कृपा करके रतिपाल को मेरे डेरे में भेज दीजिए क्योंकि मुझे उनसे इस अभिप्राय से बातचीत करने की इच्छा है कि जिसमें हमारे और आपके बीच का झगड़ा शांतिपूर्वक तै हो जाय । राजा ने रतिपाल को जाकर अलाउद्दीन की बात सुनने की आज्ञा दी । रणमल रतिपाल के प्रभाव से कुढ़ता था और नहीं चाहता था कि वह इस काम के लिये चुना जाय । अलाउद्दीन रतिपाल से बड़े ही आदर के साथ मिला । उसके दरबार के डेरे में प्रवेश करने पर मुसलमान सरदार अपने स्थान पर से उठा और उसे आलिंगन करके उसने अपनी गद्दी पर बैठाया ओर वह आप उसके बगल में बैठ गया । उसने अमूल्य भेंट उसके सामने रखवाई तथा और भी पुरस्कार देने का वचन दिया । रतिपाल इस सुंदर व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुआ । उस धूर्त मुसलमान ने यह देखकर और लोगों का वहाँ से हट जाने की आज्ञा दी । जब वे सब चले गए तब उसने रतिपाल से बातचीत आरंभ की । उसने कहा— “मैं अलाउद्दीन मुसलमानों का बादशाह हूँ, और मैंने अब तक सैकड़ों दुर्ग ढहाए और लिए हैं । किंतु शस्त्र के बल से रणथंभौर को लेना मेरे लिये असंभव है । इस दुर्ग को घेरने से मेरा अभिप्राय केवल उसके अधिकार की ख्याति पाना है । मैं आशा करता हूँ (जब कि आपने मुझसे मिलना स्वीकार किया है) कि मैं अपना मनोरथ सिद्ध करूँगा और अपनी इच्छा पूरी करने में मुझे आपसे कुछ सहायता पाने का भरोसा है । मैं अपने लिये और अधिक महल और किले नहीं चाहता । जब मैं इस गढ़ को लूँगा तब इसके सिवाय और क्या
( ५२ )
कर सकता हूँ कि उसे आप ऐसे मित्र को दे दूँ ? मुझे तो उसके प्राप्त करने की ख्याति ही से प्रसन्नता होगी।" ऐसी ऐसी फुसलाहटों से रतिपाल का मन फिर गया और उसने इस बात का अलाउद्दीन को निश्चय भी करा दिया। इस पर, अलाउद्दीन अपने लक्ष्य को और भी दृढ़ करने के लिये रतिपाल को अपने हरम में ले गया और वहाँ उसने उसे अपनी सब से छोटी बहिन के साथ खान पान करने के लिये एकांत में छोड़ दिया। यह हो चुकने पर रतिपाल मुसलमानों के डेरे से निकलकर दुर्ग को लौट आया। रतिपाल इस प्रकार अलाउद्दीन के पक्ष में हो गया। अतएव जब वह राजा के पास आया तब उसने जो कुछ मुसलमानों के डेरे में देखा था और जो कुछ अलाउद्दीन ने उससे कहा था, उसका सच्चा वृत्तांत नहीं कहा। यह न कहकर कि अलाउद्दीन का बल राजपूतों के लगा- तार आक्रमण से बिलकुल टूट गया है और वह गढ़ लेने का नाम मात्र करके लौटना चाहता है, उसने कहा कि वह न केवल राजा से दीनतापूर्वक अधीनता स्वीकार कराने ही पर उत्तारू है वरंच उसमें अपनी धमकियों को सच्चा कर दिखाने की सांमर्थ्य है। रतिपाल ने कहा कि अलाउद्दीन इस बात को मानता है कि राजपूतों ने उसके कुछ सिपाहियों को मारा है किंतु इसकी उसे कुछ परवा नहीं, "गोजर की एक टाँग टूटने से वह लँगड़ा नहीं कहा जा सकता।" उसने हम्मीर को संमति दी कि ऐसी दशा में आपको स्वयं इसी रात को रणमल से मिलना चाहिए और उसे आक्रमणकारियों को हटाने पर उद्यत करना चाहिए, देश-द्रोही रतिपाल ने कहा कि रणमल एक असाधा- रण योद्धा है किंतु वह शत्रुओं को हटाने का पूरा पूरा उद्योग नहीं करता है क्योंकि वह राजा से किसी न किसी बात के लिये दुखी है। रतिपाल बोला कि राजा के मिलने से सब बातें ठीक हो जायँगी। राजा से मिलने के उपरांत रतिपाल रणमल से मिलने गया और वहाँ जाकर मानों अपने पुराने मित्र को सर्वनाश से बचाने के निमित्त उसने कहा कि न जाने क्यों राजा का चित्त तुम्हारी ओर से
( ५३ ) फिर गया है। इनसे युद्ध के पहले ही हल्ले में तुम शत्रु की ओर हो जाना। उनसे कहा कि हम्मीर इसी रात को तुम्हें बंदी बनाना चाहता है। उसने उससे वह घड़ी भी बतलाई जब राजा उसके पास इस अभिप्राय से आवेंगे। यह सब करके रतिपाल चुपचाप अपनी इस शठता का परिणाम देखने की प्रतीक्षा करने लगा। जब रतिपाल हम्मीर से मिलने गया था तब उनके पास उनका भाई वीरम भी था। उसने अपने भाई से यह विश्वास प्रगट किया कि रतिपाल ने जो कुछ कहा है वह सत्य नहीं है। शत्रुओं ने उसे अपनी ओर मिला लिया है। उसने कहा कि बोलते समय रतिपाल के मुँह से मद्य की गंध आती थी, और मद्यप का विश्वास करना उचित नहीं। कुल का अभिमान, शील, विवेक, लज्जा, स्वामिभक्ति, सत्य और शौच ये ऐसे गुण हैं जो मद्यपों में नहीं पाए जा सकते। अपनी प्रजा में राजद्रोह का प्रचार रोकने के लिये वीरम ने अपने भाई को रतिपाल के वध की संमति दी। किंतु राजा ने इस प्रस्ताव को यह कहकर अस्वीकार किया कि मेरा दुर्ग इतना दृढ़ है कि वह शत्रु को किसी दशा में भी रोक सकता है; किंतु यदि कहीं संयोगवश रतिपाल के वध के अनंतर यह गढ़ शत्रुओं के हाथ में पड़ जायगा तो लोगों को यह कहने को हो जायगा कि एक निर्दोष मनुष्य के वध के दुष्कर्म के कारण उनका पतन हुआ। इस बीच में रतिपाल ने राजा के रनिवास में यह खबर फैलाई कि अलाउद्दीन केवल राजा की कन्या से विवाह करना चाहता है और यदि उसकी यह इच्छा पूरी हो जाय तो वह संधि करने के लिये प्रस्तुत है, क्योंकि वह और कुछ नहीं चाहता। इस पर रानियों ने राजकन्या से राजा के पास जाकर यह कहने को कहा कि मैं अलाउद्दीन से विवाह करने में सहमत हूँ। वह कन्या वहाँ गई जहाँ उसके पिता बैठे थे और उसने उनसे अपने राज्य और शरीर की रक्षा के हेतु अपने को मुसलमान को दे डालने की प्रार्थना की। उस (कन्या) ने कहा "हे पिता मैं एक व्यर्थ कांच के टुकड़े के समान
( ५४ ) हूँ और आपका राज्य और प्राण चिंतामणि वा पारस पत्थर के समान है; मैं बिनती करती हूँ कि आप उनको रखने के लिये मुझको ‘फेंक दीजिए।” जब वह भोली भाली लड़की इस प्रकार हाथ जोड़कर बोली तब राजा का जी भर आया। उन्होंने उससे कहा, “तुम अभी बालिका हो इससे जो कुछ तुम्हें सिखाया गया है उसके कहने में तुम्हारा कोई दोष नहीं। किंतु मैं नहीं कह सकता कि उनको क्या दंड मिलना चाहिए जिन्होंने तुम्हारे हृदय में ऐसे ख्याल भर दिए हैं। स्त्रियों का अंग भंग करना राजपूतों का काम नहीं, नहीं तो उनकी जीभ काट ली जाती जिन्होंने ऐसी कुत्सित बात मेरी कन्या के कान में कही।” हम्मीर ने फिर कहा “पुत्री ! तुम अभी इन बातों को समझने के लिये बहुत छोटी हो इससे तुम्हें बतलाना व्यर्थ है। किंतु तुम्हें म्लेच्छ मुसलमान को देकर सुख भोगना मेरे लिये ऐसा ही है जैसा अपना ही मांस खाकर जीवन काटना। ऐसे संबंध से मेरे कुल में कलंक लगेगा, मुक्ति की आशा नष्ट होगी, इस संसार में हमारे अंतिम दिन कडुए हो जायेंगे। मैं ऐसे कलंकित जीवन की अपेक्षा दस हजार वार मरना अच्छा समझता हूँ।” अब वे चुप हुए और दृढ़ता तथा स्नेह- पूर्वक अपनी कन्या को चले जाने को उन्होंने कहा। राजा, रतिपाल की संमति के अनुसार संध्या के समय अपनी शंकाओं को मिटाने के लिये रणमल के डेरे पर जाने को तैयार हुए, साथ में उन्होंने बहुत थोड़े आदमी लिए। जब वे रणमल के डेरे के निकट पहुँचे तब उसको (रणमल को) रतिपाल की बात याद आई। वह यह समझकर कि यदि मैं यहाँ ठहरूँगा तो मेरा बंदी होना निश्चय है, अपने दल के सहित गढ़ से भाग निकला और अलाउद्दीन की ओर जा मिला; यह देखकर रतिपाल ने भी वैसा ही किया। राजा इस प्रकार ठगे और घबड़ाए हुए कोट में लौट आए। उन्होंने भंडारी को बुलाकर भंडार की दशा पूछी कि कितने दिन तक सामान चल सकता है। भंडारी ने सच्ची बात कहने में अपने प्रभाव की
( ५५ ) हानि समझ कहा कि सामान बहुत दिन तक के लिये काफी है। किंतु ज्योंही यह कहकर वह फिरा त्योंही विदित हुआ कि राजभांडार में कुछ भी अन्न नहीं है। राजा ने यह समाचार पाकर वीरम को उसके मारने और उसकी समस्त संपत्ति पद्मसागर में फेंक देने की आज्ञा दी। उस दिन की अनेक आपत्तियों को झेलकर, राजा शिथिलता से अपनी शय्या पर जा पड़े। किंतु उनकी आँखों में उस भयावनी रात को नींद नहीं आई। जिन लोगों के साथ वे भाई से बढ़कर स्नेह का व्यवहार करते थे उनका उन्हें ऐसी दशा में अकेले छोड़कर एक एक करके चल खड़े होना उनको असह्य जान पड़ता था। जब सबेरा हुआ तब उन्होंने नित्य-क्रिया की और दरबार में बैठकर वे उस समय का दशा पर विचार करने लगे। उन्होंने सोचा कि जब हमारे राजपूतों ही ने हमें छोड़ दिया तब महिमासाह का क्या विश्वास, जो मुसलमान और विजातीय है। इसी दशा में उन्होंने महिमासाह को बुला भेजा और उससे कहा "सच्चा राजपूत होकर मेरा यह धर्म्म है कि देश की रक्षा में मैं अपना प्राण त्याग दूँ, किंतु मेरे विचार में यह अनुचित है कि वे लोग जो मेरी जाति के नहीं, मेरे हेतु युद्ध में अपने प्राण खोवें, इससे मेरी इच्छा है कि तुम कोई रक्षा का ऐसा स्थान बतलाओ जहाँ कि तुम सपरिवार जा सकते हो जिससे मैं तुम्हें कुशलपूर्वक वहाँ पहुँचा दूँ।" राजा के इस शील से संकुचित होकर, महिमासाह बिना कुछ उत्तर दिए, अपने घर लौट गया, और वहाँ तलवार लेकर उसने अपने जनाने के सब लोगों को काट डाला और हम्मीर के पास आकर कहा कि मेरी स्त्री और मेरे लड़के जाने को तैयार हैं किंतु मेरी स्त्री एक बेर अपने राजा का मुँह देखना चाहती है जिसकी कृपा से उसने इतने दिनों तक सुख किया। राजा ने यह प्रार्थना अंगीकार की और अपने भाई वीरम के साथ वे महिमासाह के घर गए। किंतु वहाँ जाने पर यह हत्याकांड देख उनके आश्चर्य और शोक का ठिकाना न रहा। राजा, महिमासाह को हृदय से लगाकर
( ५६ )
बच्चे के समान रोने लगे। उन्होंने उससे चले जाने को कहने के कारण अपने को दोषी ठहराया और कहा कि ऐसी अलौकिक स्वामि- 'भक्ति का बदला नहीं हो सकता। अतः धीरे धीरे, वे कोट में लौट आए और प्रत्येक वस्तु को गई हुई समझ, उन्होंने अपने लोगों से कहा कि तुम लोग जो उचित समझो वह करो, मैं तो शत्रु के बीच लड़कर प्राण देने को उद्यत हूँ। इसकी तैयारी में, उनके परिवार की स्त्रियाँ रंगदेवी के साथ चिता पर जलकर भस्म हो गईं। जब राजा की कन्या चिता पर चढ़ने लगी तब राजा शोक के वशीभूत हुए। वे उसे हृदय से लगाकर छोड़ते ही न थे। किंतु उसने अपने को पिता की गोद से छुड़ाकर अग्नि में विसर्जन कर दिया। जब चौहानों की सती साध्वी ललनाओं की राख के ढेर के अतिरिक्त और कुछ न रह गया तब हम्मीर ने मृतक संस्कार किया और तिलांजलि देकर उनकी आत्माओं को शांत किया। इसके अनंतर वे अपनी बची हुई स्वामिभक्त सेना को लेकर गढ़ के बाहर निकले और शत्रुओं पर टूट पड़े। भीषण संमुख युद्ध उपस्थित हुआ। पहले वीरम युद्ध की कसमस के बीच लड़ते हुए गिरे, फिर महिमासाह के हृदय में गोली लगी। इसके पीछे जाज, गंगाधर, ताक और क्षेत्रसिंह परमार ने उनका साथ दिया। सबके अंत में महापराक्रमी हम्मीर सैकड़ों भालों से बिधे हुए गिरे। प्राण का लेश रहते भी शत्रु के हाथ में पड़ना बुरा समझ उन्होंने एक ही वार में अपने हाथों से सिर को धड़ से जुदा कर दिया और इस प्रकार अपने जीवन को शेष किया। इस प्रकार चौहानों के अंतिम राजा हम्मीर का पतन हुआ ! यह शोच- नीय घटना उनके राज्य के अठारहवें वर्ष में श्रावण के महीने में हुई। यहाँ पर यह कथा समाप्त होती है। दोनों के मिलान करने पर मुख्य मुख्य बातों में आकाश-पाताल का अंतर जान पड़ता है। किस में कहाँ तक सत्यता है इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। दोनों कथाओं में हम्मीर के पिता का नाम जैत्रसिंह लिखा है अतएव इस संबंध में कोई संदेह की बात नहीं जान पड़ती। हम्मीररासो
( ५७ ) में लिखा है कि कि हम्मीर का जन्म विक्रम संवत् ११४१ शाके १००८ में हुआ। साथ ही यह भी लिखा है कि अलाउद्दीन का जन्म भी इसी दिन हुआ। इस हिसाब से हम्मीर और अलाउद्दीन का जन्म १०८४ ई० में हुआ। पर अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों से यह बात ठीक नहीं जान पड़ती। हम्मीर महाकाव्य में हम्मीर के गद्दी पर बैठने का संवत् १३३० (सन् १२८३ ई०) दिया है। यह ठीक जान पड़ता है। फिर हम्मीर महाकाव्य में लिखा है कि चौहानराज की मृत्यु उनके राज्य के अठारहवें वर्ष में अर्थात् संवत् १३४८ (सन् १३०१ ई०) में हुई। अमोर खुशक की तारीख आलांई में यह तिथि तीसरी जीलकदः ७०० हिजरी (जुलाई १३०१ ई०) दी है। मुसलमानी इतिहासों से विदित है कि सन् १२९६ में सुलतान अलाउद्दीन मुहम्मदशाह अपने चाचा जलालुद्दीन फीरोज- शाह को मारकर गद्दी पर बैठा, और सन् १३१६ ई० तक राज्य करता रहा। इस अवस्था में हम्मीररासो में दिए हुए संवत् ठीक नहीं हो सकते। कदाचित् यहाँ यह कह देना भी अनुचित न होगा कि हम्मीररासो में हम्मीर की जो जन्म कुंडली दी है वह भी ठीक नहीं है। दूसरी बात जो इस काव्य के संबंध में विचार करने की है वह यह है कि हम्मीर की अलाउद्दीन से लड़ाई क्यों हुई। हम्मीररासो तथा ऐसे ही अन्य हिंदी काव्यों में मीर महिमाशाह की रक्षा के लिये युद्ध का होना लिखा गया है और इसमे कोई संदेह नहीं कि इस अद्भुत कथा से हम्मीर का गौरव बहुत कुछ बढ़ जाता है और कथा में भी एक अद्भुत रस का संचार हो आता है। पर हम्मीर महाकाव्य में इसका कहीं नाम भी नहीं है और न कहीं किसी पुराने इतिहास में इसका वर्णन मिलता है। पर महिमाशाह का हम्मीर के यहाँ रहना निश्चित है तथा उसके अपने बाल बच्चों को मारकर लड़ाई में हम्मीर का साथ देने की बात भी ठीक है। यह अवस्था तभी हो सकती है जब महिमाशाह अपने को हम्मीर का किसी बड़े उपकार के लिये ऋणी मानता हो। अलाउद्दीन का साथ न देकर हम्मीर का
( ५८ ) साथ देना एक मुसलमान सरदार के लिये निस्संदेह बड़े आश्चर्य की बात है। हिंदी काव्यों में जिन घटनाओं का उल्लेख है उनका होना तो कोई असंभव बात है ही नहीं। भारतवर्ष में जितने बड़े युद्ध हुए हैं सब स्त्रियों के ही कारण हुए हैं। पृथ्वीराज के समय में तो मानों इसकी पराकाष्ठा हो गई थी। पर मुसलमानों के लिये यह निन्दा की बात थी। इस- लिये मुसलमान इतिहासकारों का इस घटना को छोड़कर युद्ध का कुछ दूसरा ही कारण बताना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पर नयनचंद्र सूरि का कुछ न कहना अवश्य संदेह उत्पन्न करता है। अलाउद्दीन ने जिस नीचता से रतिपाल को मिला लिया इसका तो यह कवि पूरा पूरा वर्णन करता है। यहाँ के कुछ श्लोक उद्धृत कर देना उचित जान पड़ता है— अंतरंतःपुरं नीत्वा शकेशास्तमभोजयत् । अपीप्यत्तद्भगिन्या च प्रतीत्यै मदिरामपि ॥ ८१ ॥ प्रतिश्रुत्य शकेशोक्तं ततः सर्वं स दुर्मतिः । विरोधोद्बोधिनीर्वाचो गत्वा राज्ञे न्यरूपयत् ॥ ८२ ॥ [ सर्ग १३ ] इनसे यह स्पष्ट विदित होता है कि नयनचंद्र कुछ मुसलमानों का पक्षपाती नहीं था। कुछ लोग कह सकते हैं कि जैनी होने से उसका विरोधी होना असंभव नहीं है। मेरा अनुमान तो यह है कि उसने मुसलमानी इतिहासों के आधार पर अपना काव्य लिखा है क्योंकि उसमें कथित घटनाएँ और सन्-संवत् सब मुसलमानी इतिहासों से मिलते हैं। जो कुछ हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐतिहासिक दृष्टि से नयनचंद्र सूरि का काव्य जोधराज के रासो से अधिक प्रामाणिक है। तीसरी घटना, जिसपर विचार करना आवश्यक है, वह हम्मीर की मृत्यु है। दोनों काव्यों से यह सिद्ध होता है कि हम्मीर ने आत्म- हत्या की। हम्मीररासो में इसका कारण कुछ और ही लिखा है और हम्मीर महाकाव्य में कुछ और है। जोधराज के अनुसार हम्मीर को
( ५६ ) विजय प्राप्त हुई और विजय के उत्साह में उसने मुसलमानी झंडे निशानों को आगे करके अपने गढ़ की ओर पयान किया जिसपर रानियों और रनिवास की अन्य महिलाओं ने यह समझा कि हम्मीर की हार हुई और मुसलमानी सेना गढ़ को लेने के लिये आ रही है। इसपर अपने सतीत्व की रक्षा के निमित्त उन्होंने अग्नि में अपने प्राण दे दिए । इस पर हम्मीर को ऐसी ग्लानि हुई कि उसने भी अपने प्राण देकर अपने संताप को शांत किया। नयनचंद्र के अनु- सार रणमल और रतिपाल के विश्वासघात पर विजय की सब आशा जाती रही और हम्मीर ने पहले राजमहिलाओं को अग्निदेव के अर्पण कर रण में वीरोचित मृत्यु से मरना विचारा । अंत में जब उसका शरीर रणक्षेत्र में बिंधकर गिर पड़ा तो उसे आशंका हुई कि कहीं मुसलमानों के हाथ से मेरे प्राण न जायँ । इसलिये वहीं उसने अपने मस्तक को अपने हाथ से काटकर इस आशंकित अपमान से अपनी रक्षा की। दोनों बातों में राजमहिलाओं का अग्नि में आत्म- समर्पण करना और हम्मीर का आत्महत्या करना मिलता है और इन घटनाओं के संघटित होने में भी कोई संदेह या आश्चर्य की बात नहीं है। जो कथा इस संबंध में दोनों काव्यों में दी है वह युक्तिसंगत जान पड़ती है। कौन कहाँ तक सत्य है, इसका निर्णय करना तो बड़ा कठिन है, विशेष करके ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में तो इस संबंध में कुछ करना व्यर्थ है। जोधराज का यह लिखना कि अला- उद्दीन ने समुद्र में कूदकर अपने प्राण दे दिए, निस्संदेह असत्य जान पड़ता है। इस युद्ध के १५ वर्ष पीछे तक वह जीता रहा, इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। जो कुछ हो, ऐतिहासिक अंश में गड़बड़ रहने पर भी हम्मीर की कथा बड़ी अद्भुत है और भारतवर्ष के गौरव को बढ़ानेवाली है। कौन ऐसा स्वदेशाभिमानी होगा जो राजमहिलाओं के जौहर और हम्मीर की वीरता तथा उसके साहस का वृत्तांत पढ़कर अपने को धन्य न मानता हो और जिसका हृदय देशगौरव से न भर जाता हो। धन्य
( ६० )
है वह देश जहाँ ऐसे ऐसे वीर हो गए हैं। धन्य हैं वे स्त्रियाँ जो अपने सतीत्व की रक्षा के लिये बिना कुछ सोचे विचारे इस क्षणभंगुर 'शरीर को नष्ट कर डालती थीं और धन्य हैं वे लोग जो उनके वृत्तांतों को पढ़कर आनंदित और प्रफुल्लित होते हों और जिन्हें अपने देश के गौरव की रक्षा का उत्साह होता हो । मैं पहले लिख चुका हूँ कि दो हम्मीर हो गए हैं। एक के विषय में तो मैंने इतना कुछ मसाला इकट्ठा कर दिया है। मेवाड़ के हम्मीर के विषय में भी कुछ कह देना आवश्यक जानकर ठाकुर हनुवंत सिंह लिखित मेवाड़ के इतिहास से इनका वृत्तांत उद्धृत कर देता हूँ। वह इस प्रकार है— “लखमसी जी के पीछे मुसलमानों से बैर लेनेवाला अब केवल उनका लड़का अजयसिंह था जो कि केलवाड़े में रहता था। यह केलवाड़ा अर्वली पर्वत के उच्च प्रदेश में है। वहाँ उसकी रक्षा करने- वाले भील लोग थे। अजयसिंह जी के बड़े भाई अरसी जी के कुँवर हम्मीरसिंह को अपने पीछे गद्दी पर बिठलाने का वचन लखमसी जी ने अजयसिंह से ले लिया था। इससे तथा अजयसिंह के पुत्र के हम्मीरसिंह के समान पराक्रमी न होने से उनके उत्तराधिकारी हम्मीर- सिंह ही थे। इनकी माता के विषय में यह कथा प्रसिद्ध है कि एक दिन अरसी जी युवराजत्व अवस्था में ऊदबा गाँव के जंगल में आखेट को गए थे। वहाँ जब एक सूअर के पीछे इन्होंने घोड़ा दिया तो वह भागकर ज्वार के खेत में घुस गया। ज्योंही अरसी जी सूअर के पीछे खेत में जाने लगे त्योंही एक कन्या ने, जो उस खेत की चौकसी कर रही थी, इनको भीतर जाने से रोका और कहा कि ठहरो सूअर को मैं बाहर निकाले देती हूँ। फिर उस लड़की ने ज्वार के पेड़ को उखाड़ सूअर को दो चार सपाटा लगाकर उसे उनकी ओर खदेड़ दिया। उस लड़की की निर्भयता को देख आखेटकों को बड़ा आश्चर्य हुआ। पीछे जब कि वे एक नाले पर विश्राम करने के लिये ठहरे हुए थे तो सनसनाता हुआ दूर से एक पत्थर का टुकड़ा आया और
( ६१ ) घोड़े की टाँग में ऐसे जोर से लगा कि उसका पैर टूट गया । बहुत ही छोटे से पत्थर के टुकड़े से घोड़े का पैर टूटा हुआ देख खोजा गया तो उसकी मारनेवाली भी वही खेत की रखवालिन कन्या निकली । पक्षियों के उड़ाने को उसने गोफन में रख कर गिल्ला फेंका था परंतु दैवयोग से वह घोड़े को आ लगा । जब उसने यह सुना कि घोड़े को चोट लग गई है तो अरसी जी के पास जाकर अपने बिना जाने अपराध की क्षमा बड़ी नम्रता से माँगी । संध्या को लौटते समय अरसी जी को फिर वही कन्या अपने घर को जाती हुई राह में मिली । यह लड़की माथे पर दूध का मटका रखे और दोनों हाथों में दो पड़रे ( भैंस के बच्चे ) लिए हुए जा रही थी, उस समय अरसी जी के साथियों में से एक ने हँसी में उसके दूध को गिरा देने का विचार किया और वह मनुष्य घोड़ा दौड़ाता हुआ उसके पास होकर निकला । इससे यह लड़की कुछ भी न घबड़ाई और अपने हाथ में का एक पड़रा घोड़े के पिछले पैरों में ऐसा मारा कि घोड़ा और सवार दोनों धरती पर गिर पड़े और हँसी के बदले उलटी अपनी हानि कर ली । अरसी जी ने घर जाकर निश्चय कराया तो वह कन्या चंदाना वंश ( चहुवानों की एक शाखा है ) के एक राजपूत की पुत्री निकली । अरसी जी ने उसके बाप को बुलवाकर उससे अपने विवाह करने के लिये वह लड़की माँगी, परंतु उस राजपूत ने निषेध कर दिया । घर पहुँचकर जब अपनी स्त्री से उसने सब वृत्तांत कहा तो वह पति के इस कार्य से बहुत अप्रसन्न हुई और लग्न स्वीकार करने के लिये अपने पति को फिर अरसी जी के पास उसने लौटाया । अंत में अरसी जी का उस कन्या के साथ विवाह हुआ, जिसके पेट से अति पराक्रमी हम्मीरसिंह ने जन्म लिया । सिंहनी के पेट में तो सिंह ही जन्म लेता है । हम्मीरसिंह जी बचपन में अपनी ननसाल में रहकर बड़े हुए थे । "हम्मीरसिंह के काका अजयसिंह अब केलवाड़े में रहते थे तो उनकी मुसलमानों के सिवाय पहाड़ियों में रहनेवाले राजपूत सरदारों
( ६२ )
के साथ भी बड़ी लड़ाई रही। इन पहाड़ियों का मुखिया बालेछा जाति का मूंजा नामी एक राजपूत था जिसके साथ लड़ाई करने में एक बार अजयसिंह बहुत घायल हुए। इस समय अजयसिंह के दो पुत्र सजनसी और अजीतसी भी थे जिनकी आयु अनुमान १५ वर्ष की थी परंतु वे कुछ भी वीरता लड़ाई में न दिखा सके। इससे उन्होंने अपने भतीजे हम्मीरसिंह को बुला लिया और उनको सब वृत्तांत कह सुनाया। हम्मीरसिंह अपने दोनों चचेरे भाइयों से बड़े न थे परंतु तो भी उन्होंने मूँजा बालेछा का सिर काट लाना ऐसा विचार निश्चय करके वे निकले। थोड़े दिनों में उन्होंने मूंजा का सिर काट लाकर अपने काका को भेंट किया। अजयसिंह इस बात से बहुत प्रसन्न हुए, और मूँजा के ही रुधिर से तिलक करके अपने पीछे हम्मीरसिंह को राज्य का अधिकारी ठहराया। जब अजयसिंह मरे तो उनसे पहले ही अजमाल मर चुके थे। सजनसी गद्दी के लिये हम्मीरसिंह को अधिकारी नियत हुआ देख दक्षिण में चले गए, जिनके वंश में एक ऐसा वीर पुरुष जन्मा कि जिसने मुसलमानों से पूरा बदला ही न लिया किंतु अपने असामान्य पराक्रम और साहस से मुसलमानी राज्य का मूलोच्छेदन ही कर दिया। यह पुरुष मरहठों के राज्य की नींव जमानेवाला सितारे का राजा शिव जी था जो समस्त भारतवर्ष में विख्यात है। सजनसी से बारहवीं पीढ़ी में यह हिंदू धर्म्मरक्षक और अतुलित पराक्रमो वीर पुरुष शिव जी हुआ है। सजनसी जी से पीछे दुलीपजी, सीओजी, भोराजी, देवराज, उग्रसेन, माहुल जी, खेलुजी जनकोजी, संतोजी, शाहजी और शिव जी हुए। अजयसिंह के पीछे हम्मीरसिंह सं० १३०१ ई० में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय मेवाड़ की गिरती दशा होने से आस-पास के राजा लोगों ने मेवाड़ के राणाओं को अपना शिरोमणि मानना छोड़ दिया था। हम्मीरसिंह ने अपने पहाड़ी साथियों को इकट्ठा करके जिन जिन राजाओं ने इनको अधिष्ठाता मानना छोड़ दिया था उन सभों को परास्त करके अपने अधीन किया। इस प्रकार