हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) साथ देना एक मुसलमान सरदार के लिये निस्संदेह बड़े आश्चर्य की बात है। हिंदी काव्यों में जिन घटनाओं का उल्लेख है उनका होना तो कोई असंभव बात है ही नहीं। भारतवर्ष में जितने बड़े युद्ध हुए हैं सब स्त्रियों के ही कारण हुए हैं। पृथ्वीराज के समय में तो मानों इसकी पराकाष्ठा हो गई थी। पर मुसलमानों के लिये यह निन्दा की बात थी। इस- लिये मुसलमान इतिहासकारों का इस घटना को छोड़कर युद्ध का कुछ दूसरा ही कारण बताना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पर नयनचंद्र सूरि का कुछ न कहना अवश्य संदेह उत्पन्न करता है। अलाउद्दीन ने जिस नीचता से रतिपाल को मिला लिया इसका तो यह कवि पूरा पूरा वर्णन करता है। यहाँ के कुछ श्लोक उद्धृत कर देना उचित जान पड़ता है— अंतरंतःपुरं नीत्वा शकेशास्तमभोजयत् । अपीप्यत्तद्भगिन्या च प्रतीत्यै मदिरामपि ॥ ८१ ॥ प्रतिश्रुत्य शकेशोक्तं ततः सर्वं स दुर्मतिः । विरोधोद्बोधिनीर्वाचो गत्वा राज्ञे न्यरूपयत् ॥ ८२ ॥ [ सर्ग १३ ] इनसे यह स्पष्ट विदित होता है कि नयनचंद्र कुछ मुसलमानों का पक्षपाती नहीं था। कुछ लोग कह सकते हैं कि जैनी होने से उसका विरोधी होना असंभव नहीं है। मेरा अनुमान तो यह है कि उसने मुसलमानी इतिहासों के आधार पर अपना काव्य लिखा है क्योंकि उसमें कथित घटनाएँ और सन्-संवत् सब मुसलमानी इतिहासों से मिलते हैं। जो कुछ हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐतिहासिक दृष्टि से नयनचंद्र सूरि का काव्य जोधराज के रासो से अधिक प्रामाणिक है। तीसरी घटना, जिसपर विचार करना आवश्यक है, वह हम्मीर की मृत्यु है। दोनों काव्यों से यह सिद्ध होता है कि हम्मीर ने आत्म- हत्या की। हम्मीररासो में इसका कारण कुछ और ही लिखा है और हम्मीर महाकाव्य में कुछ और है। जोधराज के अनुसार हम्मीर को