हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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कर सकता हूँ कि उसे आप ऐसे मित्र को दे दूँ ? मुझे तो उसके प्राप्त करने की ख्याति ही से प्रसन्नता होगी।" ऐसी ऐसी फुसलाहटों से रतिपाल का मन फिर गया और उसने इस बात का अलाउद्दीन को निश्चय भी करा दिया। इस पर, अलाउद्दीन अपने लक्ष्य को और भी दृढ़ करने के लिये रतिपाल को अपने हरम में ले गया और वहाँ उसने उसे अपनी सब से छोटी बहिन के साथ खान पान करने के लिये एकांत में छोड़ दिया। यह हो चुकने पर रतिपाल मुसलमानों के डेरे से निकलकर दुर्ग को लौट आया। रतिपाल इस प्रकार अलाउद्दीन के पक्ष में हो गया। अतएव जब वह राजा के पास आया तब उसने जो कुछ मुसलमानों के डेरे में देखा था और जो कुछ अलाउद्दीन ने उससे कहा था, उसका सच्चा वृत्तांत नहीं कहा। यह न कहकर कि अलाउद्दीन का बल राजपूतों के लगा- तार आक्रमण से बिलकुल टूट गया है और वह गढ़ लेने का नाम मात्र करके लौटना चाहता है, उसने कहा कि वह न केवल राजा से दीनतापूर्वक अधीनता स्वीकार कराने ही पर उत्तारू है वरंच उसमें अपनी धमकियों को सच्चा कर दिखाने की सांमर्थ्य है। रतिपाल ने कहा कि अलाउद्दीन इस बात को मानता है कि राजपूतों ने उसके कुछ सिपाहियों को मारा है किंतु इसकी उसे कुछ परवा नहीं, "गोजर की एक टाँग टूटने से वह लँगड़ा नहीं कहा जा सकता।" उसने हम्मीर को संमति दी कि ऐसी दशा में आपको स्वयं इसी रात को रणमल से मिलना चाहिए और उसे आक्रमणकारियों को हटाने पर उद्यत करना चाहिए, देश-द्रोही रतिपाल ने कहा कि रणमल एक असाधा- रण योद्धा है किंतु वह शत्रुओं को हटाने का पूरा पूरा उद्योग नहीं करता है क्योंकि वह राजा से किसी न किसी बात के लिये दुखी है। रतिपाल बोला कि राजा के मिलने से सब बातें ठीक हो जायँगी। राजा से मिलने के उपरांत रतिपाल रणमल से मिलने गया और वहाँ जाकर मानों अपने पुराने मित्र को सर्वनाश से बचाने के निमित्त उसने कहा कि न जाने क्यों राजा का चित्त तुम्हारी ओर से