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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 258 में से

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पृष्ठ 65

( ५१ )

खाई के एक भाग पर मिट्टी से ढका हुआ लकड़ी और घास का पुल बाँधने का यत्न किया है । राजपूतों ने इस पुल को तोपों से नष्ट कर दिया, और सुरंग में खौलता हुआ तेल डालकर उन लोगों को मार डाला जो भीतर काम कर रहे थे । इस प्रकार अलाउद्दीन का गढ़ लेने का सब यत्न निष्फल हुआ । उसी समय वर्षा से भी उसे बहुत कष्ट होने लगा जो मूसलाधार होती थी । अतएव उसने हम्मीर के पास संदेसा भेजा कि कृपा करके रतिपाल को मेरे डेरे में भेज दीजिए क्योंकि मुझे उनसे इस अभिप्राय से बातचीत करने की इच्छा है कि जिसमें हमारे और आपके बीच का झगड़ा शांतिपूर्वक तै हो जाय । राजा ने रतिपाल को जाकर अलाउद्दीन की बात सुनने की आज्ञा दी । रणमल रतिपाल के प्रभाव से कुढ़ता था और नहीं चाहता था कि वह इस काम के लिये चुना जाय । अलाउद्दीन रतिपाल से बड़े ही आदर के साथ मिला । उसके दरबार के डेरे में प्रवेश करने पर मुसलमान सरदार अपने स्थान पर से उठा और उसे आलिंगन करके उसने अपनी गद्दी पर बैठाया ओर वह आप उसके बगल में बैठ गया । उसने अमूल्य भेंट उसके सामने रखवाई तथा और भी पुरस्कार देने का वचन दिया । रतिपाल इस सुंदर व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुआ । उस धूर्त मुसलमान ने यह देखकर और लोगों का वहाँ से हट जाने की आज्ञा दी । जब वे सब चले गए तब उसने रतिपाल से बातचीत आरंभ की । उसने कहा— “मैं अलाउद्दीन मुसलमानों का बादशाह हूँ, और मैंने अब तक सैकड़ों दुर्ग ढहाए और लिए हैं । किंतु शस्त्र के बल से रणथंभौर को लेना मेरे लिये असंभव है । इस दुर्ग को घेरने से मेरा अभिप्राय केवल उसके अधिकार की ख्याति पाना है । मैं आशा करता हूँ (जब कि आपने मुझसे मिलना स्वीकार किया है) कि मैं अपना मनोरथ सिद्ध करूँगा और अपनी इच्छा पूरी करने में मुझे आपसे कुछ सहायता पाने का भरोसा है । मैं अपने लिये और अधिक महल और किले नहीं चाहता । जब मैं इस गढ़ को लूँगा तब इसके सिवाय और क्या