भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

( ३८ ) त्रिभुवनेंद्र उनसे मिलने आए और अपने साथ बहुत सी अमूल्य भेंट लाए। इन विशद कार्यों को पूरा करके हम्मीर अपनी राजधानी को लौट आए। राजा के आगमन से वहाँ बड़ी धूम हुई। राज्य के सब से बड़े कर्म्मचारी धर्मसिंह के साथ दल बाँधकर अपने विजयी राजा की अगवानी के लिये बाहर आए। मार्ग के दोनों ओर प्रेमी प्रजा अपने राजा के दर्शन के हेतु उत्सुक खड़ी थी। इसके कुछ दिन पीछे हम्मीर ने अपने गुरु विश्वरूप से कोटियज्ञ का फल पूछा और उनसे यह उत्तर पाकर कि इस यज्ञ के पूरा करने से स्वर्ग लोक प्राप्त होता है राजा ने आज्ञा दी कि कोटियज्ञ की तय्यारी की जाय। चट देश के सब भागों से विद्वान ब्राह्मण बुलाए गए, और यज्ञ पवित्र शास्त्रों में लिखे विधानों के अनुसार समाप्त किया गया। ब्राह्मणों को खूब भोजन कराकर उन्हें भरपूर दक्षिणा दी गई। इसके उपरांत राजा ने एक महीने तक के लिये मुनिव्रत ठाना। जब कि रणथंभौर में ये सब बातें हो रही थीं, दिल्ली में, जहाँ अलाउद्दीन राज्य करता था, कई परिवर्त्तन हुए। रणथंभौर में जो कुछ हो रहा था उसका समाचार पाकर उसने अपने छोटे भाई उलुगखाँ १ को सेना लेकर चौहान प्रदेश पर चढ़ाई करने और उसको उजाड़ देने की आज्ञा दी। उसने कहा "जैत्रसिंह हम लोगों को कर देता था; पर यह उसका बेटा न कि केवल कर ही नहीं देता वरन् हम लोगों के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिये प्रत्येक अवसर ताकता रहता है। यह उसकी शक्ति को नष्ट करने का अच्छा अवसर है।" ऐसी आज्ञा पाकर उलुगखाँ ने ८०००० सवार लेकर रणथंभौर प्रदेश पर चढ़ाई की। जब यह सेना वर्णनाशा नदी पर पहुँची तब उसने देखा कि सड़कें, जो शत्रु के प्रदेश को गई हैं, सवारों के चलने योग्य नहीं हैं। इससे वह कई दिन वहाँ टिका रहा; इस बीच में उसने आस पास के गाँवों को जलाया और नष्ट किया। १-मालिक मुईजुद्दीन उलुगखाँ। ब्रिग्स ने अपने फिरिश्ता के अनुवाद में इसको "अल्फखाँ" लिखा है।