हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९ ) यहाँ रणथंभौर में मुनिव्रत पूरा न होने के कारण राजा स्वयं युद्धक्षेत्र में न जा सकते थे। अतएव उन्होंने भीमसिंह और धर्म्मसिंह अपने सेनापतियों को आक्रमणकारियों को भगाने के लिये भेजा।° राजा की सेना वर्णनाशानदी के किनारे एक स्थान पर आक्रमण- कारियों पर टूट पड़ी और उसने शत्रुओं को, जिनके बहुत से लोग मारे गए, परास्त किया। इस जयलाभ से संतुष्ट होकर भीमसिंह रणथंभौर की ओर लौटने लगा, और उलुगखाँ अपनी सेना का प्रधान अंग साथ लिए छिपकर उसके पीछे पीछे बढ़ने लगा। अब यह हुआ कि भीमसिंह के सिपाही, जिन्होंने लूट में बहुत सा धन पाया था, उसको रक्षापूर्वक अपने अपने घर ले जाने को व्यग्र थे, और इसी व्यग्रता में उन्होंने अपने नायक को पीछे छोड़ दिया जिसके साथ केवल अनुचरों की एक छोटी सी मंडली रह गई। जब इस प्रकार भीमसिंह हिंदावत घाटी के बीचोबीच पहुँचा तब उसने विजय के अभिमान में उन नगाड़ों और बाजों को जोर से बजाने की आज्ञा दी जिनको उसने शत्रु से छीना था। इस कार्य का फल अचिंत्यपूर्व और आपत्तिजनक हुआ। उलुगखाँ ने अपनी सेना को छोटे छोटे दलों में भीमसिंह का पीछा करने की आज्ञा दे रखी थी और बाजा बजाते ही उसे शत्रु के ऊपर जयलाभ की सूचना समझ, उसपर टूट पड़ने का आदेश दे रखा था। अतः जब मुसल्मानों के पृथक् पृथक् दलों ने नगाड़ों का शब्द सुना तब वे चारों ओर से घाटी में आ पहुँचे, और उलुगखाँ भी एक ओर से आकर भीमसिंह से युद्ध करने लगा। हिंदू सेनापति कुछ काल तक यह बेजोड़ की लड़ाई लड़ता रहा, पर अंत में घायल हुआ और मारा गया। शत्रु के ऊपर यह जयलाभ पाकर उलुगखाँ दिल्ली लौट गया। यज्ञ पूरा होने के उपरांत हम्मीर ने युद्ध का वृत्तांत और अपने सेनापति भीमसिंह की मृत्यु का समाचार सुना। उन्होंने धर्म्मसिंह को भीमसिंह का साथ छोड़ने के लिये धिक्कारा, उसको अंधा कहा क्योंकि वह यह न देख सका कि उलुगखाँ सेना के पीछे पीछे था।