भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

( ३ )

हुई । जिस समय शेषशायी भगवान् के नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए वह वाराह कल्प का आदि था । मानवसृष्टि—जलज से उत्पन्न हुआ ब्रह्मा बहुत समय पर्य्यन्त इसी विचार मे मुग्ध रहा कि मैं क्या करूँ। इसी प्रकार जब बहुत समय बीत गया तब उसे आपसे आप अनुभव हुआ कि तप करके सृष्टि उत्पन्न करनी चाहिए और उसने वैसा ही किया । पहले तो उसने अप, तेज, वायु, पृथ्वी, आकाशादि पंच महातत्त्वों की रचना की, तदनंतर बीज वृक्षादि जड़ वस्तुओं की रचना करके उसने सनक, सनंदन, सनत्कुमारादि चार पुत्र रचकर मानव जाति की वृद्धि करनी चाही; किंतु जब सनकादि कुमारों ने अखंड ब्रह्मचर्य्य धारण कर सांसारिक विषय-भोगादि से अरुचि प्रगट की तब ब्रह्मा ने उसी प्रकार से अन्यान्य मुनिवरों को उत्पन्न किया । ब्रह्मा के मन से मरीचि, कानों से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथों से कृतब्रह्म, त्वचा से नारद, छाया से कर्द्दम, पीठ से अधर्म्म, कंठ से धर्म्म और अष्ट से लोभ ऋषि उत्पन्न हुए । इन्हीं ऋषियों से मनुष्यों की भिन्न भिन्न जातियों की वृद्धि हुई । चंद्रवंश और सूर्य्यवंश—ब्रह्मा के पुत्र मरीचि के १३ स्त्रियाँ थीं जिनमें से एक का नाम कला था । कला के कश्यप और धर्म दो पुत्र हुए। अत्रि ऋषि के तीन पुत्र हुए जिनमें से बड़े का नाम सोम था और कनिष्ठ का नाम दुर्वासा । उक्त सोम का पुत्र बुध और बुध का पुत्र पुरूरवा हुआ । इस पुरूरवा के ६ पुत्र हुए जिनसे चंद्रवंशियों के ६ कुल प्रख्यात हैं। इसी प्रकार भृगु मुनि से चहुआन क्षत्रियों का वंश चला जिसका वर्णन इस प्रकार से है कि भृगु मुनि की पहली स्त्री से धाता और विधाता नाम के उनके दो पुत्र हुए । भृगु की दूसरी स्त्री से दैत्यगुरु का और च्यवन ऋषि का जन्म हुआ । च्यवन के ऋचीक, इनके जमदग्नि और जमदग्नि के परशुराम नामक अत्यंत बलिष्ठ शूरवीर पुत्र हुए जिन्होंने क्षात्र धर्म्म से च्युत विषयलोलुप सहस्रों क्षत्रिय राजाओं

( ४ ) को मारकर उनका वंश पर्य्यंत नाश कर डाला और उनके रुधिर से पितृ-देवताओं का तर्पण किया । इस प्रकार परशुराम के पराक्रम से प्रसन्न हुए पितृ-देवताओं ने परशुराम को शांत होकर तप करने की आज्ञा दी । आबूराज पर्वत पर यज्ञ और चहुआनों की उत्पत्ति— इधर सृष्टि के शासनकर्ता क्षत्रियों के समूल उन्मूल हो जाने से जब परस्पर अन्याय आचरण के कारण प्रजा पीड़ित हो उठी और दैत्य और राक्षसों के उपद्रव से ऋषि लोगों के यज्ञादि कर्मों में भी विघ्न पड़ने लगा तब ऋषिगण संसार की रक्षा और उसके उचित शासन के निमित्त फिर क्षत्रियों के उत्पन्न करने की अभिलाषा से यज्ञ करना विचारकर अर्बुदगिरि अर्थात् आबू के पहाड़ पर गए । वहाँ पर सब ऋषियों ने शिव की आराधना की । तब शिव ने भी वहाँ आकर मुनिवरों की प्रार्थना स्वीकार की और वे उक्त पर्वत पर अचल रूप से विराजमान हुए; अस्तु तब मुनिवरों ने भी सुंदर वेदिका रचकर यज्ञ-कर्म्म आरंभ किया । इस यज्ञ में द्वैपायन, वशिष्ठ, लोम, दालिभ, जैमिनि, हर्षण, धौम्य, भृगु, घटयोनि, कौशिक, वत्स, मुद्गल, उद्दालक, मातंग, पुलह, अत्रि, गौतम, गर्ग, शांडिल्य, भरद्वाज, जावालि, मार- कंडेय, जरत्कारु, जाजुल्य, पराशर, च्यवन और पिप्पलाद आदि मुनियों का समारोह हुआ था । इसके अतिरिक्त शिव और ब्रह्मा भी स्वयं वहाँ उपस्थित थे । इस प्रकार समुचित प्रकार से जिस समय यज्ञ हो रहा था और वेदिका से उत्पन्न हुई अग्निशिखाएँ आकाश को स्पर्श कर रही थीं, उसी समय उस वेदिका में से चालुक्य, प्रमार और परिहार क्षत्रिय क्रम से निकले । इन्होंने मुनिवरों की आज्ञा पा दैत्यों से युद्ध भी किया; किंतु उन्हें परास्त करने में वे समर्थ न हो सके । तब ऋषियों ने उक्त यज्ञस्थल को त्यागकर उसी पहाड़ पर नैऋत दिशा में दूसरा अग्निकुंड निर्माण किया । इस बेर के यज्ञ में ब्रह्मा ने ब्रह्मा, भृगु मुनि ने होता, वशिष्ठ ने आचार्य्य, वत्स ने ऋत्विक और परशुराम ने यजमान का कार्य संपादन किया ।

( ५ ) निदान इस यज्ञ से जो अग्नि के समान तेजवाला पुरुष उत्पन्न हुआ उसका नाम चहुआन जी हुआ; क्योंकि इनके चार बाहु थे और प्रत्येक बाहु खड्ग, धनुष, शूल और चक्र इन चारों आयुधों को धारण किए हुए था। इस पुरुष ने ऋषिवरों के आशीर्वाद और निज कुलदेवी आशापूरा के प्रसाद से संपूर्ण दैत्यों का वध कर ऋषि और देवताओं को प्रसन्न किया । कथामुख—इस प्रकार यज्ञकुंड से उत्पन्न चहुआन जी के वंश में बहुत दिनों पीछे विक्रमीय १२वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के आरंभ में राव जैतराव चहुआन जन्मे । एक समय जैतराव जंगल में शिकार खेलने गए । वहाँ उन्होंने एक बलवान् बाराह को देखकर उसके पीछे घोड़ा डाल दिया । बहुत दूर निकल जाने पर एक गंभीर वन में बाराह तो अदृष्ट हो गया और राव जी संगी साथियों से छूटकर चकित चित्त अकेले उस वन में भटकते फिरने लगे । ऐसे समय में वहाँ उन्हें एक ऋषि का आश्रम देख पड़ा । वहाँ जाकर वे देखते क्या हैं कि परम रमणीय पर्णकुटी में कुशासन पर बैठे हुए पद्म ऋषि जी ध्यान में मग्न हैं । राव जी ने उनके निकट जाकर साष्टांग प्रणाम किया और उनके दर्शन से अपने को कृतार्थ जानकर वे उनकी स्तुति करने लगे । निदान तब ऋषि ने भी प्रसन्न होकर राव जी को आशी- र्वाद दिया, और कुछ दिवस पर्य्यंत उसी स्थान पर रहकर उन्हें शिवार्चन करने का भी उपदेश दिया । राव जी ने वैसा ही करके शिव को प्रसन्न किया । तब ऋषि ने पुनः आज्ञा दी कि राव जी तुम यहाँ एक गढ़ भी निर्माण करो । अस्तु राव जी ने उसी समय अपने मित्र, मंत्री और सुहृदों को बुलाकर संवत् १११० वैशाख सुदी अक्षय तृतीया, शनिवार को पाँच घटी सूर्य्योदय में रणथंभगढ़ की नींव डाली और उसी के उपस्थ में एक रमणीक नगर भी बसाया । ऋषि का तप भंग होना—उस पर्वतावेष्टित प्रच्छन्न एवं दृढ़ दुर्ग की रम्य भूमि को पद्म ऋषि ने राव जी से अपने रहने के लिये माँग लिया और उसी में रहकर वे तप करने लगे । जब उनके उम्र

( ६ ) एवं पवित्र तप की सूचना इंद्र को मिली तब भीरुहृदय इंद्र ने अपने श्रीभ्रष्ट होने के भय से आशंकित होकर पद्म ऋषि का तप भ्रष्ट करना चाहा और इसीलिये उसने इस कर्म के लिये कुकर्मी- मकरकेतु को उपयुक्त जानकर उसे आज्ञा दी कि हे मित्र, तू अपने सच्चे सहचर बसंत के सहित जाकर रणथंभ गढ़ में तप करते हुए तेजस्वी पद्म ऋषि की श्री नष्ट कर दे । इस प्रकार इंद्र से उत्तेजित किया हुआ कामदेव अपनी सहकारी षड् ऋतुओं सहित रणथंभ गढ़ में ध्यानमग्न पद्म ऋषि को जाग्रत करने की इच्छा से ऋतुओं के उपचार का प्रयोग करने लगा, किंतु ग्रीष्म का प्रचंड मार्तंड और मलय समीर, पावस के पपीहा, शरद् की स्वच्छ चाँदनी, शिशिर के दुशाला और हेमंत के पाला को पराजित करनेवाले मसाले भी जब ऋषि की समाधि भंग न कर सके, तब उस कुसुमायुध ने साक्षात् शिव को रसिक बनानेवाले वसंत का प्रयोग किया अर्थात् उस जनशून्य वन में नाना प्रकार के पुष्प प्रस्फुटित हुए और उनपर मधुप गुंजार करते हुए आनंद से मकरंद पान करने लगे, जहाँ तहाँ नाना वर्ण के पक्षी-शावक कलरव करते हुए कल्लोल करने लगे । उसी समय इंद्र द्वारा प्रेरित अप्सराओं ने आकर नृत्य और गान करते हुए उस शिखरशैली को इंद्र का अखाड़ा बना दिया, तब उपयुक्त समय जानकर कामदेव ने भी अपने शरों से मुनिवर के शरीर को बेध दिया । इस प्रकार समाधि भंग होने पर जब मुनि ने आँख उठाकर देखा तो देखते क्या हैं कि उस रणथंभ के अभेद्य दुर्ग में शांत रस को पराजित कर श्रृंगार रस ने पूर्णतया अपना अधिकार जमा लिया है और एक चंद्रमुखी मृगलोचनी, गयंद-गामिनी, नवयौवना सन्मुख खड़ी हुई मुनि की ओर कटाक्ष-सहित देख रही है । यह देखकर पद्म ऋषि के शरीर से शांति और तप इस प्रकार विदा हो गए जैसे तुषारतोषित वृक्ष सुकोमल पल्लवों को त्याग देते हैं, एवं जिस प्रकार फल के लगते ही वृक्षगण सूखे पुष्प का अनादर कर देते हैं । इस प्रकार कामातुर होकर पद्म ऋषि समाधि छोड़ सुंदरी

( ७ ) का आलिंगन करने को उत्सुक हो उठे। उधर उस रमणी ने भी ऋषि के मनोगत भाव को जानकर उनका हाथ पकड़ लिया और तब वे दोनों आनंद से रस-क्रीड़ा करने लगे। पद्म ऋषि का शोक और शरीरत्याग—इस प्रकार जब अधिक समय व्यतीत हो गया तब सुंदरी तो अंतर्हित होकर स्वर्ग को चली गई और पद्म ऋषि की भी मोहनिद्रा खुली। तब वे मन ही मन विचार और पश्चात्ताप करके विलाप करते हुए आप ही आप कहने लगे—हाय ! मैं कैसा दुर्बुद्धि हूँ कि मैंने क्षणिक सुख के लिये अपना सर्वनाश किया और फिर भी जिसके लिये सर्वस्व का त्याग किया वह भी पास नहीं। हा ! यह मैंने अब जाना कि पाप का परिणाम केवल संताप होता है और संतप्तहृदय मनुष्य जो कुछ कर डाले सब थोड़ा है। हाय, मैं तप से भी गया, भोग से भी गया, अब मैं इस शरीर को रखकर क्या करूँ ? इस प्रकार शोकातुर होकर मुनि ने एक वेदिका रचकर उसमें अपने शरीर के पाँच खंड करके होम कर दिए। जिस समय पद्म ऋषि ने शरीर त्याग किया उस दिन माघ शुक्ल १२ सोमवार आर्द्रा नक्षत्र था। पद्म ऋषि के मस्तक से अलाउद्दीन बादशाह, वक्षस्थल से राव हम्मीर, भुजाओं से महिमा- शाह और मीर गभरू, चरणों से उर्वसी अर्थात् अलाउद्दीन की उस बेगम का अवतार हुआ जो कि इस आख्यान की नायिका है। हम्मीर का जन्म—पद्म ऋषि के उपर्युक्त रीति से शरीर त्यागने के पश्चात् अर्थात् संवत् ११४१, शाका १००६ दक्षिणायन शरद् ऋतु कार्तिक शुक्ला १२ रविवार को उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में उक्त रणथंभ गढ़ के चहुआन राव जैतराव जी के हम्मीर नाम का एक पुत्र जन्मा। पुत्र का प्रफुल्लित मुख देखकर जैतराव के आनंद का ठिकाना न रहा। उन्होंने ज्योतिषियों को बुलाकर लग्न-कुंडली बनवाई। सहस्रों ब्राह्मणों, भिक्षुकों और बंदीजनों को यथायोग्य संमान सहित अन्नदान, गोदान, हेमदान, गजदान देकर सबको संतुष्ट किया गया।

( ८ )

जिस समय रणथंभ गढ़ में हम्मीर का जन्म हुआ उसी समय ग़जनी में शहाबुद्दीन के पुत्र अलाउद्दीन का तथा मीणा के घर महिमा मंगोल दोनों भाइयों का और गभरू के घर उक्त स्त्री का अवतार हुआ । **हम्मीर और अलाउद्दीनशाह का वैर—**एक समय वसंत ऋतु के आरंभ में अलाउद्दीन ने सहस्रों सैनिक और अमीर उमरावों तथा बेगमों को साथ लेकर शिकार के लिये यात्रा की । उसने एक परम रमणीक वन प्रांत में शिविर लगवा दिए और वह उसी वन में इतस्ततः आखेट करके जंगली जंतुओं के प्राण संहार करने लगा । इसी प्रकार जब वसंत का अंत होकर ग्रीष्म के आतप से भूमि उत्तापित हो रही थी, अलाउद्दीन सब सरदारों सहित शिकार खेलने चला गया। इधर बेगमें भी अपनी सखी सहेलो और अगनित खोजाओं को लेकर एक कमलवन-संपन्न निर्मल सरोवर पर जाकर जलक्रीड़ा करने लगीं । दैवयोग से उसी समय सहसा वायु का वेग बढ़ते बढ़ते इतना प्रचंड हो गया कि बड़े बड़े मेघस्पर्शी वृक्ष टूट- टूटकर गिरने लगे; धूलि के आकाश में आच्छादित हो जाने के कारण घोर अंधकार छा गया । इस आकस्मिक घटना से भयभीत होकर सब लोग तीन तेरह होकर अपने अपने प्राणों की रक्षा करने के लिये जहाँ तहाँ भागने लगे, जलक्रीड़ा करती हुई बेगमों में से “रूपविचित्रा” नामक एक बेगम जो कि स्वरूप और गुण में सब बेगमों से श्रेष्ठ थी, भटककर एक ऐसे निर्जन प्रांत में जा पहुँची जहाँ हिंसक जंतुओं के भीषण नाद के सिवाय अन्य शब्द ही न सुन पड़ता था । जिस समय रूपविचित्रा भय एवं शीत के कारण थर थर काँपती हुई प्राणरक्षा के लिये ईश्वर का स्मरण कर रही थी उसी समय महिमा मीर वहाँ आ पहुँचा । जब उसे पूछने पर ज्ञात हुआ कि उक्त स्त्री बादशाह की बेगम है, तब उसने उसे घोड़े पर बैठालकर शिविर में ले जाने का आग्रह किया । इसपर रूपविचित्रा ने मीर महिमाशाह को धन्यवाद देकर कहा कि इस समय मेरा शरीर शीत

( ६ )

से अधिक व्याकुल हो रहा है, इसलिये तू आलिंगन से मुझे संतुष्ट कर । इसपर महिमाशाह ने उत्तर दिया कि एक तो मैं किसी भी पराई स्त्री को अपनी भगिनीवत् मानता हूँ तिसपर आप मेरे स्वामी की स्त्री हैं इसलिये आप मेरी माता समान हैं अतएव मैं यह अकर्त्तव्य एवं पाप कर्म करने को कदापि सहमत नहीं हूँ । तब रूपविचित्रा ने पुनः उत्तर दिया कि क्या आप यह नहीं जानते कि अपने मुख से माँगती हुई स्त्री को रति-दान न देना भी तो एक ऐसा पाप है कि जिसका कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं, और हे वीर युवक, तेरे रूप और गुणों की प्रशंसा पर मोहित हुआ मेरा मन तेरे लिये बहुत दिनों से व्याकुल है । भाग्यवश आज यह संयोग प्राप्त हुआ है। बेगम की ऐसी बातें सुनकर महिमाशाह का भी मन डोल उठा और तब उसने घोड़े को एक समीपवर्ती वृक्ष से बाँध दिया हथियार खोल- कर पास रख लिए और वहीं उस स्त्री की मनोकामना पूर्ण करने लगा । उसी समय एक गर्जता हुआ विकराल सिंह सामने आता देख पड़ा । उसे देखकर रूपविचित्रा थर थर काँपने लगी, किंतु महिमाशाह ने उसे धैर्य देकर कहा कि भय मत करो कोई डर नहीं, और कमान को उठाकर एक ही बाण से उसने सिंह को मार डाला । उपर्युक्त प्राकृतिक उपद्रव के शांत होते ही सहस्रों मनुष्य बेगम की खोज में इधर-उधर फिरने लगे । उनमें से कोई कोई तो बेगम के पास तक आ पहुँचे और उसे शाही शिविर में लिवा ले गए । रूपविचित्रा को पाकर अलाउद्दीन अत्यंत प्रसन्न हुआ जब ग्रीष्म का अंत हो गया और पावस की घनघोर घटाएँ घिर घिरकर आने लगीं तब अलाउद्दीन ने लश्कर-सहित दिल्ली को कूच कर दिया । दिल्ली के राजमहल में एक दिन आधीरात को जिस समय अलाउद्दीन रूपविचित्रा के पास बैठा था, उसी समय एक चूहा आ निकला । उसे देखते ही बादशाह का काम-ज्वर जीर्ण हो गया, किंतु उसने किसी प्रकार सम्हलकर उस चूहे को लक्ष्य करके एक ऐसा

( १० )

बाण मारा कि वह वहीं मर गया। चूहे को मारकर अलाउद्दीन की प्रसन्नता का अंत न रहा, इसलिये उसने रूपविचित्रा से कहा कि मैं जानता हूँ कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही कायर होती हैं, इसलिये मैंने यह पुरुषार्थ प्रगट किया है। यह सुनकर रूपविचित्रा ने मुस्कराकर कहा—पुरुषार्थी मनुष्य वे होते हैं जो इसी अवस्था में सिंह को सहज ही मारकर शेखी की बात नहीं करते। बेगम की ऐसी बातें सुनकर अलाउद्दीन आश्चर्य और क्रोध के समुद्र में गोते खाने लगा, किंतु उसने अपने को सम्हालकर कहा कि जो तू ऐसा पुरुष मुझे बतला दे तो मैं उससे बहुत ही प्रसन्नतापूर्वक मिलूँ अथवा उसने मेरा कैसा ही अपराध क्यों न किया हो मैं सर्वथा उसे क्षमा करूँ। तब बेगम ने अपना और मीर महिमाशाह का भूत वृत्तांत कह सुनाया और कहा कि उस वीर पुरुष के ये चिह्न हैं कि न तो वह उकड़ूँ बैठकर भोजन करता है, न शरणागत को त्यागता है, और न बिना किसी विशेष कारण के झूठ बोलता है। यह सुनते ही बादशाह का क्रोध इस प्रकार बढ़ उठा जैसे सचिक्कन पदार्थ की आहुति से अग्नि का तेज बढ़ उठता है। अलाउद्दीन ने उसी समय महिमाशाह को बुलाए जाने को आज्ञा दी। इधर रूपविचित्रा भी अपनी मूर्खता पर पछताने लगी। अंत में उसने साहसपूर्वक बादशाह से कहा कि यदि आप उस वीर पुरुष को कुछ दंड देना चाहते हों तो प्रथम मुझे ही मरवा डालिए, क्योंकि इसमें वास्तव में मेरा ही दोष है, न कि उसका। जहाँपनाह क्या यह अन्याय न होगा कि एक निष्पराधी पुरुष दंड पावे और अपराधी को आप गले से लगावें ? बेगम की ऐसी बातें सुनकर बादशाह ने महिमाशाह के आने पर उससे कहा कि “रे मूढ़ कुमार्गगामी अधम, अब मैं तेरा मुख नहीं देखना चाहता, बस अब यदि तुझे अपने प्राण प्यारे हैं तो इसी समय मेरे राज्य से चला जा।” मीर महिमा और हम्मीर राव—क्रुद्ध अलाउद्दीन से तिरस्कृत होकर महिमाशाह ने घर आकर अपने सहोदर मीर गभरू से सारा

( ११ ) वृत्तांत कह सुनाया और उसी क्षण परिवार सहित वह दिल्ली से चल दिया। महिमाशाह जिस किसी राजा राव के पास जाता वह उसे शाह अलाउद्दीन का द्वेषी समझकर तुरंत ही अपने यहाँ से विदा कर देता। इसी प्रकार फिरते फिरते जब वह राव हम्मीर की ड्योढ़ी पर पहुँचा और उसने अपने आने की इत्तला कराई तो राव जी ने उसे बड़े ही संमानपूर्वक डेरा दिलवाया और दूसरे दिन अपने दरवार में बुलाया। दरवार में पहुँचकर महिमाशाह ने पाँच घोड़े, एक हाथी, दो मुलतानी कमान, एक तलवार, दो वाण, दो बहुमूल्य मोती और बहुत से ऊनी वस्त्र राव जी की नजर किए, जिनको राव जी ने सादर स्वीकार कर लिया। उसी समय मीर महिमाशाह ने अपनी बीती भी राव जी से निवेदन करके सविनय कहा- "मैं अल्लाउद्दीन के विरोधियों में से हूँ। यदि आपमें मेरी रक्षा करने की शक्ति हो तो शरण दीजिए अथवा मुझे भाग्य के भरोसे पर छोड़ दीजिए।" मीर के ऐसे वचन सुनकर हम्मीर ने कहा कि हे मीर मैं तुझे अभयदान देकर प्रण करता हूँ कि इस मेरे तनपिंजर में प्राण- पखेरू के रहते एक क्या सहस्रों बादशाह तेरा बाल बाँका नहीं कर सकते-यह रणथंभ का अभेद्य दुर्ग, ये अपने राजपूत वीर अथवा मैं स्वयं अपने को युद्धाग्नि में आहुति देने को प्रस्तुत हूँ परंतु तुझे न जाने दूँगा। इस प्रकार कहकर राव हम्मीर ने उसी समय मीर को पाँच लाख की जागीर का पट्टा कर दिया और तब से मीर आनंद- पूर्वक रणथंभौर के अभेद्य दुर्ग में रहने लगा। इधर वादशाह के गुप्तचरों ने उसके संमुख यह समाचार जा सुनाया जिसके सुनते ही अलाउद्दीन पूँछ कुचले हुए काले सर्प की तरह क्रोधित हो उठा; किंतु वजीर बहराम खाँ ने आगत उपद्रव के टालने अथवा मीर महिमा के पक्षपात की इच्छा से दूत को डाँटकर कहा कि जिस मीर को सात समुद्र पार भी ठिकाना देनेवाला कोई नहीं है उसे हम्मीर क्या रखेगा। इसपर दूत ने पुनः कहा कि यदि मेरी बातों में कुछ भी असत्य हो तो मैं उचित दंड पाने के लिये

१. प्रथम भाग: रणथम्भौर राजवंश, राव हम्मीर देव राज्याभिषेक व दिग्विजय

( १२ )

प्रस्तुत हूँ। दूत की ऐसी दृढ़ता देखकर अलाउद्दीन ने उसी समय आज्ञा दी कि हम्मीर को एक पत्र इस आशय का लिखा जाय कि वह मेरे अपराधी को स्थान न देवे क्योंकि अब तक वह मेरा मित्र है, न कि शत्रु। यदि वह अपने हठ से न हटे तो उसे उचित है कि वह सम्भल जाय, मैं क्षण मात्र में उसके समस्त दर्प और हठ को धूल में मिला दूँगा। अलाउद्दीन की आज्ञा पाते ही एक दूत को बहुत कुछ समझा बुझाकर रणथंभ की तरफ भेजा गया । दूत ने रणथंभ जाकर बादशाह का पत्र राव हम्मीर जी को दिया और कहा कि आप बादशाह अलाउद्दीन के बल, पुरुषार्थ और पराक्रम एवं अपने भविष्य के विषय में भी खूब सोच-विचारकर उत्तर दीजिए । इस पत्र का उत्तर राव जी ने इस प्रकार से लिखा कि मैं यह भली भाँति जानता हूँ कि आप दिल्ली के बादशाह हैं; परंतु मैं जो प्रण कर चुका हूँ, उसे अपने जीवन पर्यन्त छोड़ने का नहीं। इस- लिये उचित यही है कि आप अब मुझसे महिमाशाह के विषय में बात भी न करें, और जो कुछ आपसे बन पड़े उसके करने में विलंब भी न कीजिए। इस पत्र को पाकर बादशाह का क्रोध और भी बढ़ उठा परंतु राजमंत्रियों के समझाने-बुझाने पर उसने एक बार फिर राव हम्मीर के पास दूत भेजकर उसके मन की थाह ली। परंतु उस वीर पुरुष ने बड़े धैर्य और साहस के साथ फिर भी वही उत्तर दिया। राव हम्मीर जी के हठ और साहस के सामने बादशाह की बुद्धि भी चक्कर में पड़ गई, उसे भी अपने आगे पीछे का सोच पड़ गया। उसने विचार किया कि जब राव हम्मीर में इतना साहस है तब उसका कुछ कारण भी होगा, यदि न भी हो तो प्राण की परवाह न करनेवाले के सामने बिरले ही माई के लाल खड़े हो सकते हैं। सिंह हाथी से बहुत ही छोटा है किंतु वह अपने साहस और पुरुषार्थ ही से उसे मार डालता है। इसी प्रकार सोच विचार करते हुए बादशाह ने अपने सब दरबारियों को बुलाकर हम्मीर के हठ और अपने कर्तव्य की सूचना दी। तब उसके सब सरदारों ने जो हुजूर की ही 'हाँ'

( १३ ) में 'हाँ' मिला दी, सिर्फ एक वृद्ध पुरुष ने कहा कि उस चहुआन के फेर में न पड़िए, रणथंभ पर चढ़ाई करना सहज नहीं है । परंतु वृद्धू की इस बात पर ध्यान भी न दिया गया । अलाउद्दीन ने उसी समय आज्ञा दी कि यथासंभव शीघ्र ही फौज तय्यार की जाय । बादशाह की आज्ञा पाते ही जहाँ तहाँ पत्र भेजकर सोरठ, गिरनार और पहाड़ी देशों के अनेक राजपूत सरदार बुलाए गए । तब तक इधर शाही वैतनिक फौज भी तय्यार हो गई और फौज के लिये आवश्यक रसद वरदास भी इकट्ठी हो गई । निदान इस प्रकार अरबी, काबुली, रूमी इत्यादि मुसलमान वीरों की सत्ताईस लाख जंगी फौज और अठारह लाख परिकर कुल ४५ लाख मनुष्य, ५००० हाथी और पाँच लाख घोड़ों की भीड़ भाड़ लेकर अलाउद्दीन ने रणथंभ गढ़ पर चढ़ाई करने को चैत्र मास की द्वितीया संवत् ११३८ को कूच किया । जिस समय यह शाही दल बल राव हम्मीर जी की सरहद में पहुँचा उस समय वहाँ की प्रजा में कोलाहल मच गया । अलाउद्दीन के आज्ञानुसार सब सैनिक सिपाही प्रजा को नाना प्रकार के कष्ट देने लगे । इसलिये सब लोग भाग-भागकर रणथंभ के गढ़ में शरण के लिये पुकारने लगे । इसी प्रकार निरपराधी प्रजा का खून करते हुए जब यह दल बल “नल हारणों गढ़” के किले पर पहुँचा तब वहाँ के किलेदार ने तीन दिन पर्यंत शाही फौज का मुकाबिला किया । किंतु अंत में किले पर बादशाही दखल हो गया । इसलिये यहाँ का किलेदार भी रणथंभ को दौड़ गया और उसने बादशाह के अगनित दल बल का समाचार विधिवत् राव हम्मीर जी के संमुख निवेदन किया । इस समाचार के पाते हम्मीर की बंक भृकुटी और भी टेढ़ी हो गई, कमल समान नेत्र अग्नि-शिखा से लाल हो उठे, बाहु और ओठ फड़कने लगे । रावजी का ऐसा ढंग देखकर अभयसिंह प्रमार, भूरसिंह राठौर, हरिसिंह बघेला, रणदूला चहुआन और अजमतसिंह इन पाँच सरदारों ने २०००० फौज लेकर शाही फौज को रास्ते में रोक लिया

( १४ )

और वे ऐसे पराक्रम से लड़े कि बादशाही सेना के पैर उखड़ गए और बड़े बड़े अमीर उमरा जहाँ तहाँ भागने लगे। उस समय अला- उद्दीन के वजीर महिरज खाँ ने कहा—"मैने पहले ही अर्ज किया था कि एक तो राजपूत अपनी बात रखने के लिये जान देने की कभी परवाह नहीं करते, फिर भी उस पहाड़ी किले पर फतह पाना.बहुत ही मुश्किल काम है"। किंतु बादशाह ने फिर भी उसकी बात यों ही टाल दी और आगे कूच करने की आज्ञा दी। इस युद्ध में अलाउद्दीन के ३०००० सिपाही, डेढ़ सौ घोड़े और कई एक अमीर उमरा काम आए किंतु राव हम्मीर के १२५. सिपाही और १० सर्दार खेत रहे और अभयसिंह प्रमार के सीस में बहुत गहरे गहरे २१ घाव लगे। अलाउद्दीन ने रणथंभ गढ़ के पास पहुँचकर चारों तरफ से किले को घेरकर फौज का पड़ाव डाल दिया और फिर से एक दूत के हाथ पत्र भेजकर राव हम्मीर जी से कहला भेजा कि अब भी मेरे अपराधी मीर महिमाशाह को मेरे पास हाजिर करके मुझसे मिलो तो मैं तुम्हारे अपराध को क्षमा कर दूँगा। इस बार राव जी ने जो उत्तर दिया वह इस प्रकार था—"मैं जानता हूँ तू बादशाह है, परंतु मैं भी उस चहुआन कुल में से हूँ जिसने सदैव मुसलमानों के दाँत खट्टे किए हैं। ख्वाजा मीराँ पीर का एक लाख अस्सी हजार दल बल अजमेर में चहुआनों ने ही खपाया था। पुनः बीसलदेव जी ने सोन- गरा का शाका किया, उसी वंश के पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को सात बार पकड़कर छोड़ दिया। बस मैं उसी चहुआन कुल में हूँ और तू भी उसी पीर मर्द औलिया खानदान का मुसलमान है। देख अब किसकी टेक रहती है। हे यवनराज, तू निश्चय रख, मेरी टेक यह है कि सूर्य चाहे पूर्व से पश्चिम में आने लगे, समुद्र मर्यादा छोड़ दे, शेष पृथ्वी को त्याग दे, अग्नि शीतल हो जाय, परंतु राव हम्मीर का अटल प्रण नहीं टल सकता। देख अलाउद्दीन, संसार में जो जन्म लेता है वह एक दिन मरता अवश्य है; अथवा जिसकी उत्पत्ति है उसका नाश होता ही है। फिर इस क्षणभंगुर शरीर के

( १५ )

लिये शरणागत को त्यागकर अपने कुल में मैं कलंक नहीं लगाना चाहता । तुझे कितना दर्प है जो अपने सामने दूसरे को वीर नहीं गिनता । इस पृथ्वी पर रावण, मेघनाद सरीखे अभिमानी और अतुल बलशाली वीर पानी के बबूले की तरह बिला गए । यवनराज ! मनुष्य नहीं रहता, परंतु उसके कर्त्तव्य की कहानियाँ अवश्य रहती हैं । अतएव अब तुझे जो सूझे सो कर । मैं भी सब तरह से तैयार हूँ ।” अलाउद्दीन के दूत को इस प्रकार उत्तर देकर राव हम्मीर जी शिवालय मे जाकर शिवार्चन करने लगे। धूप, दीप नैवेद्य संयुक्त विधिवत् पूजा करके जिस समय राव जी ध्यानमग्न थे उसी उसो समय शिवालय में आकाशवाणी हुई कि हे हम्मीर तुमसे और अला- उद्दीन से १२ वर्ष पर्य्यंत संग्राम होगा । तत्पश्चात् आषाढ़ सुदी ११ को तुम्हारा शाका पूर्ण होगा जिससे संसार में चिरकाल तक तुम्हारा यश बना रहेगा । शिव जी से इस प्रकार वरदान पाकर राव जी ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शूर वीर सरदारों को युद्ध के लिये सन्नद्ध होने की आज्ञा दी । उसी समय हम्मीर के चाचा राव रणधीर ने, जो कि “छाड़गढ़” के किले के स्वामी थे, हम्मीर से कहा कि श्रीमान् क्षमा करें इस समय मेरे हाथ देखें । इधर हम्मीर जी का पत्र पाते ही अलाउद्दीन लाल पीला सा हो उठा और उसने उसी समय रणथंभ के किले पर चारों ओर से गोले और बाणों की वर्षा करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा पाते ही मुसलमान सेनानायक मुहम्मद अली रणथंभ के अजेय दुर्ग को पाने के लिये प्रयत्न करने लगा । इधर से राव रणधीर ने भी किले की बुर्जी पर से अग्निवर्षा करने की आज्ञा दी और आप कुछ सैनिकों सहित मुसलमानी सेना में वह इस प्रकार धँस पड़ा जैसे भेड़ों के समूह में भेड़िया धँसता है । निदान पहली वरणी राव रणधीर और मुहम्मद अली की हुई जिसे राव जी ने एक ही हाथ में दो कर दिया । यह देखकर उसका पीठ-नायक अजमत खाँ राव जी के

( १६ ) संमुख आया। किंतु राव रणधीर ने उसे भी मार गिराया। अजमत खाँ के गिरते ही मुसल्मानी सेना के पैर उखड़ गए। इस युद्ध में मुसलमान सेना के अस्सी हजार अस्त्रधारी खेत रहे और राव रणधीर के केवल एक हजार जवान मारे गए। मुहम्मद मीर के मारे जाने पर जब मुसल्मानी फौज भागने लगी तब अलाउद्दीन ने वादित खाँ को सेनानायक बनाया। वादित खाँ ने बड़े धैर्य और दृढ़ता से उत्तेजनाजनक वाक्य कहकर, बिखरी हुई फौज को बटोरकर, राजपूत वीर राव रणधीर का सामना किया किंतु अंत में उसे भी भूत सेना- नायकों के भाग्य में भाग लेना पड़ा। वादित खाँ के मरते ही सारी सेना में कुहराम मच गया। अला- उद्दीन स्वयं निस्तेज होकर पोर पैगंबरों को पुकारने लगा। तब वजीर महम्मद खाँ ने कहा कि इस प्रकार संमुख युद्ध करके जय पाना तो कठिन है। इसलिये कुछ सेना यहाँ छोड़कर छाड़गढ़ के किले पर चढ़ाई की जाय। उस किले में राव रणधीर के लोग रहते हैं। निदान अपने परिवार पर भीड़ पड़ी देखकर यदि राव रणधीर शरण में आ जाय तो फिर अपनी जय होने में कोई संदेह नहीं है। निदान वजीर की बात मानकर बादशाह ने वैसा ही किया; किंतु पाँच वर्ष व्यतीत हो गया और छाड़गढ़ का किला हाथ न आया। वरन् इसी में एक नवीन बात यह निकल पड़ी कि दिन भर तो हम्मीर जी युद्ध करते और रात को रणधीर का धावा पड़ता जिससे शाहं सेना अत्यंत व्याकुल हो उठी। बड़े बड़े अमीर उमरा मिट्टी मोल मारे जाने लगे। अधिक क्या, आरंभ से अंत तक जितनी लड़ाइयाँ हुईं उन सब में राजपूत वीरों की ही जय हुई। निदान जब अलाउद्दीन की तरफ के अब्दुलकरीम, करम खाँ, यूसफ जंग इत्यादि बड़े बड़े बुद्धि- मान् योद्धा सरदार मारे गए और राव रणधीर जी तथा हम्मीर जी का बाल भी न बाँका हुआ, तब अलाउद्दीन घबरा उठा और फिर से अमीर उमरावों की सभा करके अपने उद्धार का उचित उपाय विचारने लगा।

( १७ ) इसी समय राव रणधीर जी ने हम्मीर जी से कहा कि यदि चित्तौर से दोनों कुमार बुला लिए जायँ तो अच्छा हो। इसपर राव जी ने भी “अच्छा” कह दिया। तब राव रणधीर ने रणथंभ का सब समाचार लिखकर चित्तौर भेज दिया। उक्त समाचार के पाते ही दोनों राजकुमार तीस हजार राठौर, आठ हजार चहुआन, और पाँच हजार प्रमार राजपूतों की सेना लेकर रणथंभ को चले आए। दोनों राजकुमारों को देखकर राव हम्मीर जी ने प्रसन्नता- पूर्वक उन्हें गले लगा लिया और मीर महिमा को शरण देने के कारण अलाउद्दीन से रार बढ़ जाने का हाल भी विधिवत् वर्णन कर सुनाया, जिसे सुनते ही दोनों राजकुमारों का मुख प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने वीर रस में उन्मत्त होकर मदांध मृगराज की भाँति झूमते हुए राव जी से कहा कि अब तक आपने परिश्रम किया अब तनिक हमारा भी पराक्रम देख लीजिए। यों कहकर दोनों राजकुमार रनिवास में गए। राव हम्मीर की रानी आसुमती के चरण छूकर वे बोले कि हे माता आप कृपा कर हमारे मस्तक पर मौर बाँधकर हमें युद्ध करने का आशीर्वाद दीजिए। दोनों राजकुमारों के ऐसे वचन सुनकर आसुमती ने भी सुतस्नेह से सने हुए वाक्यों से संबोधन करते हुए उन्हें कलेजे से लगा लिया और अपने हाथों उनके शीश पर मौर बाँधा और केशरी बाना पहिनाकर उन्हें युद्ध में जाने को बिदा किया। जिस समय आसुमती कुमारों का श्रृंगार कर रही थी उस समय छाड़गढ़ के किले में इस प्रकार घनघोर रव हो रहा था कि जिससे दिशाओं के दिग्पाल चौकन्ने हो रहे थे। यह खरभर देखकर अला- उद्दीन ने अपने मंत्री से पूछा कि आज छाड़गढ़ में यह उत्सव किसलिये हो रहा है। तब एक अमीर ने उत्तर दिया कि राव हम्मीर जी के छोटे भाई के पुत्रों ने स्वयं युद्ध के लिये सिर पर मौर बाँधा है। उसी के उत्सव में यह गान-वाद्य हो रहा है। यह सुनकर बाद- शाह ने जमाल खाँ को बुलाकर कहा कि तुमने ही पृथ्वीराज को कैद २

( १८ ) किया था; आज भी अगर तुम दोनों राजकुमारों को पकड़ लोगे तो मेरी अत्यंत प्रसन्नता के पात्र होगे। इस प्रकार समझा-बुझाकर उस दिन के युद्ध के लिये अलाउद्दीन ने मीर जमाल को सेनानायक बनाया। इधर से दोनों राजकुमार केसरिया बाना पहिने, सीस पर मुकुट, हाथों में रणकंकण बाँधे अपने अपने तेज तुरंगों पर सवार सोलह हजार राजपूतों की सेना के बीच में ऐसे भले मालूम देते थे मानों रणबाँकुरे देवताओं के दल में इंद्र और कुबेर सुशोभित हो रहे हों। दोनों वीर सेना सहित उज्ज्वल नेजे और खड्ग चमकाते हुए मुसलमान सेना में इस प्रकार धँस पड़े जैसे काले काले बादलों में बिजली विलीन हो जाती है। इधर अलाउद्दीन से उत्तेजित किए हुए यवन-दल ने उन राजकुमारों को घेर लिया और जमाल खाँ बड़े वेग से उन दोनों राजकुमारों पर टूटा। वे वीर राजकुमार भी बड़ी धीरता से उसका सामना करने लगे। यह देखकर राव हम्मीर जी ने वीर शंखोदर को कुमारों की सहायता के लिये भेजा। इसपर इधर से अरबी फौज का धावा हुआ। राजपूत और मुसल- मान सेना में इस प्रकार विकट मार होने लगी कि किसी को अपना बिगाना न सूझता था। इसी समय जमाल खाँ ने अपना हाथी राजकुमारों के सामने बढ़ाया। तब कुमार ने तलवार का ऐसा हाथ मारा कि एक ही हाथ में लोहे का टोप कटते हुए मीर जमाल की खोपड़ी के दो टूक हो गए। जमाल खाँ को गिरता देखकर वालन खाँ ने धावा किया। इधर से वीर शंखोदर ने बढ़कर उसका मुख रोका। निदान सायंकाल तक बराबर लोहा झरता रहा। दोनों कुमार अपनी समस्त सेना के सहित स्वर्गगामी हुए। इस युद्ध में मुसलमानी फौज के ७५००० योद्धा खेत रहे। इस प्रकार दोनों राजकुमारों के मारे जाने पर राव रणधीर ने क्रोधित होकर किले पर से आग बरसाना आरंभ कर दिया। तब बादशाह ने कहला भेजा कि आप क्यों जान-बूझकर जान देने पर उतारू हुए हैं, आपके लड़कर मर जाने से इस झगड़े का अंत न

( १९ )

होगा। यदि आप राव हम्मीर जी को समझाकर मीर महिमा को मेरे पास भेजवा दें तो आप वा राव हम्मीर जी दोनों सुख से राज्य करें और हम दिल्ली चले जायँ। किंतु बादशाह के पत्र का राव रणधीर ने केवल यही उत्तर दिया कि क्षत्रियों का यह धर्म नहीं है कि विषय-सुख-भोग की लालसा अथवा मृत्यु के डर से वे अपने धारण किए हुए धर्म को त्याग दें। राव रणधीर की ओर से इस प्रकार कोरा उत्तर पाकर अलाउद्दीन ने अपनी फौज को भी छाड़ के किले पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। अलाउद्दीन की आज्ञा पाते ही मुसलमानी फौज ने टिड्डी दल की तरह उमड़कर किले को चारों ओर से घेर लिया और वे किले पर से चलते हुए गोले, गोली, बाण बर्छों की विषम बौछार की कुछ भी परवाह न करके किले पर चढ़ दौड़े। मुसलमानी सेना जब किले में धंस पड़ी तब राजपूत लोग सर्वथा प्राण का मोह छोड़कर तलवार से काम लेने लगे। दोनों में अग्न्यास्त्रों का संचालन बिल्कुल बंद हो गया। केवल तबल, तलवार, बरछी, कटार, सेल से काम लिया जाने लगा। इसी रेलापेल में बादशाह के निज पेशकार (बगली) ने राव हम्मीर की तलवार के सामने आने की हिम्मत की किंतु वीर रणधीर के एक ही वार में उसके जीवन का वारा न्यारा हो गया, इसलिये उसके सहकारी रूमी सर्दार ने अपने ५० बलवान् योद्धाओं सहित रणधीर जी को घेर लिया। राव रणधीर ने इन पचासों सिपाहियों को मारकर रूमी सर्दार को भी दो टूक कर दिया। इसी प्रकार मार काट होते हुए राव रणधीर सहित जितने राजपूत वीर उस किले में थे सबके सब मारे गए और छाड़- गढ़ का किला बादशाह के हाथ आया। इस युद्ध में शाही फौज के दो बड़े बड़े सर्दार और एक लाख रूमी सैनिक खेत रहे और राव रणधीर के साथी ३०००० राजपूत काम आए। यह छाड़गढ़ का अंतिम युद्ध चैत्र सुदी ९ शनिवार को हुआ। बीस हजार केवल राजपूत मारे गए और एक हजार राजपूती स्त्रियाँ स्वयं जलकर भस्म हो गईं।

( २० ) छाड़गढ़ का किला फतह करके अलाउद्दीन ने अपने लश्कर की बाग़ रणथंभ गढ़ की ओर मोड़ी और कुँवार सुदी ९ शनिवार को क़िले के चारों तरफ घेरा डालकर दूत के हाथ राव हम्मीर जी के पास कहला भेजा कि अब भी यदि महिमाशाह को मेरे पास भेज दो तो मैं बिना किसी रोक टोक के दिल्ली चला जाऊँ । दूत की ऐसी बातें सुनकर राव हम्मीर जी ने कहा—रे मूर्ख दूत, मैं तुझसे क्या कहूँ, तेरे स्वामी अलाउद्दीन का मुझसे बार बार ऐसा कहला भेजना उचित नहीं है। विग्रह का निर्धारण किया जाता है तो केवल इसलिये कि जिसमें बंधु बांधवों का रक्तपात न हो किंतु अब मुझे इस बात का सोच बाक़ी न रहा । राव रणधीर सा चाचा और कुलदीपक दोनों कुमार भी जब इस युद्धाग्नि में अपने प्राण होम कर चुके तब मुझे अब सोच ही किस बात का है । जा तू अपने स्वामी से कह दे कि अब कभी मेरे पास संदेसा न भेजे । दूत ने वहाँ से आकर राव जी के बचन ज्यों के त्यों बादशाह से कह सुनाए । यह सुनकर अलाउद्दीन ने उसी समय गोलंदाजों को बुलाकर हुक्म दिया कि यहाँ से ऐसा गोला मारो कि क़िले के बुर्जो पर रखी हुई तोपें ठस होकर शांत हो जायँ । गोलंदाजों ने बादशाह की आज्ञा पालन करने के लिये यथासाध्य चेष्टा की किंतु वह निष्फल हुई । साथ ही क़िले पर से उतरे हुए गोलों की मार से लश्कर की बहुत सी तोपें ठस होकर चरख पर से गिर पड़ीं । यह देखकर बादशाह की बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। वह नाना प्रकार के तर्क वितर्क करता हुआ अपने कर्तव्य पर पछताने लगा । यह देखकर उसके वज़ीर ने उसे समझाया और रात्रि को क़िले की खाई पर पुल बाँधकर क़िले पर चढ़ जाने का मत पक्का किया, किंतु पानी की बाढ़ अधिक होने के कारण मुसलमान सेना को उससे भी हारना पड़ा । तब तो बादशाह अखंड रूप से डटकर रह गया और क़िले पर आक्रमण करने के लिये उपयुक्त समय आने की प्रतीक्षा करने लगा ।

( २१ ) एक दिन राव हम्मीर जी ने किले के सबसे ऊँचे हिस्से पर सभामंडप सजाया। उस सभामंडप में सगे संबंधियों सहित बैठा हुआ राव हम्मीर ऐसा ज्ञात होता था जैसे देव- ताओं के बीच में इंद्र शोभित होता है। स्वर्ण सिंहासन पर बैठे हुए राव हम्मीर जी के संमुख चंद्रकला नामक वेश्या नृत्य कर रही थी। चंद्रकला के प्रत्येक गीत से अलाउद्दीन की अपमानसूचक ध्वनि निकलती थी। साथ ही इसके बादशाह की ओर पदाघात करके उसने ऐसा विलक्षण कटाक्ष किया कि जिसे देखकर रावजी की सब सभा में आनंद सूचक एक बड़ी भारी ध्वनि हुई। यह देखकर अलाउद्दीन से न रहा गया। तब उसने कहा कि यदि कोई इस वेश्या को बाण से मारकर राव हम्मीर के रंग में भंग कर दे तो मैं उसे बहुत कुछ पारितोषिक दूँ। यह सुनकर मीर महिमा के भाई मीर गभरू ने कहा कि मैं श्रीमान् की आज्ञा का प्रतिपालन कर सकता हूँ। किंतु स्त्री पर शस्त्र चलाना वीरों का काम नहीं है। इसीलिये उस वेश्या को जीव से न मारकर केवल उसका अहित किए देता हूँ। यों कहकर मीर गभरू ने एक ऐसा बाण मारा कि जिससे उस वेश्या के पांव में ऐसी चोट लगी कि वह तुरत लोट पोट हो गई। वेश्या को गिरते देखकर राव जी आश्चर्य और क्रोध में आकर चारों ओर देखने लगे। तब मीर ने हाथ बाँधकर अर्ज किया कि यह बाण मेरे भाई मीर गभरू का चलाया हुआ है। श्रीमान् इस पर किसी प्रकार का खेद न करें और तनिक मेरा पराक्रम देखें। यह कहकर मीर महिमाशाह ने एक ऐसा बाण मारा कि अलाउद्दीन के सिर पर से उसका मुकुट उड़ गया। यह देखकर वजीर महरमखाँ ने अलाउद्दीन से कहा कि अब यहाँ ठहरना उचित नहीं है। इस महिमा के संचालन किए हुए बाण से यदि आप बच गए तो यह उसने पहले नमक का निर्वाह किया है। यदि वह हम्मीर का हुक्म पाकर अब को जो लक्ष्य कर के बाण मारे तो आपके प्राण बचने

कठिन हैं, अतएव मेरा तो यही विचार है कि अब यहाँ से दिल्ली को कूच कर जाना ही भला है। वजीर महरमखाँ की बात मानकर बादशाह ने उसी समय कूच की तय्यारी करने की आज्ञा दी । इधर जिस समय सारे लश्कर में चला- चल का सामान हो रहा था उसी समय राव हम्मीर जी. के सामान के कोषाध्यक्ष सुरजनसिंह ने आकर बादशाह के पैरों पर शिर धर दिया और कहा कि यदि श्रीमान् मुझे छाड़गढ़ का राज्य दे देना स्वीकार करें तो मैं सहज ही में रणथंभ के अजेय दुर्ग पर आपकी फतह करवा दूँ । इस पर अलाउद्दीन ने उसे बहुत कुछ ऊँची नीची दिखाकर कहा—सुरजनसिंह यदि मैं रणथंभ पर विजय पा जाऊँ तो छाड़ का राज्य तो दूँगा ही इसके अतिरिक्त तुम्हें इस प्रकार संतुष्ट करूँगा कि जिसमें तुम्हारा मन हर तरह से राजी हो जाय । बादशाह की बातों में आकर कृतघ्न सुरजन ने रणथंभ को फतह करवाने का बीड़ा उठा लिया। उसने उसी समय राव हम्मीर जी के पास जाकर कहा कि “श्रीमान् रसद बरदाश्त और गोली बारूद के खजाने चुक गए हैं, इसलिये किले में रहकर अपने हठ एवं मान मर्यादा की रक्षा होनी कठिन है, इसलिये वचन मानकर महिमाशाह को अलाउद्दीन के पास भेजकर उससे सुलह कर लीजिए ।” सुरजन की बात पर राव हम्मीर जी ने विश्वास न किया और आप स्वयं “जौंरा भौंरा” १ ( खजाने ) के पास जाकर जाँच की तो सुरजन का कहना वास्तव में सत्य पाया। तब तो राव जी को अत्यंत शोक और आश्चर्य


१ किंतु “जौंरा, भौंरा” ( खजाने ) वास्तव में खाली नहीं हुए थे । उनमें का सब माल सोमान नीची तह में ज्यों का त्यों भरा पड़ा था। राव हम्मीर जी को धोखा देने के लिये सुरजन ने ऊपर से सूखा चमड़ा डलवा दिया था जो कि पत्थर डालने पर खड़क उठा।