हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकठिन हैं, अतएव मेरा तो यही विचार है कि अब यहाँ से दिल्ली को कूच कर जाना ही भला है। वजीर महरमखाँ की बात मानकर बादशाह ने उसी समय कूच की तय्यारी करने की आज्ञा दी । इधर जिस समय सारे लश्कर में चला- चल का सामान हो रहा था उसी समय राव हम्मीर जी. के सामान के कोषाध्यक्ष सुरजनसिंह ने आकर बादशाह के पैरों पर शिर धर दिया और कहा कि यदि श्रीमान् मुझे छाड़गढ़ का राज्य दे देना स्वीकार करें तो मैं सहज ही में रणथंभ के अजेय दुर्ग पर आपकी फतह करवा दूँ । इस पर अलाउद्दीन ने उसे बहुत कुछ ऊँची नीची दिखाकर कहा—सुरजनसिंह यदि मैं रणथंभ पर विजय पा जाऊँ तो छाड़ का राज्य तो दूँगा ही इसके अतिरिक्त तुम्हें इस प्रकार संतुष्ट करूँगा कि जिसमें तुम्हारा मन हर तरह से राजी हो जाय । बादशाह की बातों में आकर कृतघ्न सुरजन ने रणथंभ को फतह करवाने का बीड़ा उठा लिया। उसने उसी समय राव हम्मीर जी के पास जाकर कहा कि “श्रीमान् रसद बरदाश्त और गोली बारूद के खजाने चुक गए हैं, इसलिये किले में रहकर अपने हठ एवं मान मर्यादा की रक्षा होनी कठिन है, इसलिये वचन मानकर महिमाशाह को अलाउद्दीन के पास भेजकर उससे सुलह कर लीजिए ।” सुरजन की बात पर राव हम्मीर जी ने विश्वास न किया और आप स्वयं “जौंरा भौंरा” १ ( खजाने ) के पास जाकर जाँच की तो सुरजन का कहना वास्तव में सत्य पाया। तब तो राव जी को अत्यंत शोक और आश्चर्य
१ किंतु “जौंरा, भौंरा” ( खजाने ) वास्तव में खाली नहीं हुए थे । उनमें का सब माल सोमान नीची तह में ज्यों का त्यों भरा पड़ा था। राव हम्मीर जी को धोखा देने के लिये सुरजन ने ऊपर से सूखा चमड़ा डलवा दिया था जो कि पत्थर डालने पर खड़क उठा।