हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) छाड़गढ़ का किला फतह करके अलाउद्दीन ने अपने लश्कर की बाग़ रणथंभ गढ़ की ओर मोड़ी और कुँवार सुदी ९ शनिवार को क़िले के चारों तरफ घेरा डालकर दूत के हाथ राव हम्मीर जी के पास कहला भेजा कि अब भी यदि महिमाशाह को मेरे पास भेज दो तो मैं बिना किसी रोक टोक के दिल्ली चला जाऊँ । दूत की ऐसी बातें सुनकर राव हम्मीर जी ने कहा—रे मूर्ख दूत, मैं तुझसे क्या कहूँ, तेरे स्वामी अलाउद्दीन का मुझसे बार बार ऐसा कहला भेजना उचित नहीं है। विग्रह का निर्धारण किया जाता है तो केवल इसलिये कि जिसमें बंधु बांधवों का रक्तपात न हो किंतु अब मुझे इस बात का सोच बाक़ी न रहा । राव रणधीर सा चाचा और कुलदीपक दोनों कुमार भी जब इस युद्धाग्नि में अपने प्राण होम कर चुके तब मुझे अब सोच ही किस बात का है । जा तू अपने स्वामी से कह दे कि अब कभी मेरे पास संदेसा न भेजे । दूत ने वहाँ से आकर राव जी के बचन ज्यों के त्यों बादशाह से कह सुनाए । यह सुनकर अलाउद्दीन ने उसी समय गोलंदाजों को बुलाकर हुक्म दिया कि यहाँ से ऐसा गोला मारो कि क़िले के बुर्जो पर रखी हुई तोपें ठस होकर शांत हो जायँ । गोलंदाजों ने बादशाह की आज्ञा पालन करने के लिये यथासाध्य चेष्टा की किंतु वह निष्फल हुई । साथ ही क़िले पर से उतरे हुए गोलों की मार से लश्कर की बहुत सी तोपें ठस होकर चरख पर से गिर पड़ीं । यह देखकर बादशाह की बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। वह नाना प्रकार के तर्क वितर्क करता हुआ अपने कर्तव्य पर पछताने लगा । यह देखकर उसके वज़ीर ने उसे समझाया और रात्रि को क़िले की खाई पर पुल बाँधकर क़िले पर चढ़ जाने का मत पक्का किया, किंतु पानी की बाढ़ अधिक होने के कारण मुसलमान सेना को उससे भी हारना पड़ा । तब तो बादशाह अखंड रूप से डटकर रह गया और क़िले पर आक्रमण करने के लिये उपयुक्त समय आने की प्रतीक्षा करने लगा ।