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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

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रखते हो परंतु इसमें तुम्हारी भूल है। घर में बैठे बैठे सवा मन रुई के गद्दे पर सोते सोते और बातें करते करते सैकड़ों मनुष्य मर जाते हैं, यह हम सभों से छिपा नहीं है। क्या यह तुम समझते हो कि जो इस संसार का मारने वा जिलानेवाला है वह हमको जो डर- कर घर में छिप जावेंगे तो न मारेगा। और जो उसे जीवित रखना होगा तो हमारा नाम मिटानेवाला कौन है? इसलिये घर में निकम्मे पड़े पड़े मर जाने से तो शत्रु को मारते मारते मरना ही श्रेष्ठ है, नहीं तो जीना भी किस काम का है। भला इस बहाने से जिन स्थानों में मेरे बाप दादे रहते थे, जिन किलों के ऊपर मेरे बाप दादों के झंडे फहराते थे, जिन जंगलों में मेरे बाप दादों के शरीर का रुधिर बह चुका है, वे स्थल, वे गढ़ और राजमहल तो देखने को मिलेंगे। मेरे बाप दादे जिन स्थानों में मरे हैं वहीं मैं भी मरूँगा, उनके साथ मैं भी स्वर्गधाम पाऊँगा। कहीं हमारे कुल देवताओं ने ही अथवा हमारी भूमाता ने ही इस बहाने से मुझे वहाँ बुलवाया हो। कदाचित् उनकी इच्छा यहो हो कि मैं वहाँ जाऊँ, इसलिये वहाँ जाने से वे भी हमारी सहायता अवश्य करेंगी। भाइयो! मेरी इच्छा है कि नारियल को स्वीकार करना चाहिए। उनके बचन सुनते ही सब लोगों में वीर-रस उमड़ आया और यह बात सबने स्वीकार कर ली और हम्मीरसिंह ने पाँच सौ सवार लेकर चित्तौर जाने का विचार कर लिया। हम्मीरसिंह अपने छुँटे छुँटाए पाँच सौ सवार लेकर चित्तौर के निकट पहुँचे, उस समय मालदेव के पाँच लड़के उनकी अगवानी को आए। द्वार पर तोरण बँधा हुआ न देखा, तथा नगर में कोई धूमधाम और विवाह की तैयारी न देखी, इससे उन्होंने मालदेव के पुत्रों से पूछा कि क्यों क्या बात है, विवाह की कुछ धूमधाम नहीं दीखती। वे कुछ उत्तर न दे सके। इससे हम्मीरसिंह क्रोध में भरे हुए चित्तौर में जाकर दर्बार में बैठ गए। हम्मीरसिंह का कोप और उनके मनुष्यों के लाल मुख देख मालदेव के देवते कूँच कर गए। उनके पकड़ लेने की तो सामर्थ्य कहाँ थी पाँच सौ