हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६७ ) वीर नंगी तलवारें लिए अडिग जमे हुए थे, वहाँ किसकी सांमर्थ्य थी जो हम्मीरसिंह की ओर देख सके । हम्मीरसिंह अकेले भी माल- देव और उसके पाँच पुत्र के लिये काफी थे । मालदेव ने डरकर अपनी पुत्री के साथ हम्मीरसिंह का पाणिग्रहण कर दिया । उस लड़की ने हम्मीरसिंह को चित्तोर लेने की यह युक्ति बतलाई कि आपको जिस समय दहेज दिया जाय, उस समय आप उस वृद्ध महता को जो मेरे पिता का बड़ा चतुर सेवक है अपने लिये माँग लेना । निदान यही हुआ । इस भाँति विवाह करके हम्मीरसिंह अपने घर को लौटे । केलवाड़े में लोग बड़े अधीर हो रहे थे परंतु हम्मीर- सिंह को कुशलपूर्वक लोट आया देख लोग आनंद में मग्न हो गए । “इस रानी से हम्मीरसिंह के खेतसा नामक पुत्र जन्मा। जब खेतसी एक वर्ष का हुआ तो उसकी माता ने अपने वाप को लिखा कि मुझे अपने क्षेत्रपाल देवता के पगों लगना है, इसलिये मुझे वहाँ बुला लो । मालदेव उस समय मेर लोगों के साथ लड़ने को गया हुआ था, इससे उसके भाइयों ने अपनी बहिन को बुला लिया । इस प्रकार हम्मीरसिंह की स्त्री, उनका पुत्र और कुछ मनुष्य चित्तौर में प्रविष्ट हुए । उसी बूढ़े महता के यत्न से जो कि मालदेव के यहाँ सेना का अध्यक्ष रह चुका था, और अब हम्मीरसिंह के यहाँ रहता था यह परिणाम निकला कि चित्तौर की संपूर्ण राजपूत सेना हम्मीरसिंह के पक्ष में हो गई । हम्मीरसिंह को गद्दी पर बिठाने के समाचार भेजे गए । हम्मीरसिंह आगे से ही सावधान होकर आस पास फिरते रहते थे । यह समाचार पाते ही आ निकले, परंतु इतने ही में शत्रु की सेना भी लड़ने को आ गई । इस समय हम्मीरसिंह के पास थोड़े और शत्रु के पास बहुत से मनुष्य थे परंतु बड़े पराक्रम के साथ अपनी तलवार का स्वाद चखाते हुए हम्मीरसिंह सबको परास्त करके विजय प्राप्तकर चित्तौर में आ गद्दी पर बैठ गए । “अलाउद्दीन उस समय मर गया था और मुहम्मद तुगलक उस समय बादशाह था । मालदेव यह देखकर कि चित्तौर छिन गया