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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

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और बिना बादशाही मदद के फिर मिलना कठिन है, दिल्ली को भाग गया। “चित्तौर के गढ़ पर राणा जी का झंडा फहराता हुआ देख पहाड़ों में से आसपास के ग्रामों में से तथा गुप्त स्थानों में से निकल निकलकर टिड्डी दल की भाँति लोग चित्तौर में घुसने लगे। चित्तौर में से मुसलमानों का राज्य उठ गया और राजपूतों का आ गया, यह सुनकर लोग आनंद मग्न हो गए और दूर दूर से वहाँ आने लगे। छोटे और बड़े सब ही लोग मुसलमानों से बदला लेने की उमंग के साथ आ एकत्रित हुए। जो इस समय मुसलमानों की सेना चित्तौर लेने को आवे तो उसे कुचल डालो ऐसा वचन सबके मुख से निकलने लगा। हम्मीरसिंह को सेना की कमी न रही। मुसलमानों से युद्ध करने की उमंग में चित्तौर में झुंड के झुंड सहस्रों मनुष्य फिरने लगे। सब कहने लगे कि जो मुसलमानी सेना ऐसे समय में लड़ने को आ जावे तो उसकी अच्छी दुर्गति हो और वे जो कह रहे थे सो ही हुआ। मुहम्मद अपने छिने हुए राज्य को लौटाने को आया। हम्मीरसिंह के पास बिना बुलाए सहस्रों मनुष्य मुसलमानों के प्राण लेने को आ उपस्थित हुए और उनके उत्साह को देख राणाजी तत्काल चित्तौर से बाहर लड़ने के लिये निकले। सिंगोली स्थान के निकट बड़ा संग्राम हुआ। सारांश यह है कि राजपूतों ने इस उत्कटता से युद्ध किया कि मुसलमानों का एक भी मनुष्य दिल्ली को लौटकर न जाने दिया। “इस लड़ाई में स्वयं मुहम्मद पकड़ा गया। मालदेव का पुत्र हरीसिंह हम्मीरसिंह के साथ द्वंद्व युद्ध करता हुआ मारा गया। मुहम्मद को तीन महीने तक हम्मीरसिंह ने बँधुआ बनाकर रखा। पीछे मुहम्मद ने अजमेर, रणथंभौर, नागौर आदि पर्गने सौ हाथी और पचास लाख रुपया देकर छुटकारा पाया। “हम्मीरसिंह का बड़ा साला बनवीरसिंह उनके पास नौकरी के लिये आया। राणा जी ने उसे सत्कारपूर्वक अपने पास रखा और