हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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देने लगे और यथासमय सेना द्वारा युद्ध में सहायता करने लगे। इस भाँति मारवाड़, जयपुर, बूँदी, ग्वालियर, चंदेरी, राजौड़, राय- सेन, सीकरी, कालपी और आबू आदि ठिकानों के राजा हम्मीरसिंह जी के आज्ञाकारी हुए। हम्मीरसिंह जी भरतखंड के समस्त राजपूत राज्यों में महाराजाधिराज बन गए। मुसलमानों के आने से पहले इस देश में मेवाड़ के राजाओं की शक्ति अधिक थी, मुसलमानों के आते ही वह दिन दिन घटने लगी। हम्मीरसिंह जी ने इस अवनति को केवल रोका ही नही किंतु मुसलमानों के आने से पहले मेवाड़ की जो उत्तम दशा थी फिर उसी पर उसे पहुँचा दिया। मुहम्मद के पीछे किसी भी बादशाह ने चित्तौर के लेने का साहस न किया, इसका एकमात्र हेतु हम्मीरसिंह जी के पराक्रम का भय था। इसी से हम्मीर- सिंह के राज्यशासन के पिछले पचास वर्षों में मेवाड़ में अटल शांति रही और इस दीर्घकाल की शांति ने मेवाड़ देश को व्यापार, धन, विद्या, सभ्यता, तथा शूर पुरुषों से परिपूर्ण कर दिया। हम्मीरसिंह जी जैसे बलवान् थे वैसे ही राज्य चलाने में, न्याय करने में, कला- कौशल को उन्नति देने में प्रवीण थे। उनके राज्य में यह कहावत पूर्णतया चरितार्थ हो गई थी कि "बाघ और बकरी एक घाट पानी पीते हैं"; शांति बढ़ने से संपूर्ण व्यापारी, किसान और कारीगर अपने अपने धंधों में लग गए, इससे देश में संपत्ति बढ़ी जिससे राज्य की आय में अधिकता हुई। इन्होंने उत्तम उत्तम स्थान बनाकर कारीगरी की उन्नति की और प्रजा का न्याय यथोचित करके तथा पुत्रवत् पालन करके सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया। इस भाँति चौंसठ वर्ष राज्य भोगकर अति वृद्धावस्था में सन् १३६५ ई० में हम्मीरसिंह जी ने वैकुंठधाम का मार्ग लिया। परम बुद्धिमान् और पराक्रमी महाराणा हम्मीरसिंह जी अपने पुत्र खेतसी जी के लिये शांति-संपन्न और विस्तीर्ण राज्य छोड़ गए। मेवाड़पति महाराणा हम्मीरसिंह जी अपनी अक्षय कीर्ति छोड़कर मरे। वहाँ के लोग उन्हें अब तक सराहते हैं।"