हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
DevanagariHindipublished258 पृष्ठ
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हम्मीररासो —————— दोहा सिंधुर बदन अमंद दुति, बुद्धि सिद्धि वरदाय। सुमिरत पद-पंकज तुरत, बिघ्न अनेक विलाय ॥ १ ॥ छप्पय दुरद* वदन बुधि-सदन चंद्र लल्लाट बिराजै । भुजा च्यारि आयुद्ध तेज फरसो+ कर राजै १ ॥ इक्क दंत छवि-धाम अरुण सिंदुरमय सोहैं । मनो प्रात रबि उदित कहन उपमा कबि को है ॥ कर-कमल माल मोदक लिये उर उदार उपबीत बर । सिव सिवा सुवन गणराज तुम देहु सदा वरदाँन वर २ ॥२॥ पुंडरीक सुत सुता तासु पद-कमल मनाऊँ ॥ बिसद÷ बरण ३ बर वसन बिसद भूषण हिय ध्याऊँ ॥ बिसद जंत्र सुर सुद्ध तंत्र तुबरजुत सोहै । बिसद ताल इक भुजा द्वितिय पुस्तक मन मोहै ॥ गति राजहंस हंसह चढ़ा रटी सुरन कीरति बिमल । जय मात बिमल ४ वरदायिनी देहु सदा वरदाँन बल ॥३॥
१ वर साजै । २ वरदायक वरदान बर । ३ बसन । ४ सदा ।
- दुरद=द्विरद, गज । + फरसो=परशु । ÷ बिसद=बिमल, सुंदर ।