हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ हम्मीररासो छंद पद्धरी जय विन्नराज गणईसदेव । जय जगदंय जननी सएव१ * ॥ गुरु - पाद - पद्म वंदन सुकीन । सब सज्जन पद मन२ लीन कीन ॥ ४ ॥ प्रथिराज राज जग भौ प्रसिद्ध । भृगु वंस मध्य प्रगटे सुसिद्ध ॥ नृप चंद्रभाँन तिहिं बंस मध्य । किरवाँन+ दाँन दोऊ प्रसिद्ध ॥ ५ ॥ पिच निंवराण जग गाँम नाँम । जुत बर्णाश्रम निज धर्म्म धाँम ॥ जय कीरति भुवमंडल उदार । अरु तेज प्रतापी बल अपार ॥ ६ ॥ सब कहैं राठ कौ पातस्याह । जस श्रवन सुनन को सदा चाह ॥ द्विजराज गौड़कुल जग - प्रसिद्ध । बिद्या - बिनीत हरि - धर्म्म - वृद्ध ॥ ७ ॥ सब दया दाँन उद्दार बीर । गुण - सागर नागर परम धीर ॥ कुल पंच बृत्त कै मूल जाँन । द्विज आदि गौड़३ जानत जहाँन४ ॥ ८ ॥ सौ चौदह सै चालीस च्यार । जन - सासन-सागर अति उद्दार ॥ अब सब को किंकर मोहिं जानि । १ सहेव । २ हुलसन । ३ सोइ आदि गोर । ४ जानि ।
- सएव ( सहेव ) = स्वामिनी । * किरवाँन ( किरपान ) = कृपाण ।