भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

हम्मीररासो ५ सनकादि भए सुत च्यारि आनि¹ ॥ तप-पुंज भये नृहिं सृष्टि भोग । तहाँ मध्य भए तब रुद्र जोग ॥२०॥ भन तैं मरीचि भय तव सु आय । उपजे पुलस्त ऋषि श्रवण पाय ॥ इमि भए नाभि तैं पुलह और । कृत भए ब्रह्म कर तैं जु मौर ॥२१॥ भृगु भए स्वयंभू त्वचा ठाँन । भय प्राण नात बासिट्ठ माँन ॥ अंगुष्ठ दक्ष उपजे सु ब्रह्म । नारद जु भए उतसंग* अह्म ॥२२॥ भय छाया तैं क़रदम ऋषीस । अरु भए प्रष्टि+ अद्धरम दीस ॥ अरु हृदय भए कामा उदार । करदन तैं भौ धरमावतार ॥२३॥ भय लोम अधर² तैं अति वलिष्ठ । बानी जु विमल मुख तैं प्रतिष्ठ ॥ पद निरत मिंड³† तैं सिंधु जानि । यहिं बिधि जु प्रजापति ब्रह्म मानि ॥२४॥ अब सुनहु बंस तिनकै अपार । यह भयय सृष्टि चहुँ खाँ (चहुँधा?) निवार ॥ सिव कै जु सती त्रिय बिन प्रसूत । दिय दक्ष श्राप तातैं न पूत ॥२५॥ इक कला नाम त्रिय धर मरीच । १ मानि । २ अधुर । ३ मींड, मिड्डु । *उतसंग (उत्संग)=गोद । +प्रष्टि (पृष्ठ)=पीठ । †मिंड (मीढ)=मूत्र ।