हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ५ सनकादि भए सुत च्यारि आनि¹ ॥ तप-पुंज भये नृहिं सृष्टि भोग । तहाँ मध्य भए तब रुद्र जोग ॥२०॥ भन तैं मरीचि भय तव सु आय । उपजे पुलस्त ऋषि श्रवण पाय ॥ इमि भए नाभि तैं पुलह और । कृत भए ब्रह्म कर तैं जु मौर ॥२१॥ भृगु भए स्वयंभू त्वचा ठाँन । भय प्राण नात बासिट्ठ माँन ॥ अंगुष्ठ दक्ष उपजे सु ब्रह्म । नारद जु भए उतसंग* अह्म ॥२२॥ भय छाया तैं क़रदम ऋषीस । अरु भए प्रष्टि+ अद्धरम दीस ॥ अरु हृदय भए कामा उदार । करदन तैं भौ धरमावतार ॥२३॥ भय लोम अधर² तैं अति वलिष्ठ । बानी जु विमल मुख तैं प्रतिष्ठ ॥ पद निरत मिंड³† तैं सिंधु जानि । यहिं बिधि जु प्रजापति ब्रह्म मानि ॥२४॥ अब सुनहु बंस तिनकै अपार । यह भयय सृष्टि चहुँ खाँ (चहुँधा?) निवार ॥ सिव कै जु सती त्रिय बिन प्रसूत । दिय दक्ष श्राप तातैं न पूत ॥२५॥ इक कला नाम त्रिय धर मरीच । १ मानि । २ अधुर । ३ मींड, मिड्डु । *उतसंग (उत्संग)=गोद । +प्रष्टि (पृष्ठ)=पीठ । †मिंड (मीढ)=मूत्र ।