हंस गीता (श्रीमद्भागवत महापुराण एकादश स्कन्ध - सनकादि-हंस संवाद सटीक)
Hansa Gita from Srimad Bhagavata Purana with Commentary
भगवान् हंस अवतार / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमद्भागवतम् - एकादश स्कन्धः - त्रयोदशोऽध्यायः (हंसगीता) (श्लोक २३ का अवशिष्ट अंश / पूर्व संदर्भ): वास्तव में (समस्त प्राणियों के भौतिक शरीरों के संघटक तत्वों की दृष्टि से) सभी प्राणी एक ही तत्व से निर्मित हैं क्योंकि वे सब उन्हीं पाँच स्थूल महाभूतों से बने हैं। अतः "आप कौन हैं?" यह प्रश्न केवल एक शाब्दिक अभिव्यक्ति मात्र है जिसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। ॥ श्लोक २४ ॥ मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्धध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥ पदच्छेदः: मनसा, वचसा, दृष्ट्या, गृह्यते, अन्यैः, अपि, इन्द्रियैः, अहम्, एव, न, मत्तः, अन्यत्, इति, बुद्धध्वम्, अञ्जसा। अन्वयः: मनसा वचसा दृष्ट्या अन्यैः इन्द्रियैः अपि यत् गृह्यते तत् अहम् एव, मत्तः अन्यत् न (अस्ति), इति अञ्जसा बुद्धध्वम्। हिन्दी अनुवाद: २४. कृपा करके आप सब यह भली-भाँति और दृढ़तापूर्वक समझ लें कि मन से, वाणी से, दृष्टि से अथवा अन्य किसी भी इन्द्रिय से जो कुछ भी ग्रहण (अनुभव) किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है। ॥ श्लोक २५ ॥ गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । जीवस्य देह उभयं मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २५ ॥ पदच्छेदः: गुणेषु, आविशते, चेतः, गुणाः, चेतसि, च, प्रजाः, जीवस्य, देहः, उभयम्, मद्रूपः, उभयम्, त्यजेत्। अन्वयः: हे प्रजाः! चेतः गुणेषु आविशते, गुणाः च चेतसि (आविशन्ति), उभयं जीवस्य देहः, मद्रूपः (जीवः) उभयं त्यजेत्। हिन्दी अनुवाद: २५. हे मेरी प्रजाओं (ब्रह्मा के पुत्रों / मेरे पौत्रों)! चित्त (मन) विषय-गुणों में प्रविष्ट हो जाता है और विषय मन में (संस्कार रूप से) प्रविष्ट हो जाते हैं। ये दोनों (मन और विषय) मिलकर जीव की उपाधि (देह) बनते हैं। मुझ आत्मस्वरूप में स्थित होकर जीव को इन दोनों का त्याग कर देना चाहिए। ॥ श्लोक २६ ॥ गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ पदच्छेदः: गुणेषु, च, आविशत्, चित्तम्, अभीक्ष्णम्, गुणसेवया, गुणाः, च, चित्तप्रभवाः, मद्रूपः, उभयम्, त्यजेत्। अन्वयः: अभीक्ष्णं गुणसेवया चित्तं गुणेषु आविशत्, गुणाः च चित्तप्रभवाः, मद्रूपः (सन्) उभयं त्यजेत्। हिन्दी अनुवाद: २६. मेरे साथ अपने एकत्व (एकात्मता) का साक्षात्कार करके, जीव को उस चित्त का त्याग कर देना चाहिए जो विषयों के निरंतर सेवन से उनमें उलझा रहता है, तथा मन से उत्पन्न उन विषय-भोगों का भी त्याग कर देना चाहिए जो चित्त पर अपने संस्कार (स्मृतियाँ) अंकित करते हैं। पाद-टिप्पणी (Footnotes): [७] इस ज्ञान (आत्म-साक्षात्कार) की अग्नि द्वारा विषय-भोग और मन दोनों दग्ध (भस्म) हो जाते हैं। [८] विषय-भोगों और मन का यह संयोग जो देह का निर्माण करता है, वह वास्तव में जीव पर आरोपित एक उपाधि (सीमित करने वाली अवस्था) है, जबकि जीव तात्विक रूप से साक्षात् ब्रह्म ही है।