हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ बासी रसका गुण । रसपर्य्युषितो नेष्टस्तापहैकगते गुरुः ॥ कफपित्तकरः शोषी भेदनो वाऽथ मूत्रलः ॥ ७ ॥ बासी ईखका रस अच्छा नहीं है और किसीके मतमें तापको हरता है, भारी है, कफको और पित्तको करता है,शोषको करता है,भेदन करता है, वातको उपजाता और मूत्रल है ॥७॥ अथ पक्वरसका गुण । पक्वो गुरुतरः स्निग्धः सतीक्ष्णः कफवातहा ॥ पित्तघ्नोऽपि विशेषेण गुल्मातीसारकासहा ॥ ८ ॥ पकाया हुआ ईखका रस विशेष भारी है, चिकना है,तीक्ष्ण है, कफको और वातकों नाशत है और विशेष करके पित्तको शांत करता हुआ भी गुल्म अतीसारऔर खांसी इनको नाशता है ८ अथ फाणित रसका गुण । फाणितं गुर्वभिष्यन्दि बृंहणं शुक्रलं च तत् ॥ पित्तघ्नं च श्रमहरं रक्तदोषनिषूदनम् ॥ ९ ॥ कुचल कर निकाला रस भारी है, कफको करता है, धातुओंको पुष्ट करता है, वीर्य्यको बढाता है, पित्तको नाशता है, परिश्रमको हरता है और रक्तदोषको दूर करता है ॥ ९ ॥ अथ गुडका गुण । बल्यो वृष्यो गुरुः स्निग्धो वातघ्नो मूत्रशोधनः ॥ स पुराणोऽ- धिकगुणो गुल्मार्शोऽरोचकापहः ॥ १० ॥ क्षये कासे क्षतक्षीणे पाण्डुरोगेऽसृजः क्षये ॥ हितो योग्येन संयुक्तो गुडः पथ्यतमो मतः॥ ११ ॥ गुड बलमें हित है, वीर्य्यको करता है, भारी है, चिकना है,वातको नाशता है, मूत्रको शोधता है और पुराना गुड़ अधिक गुणोंवाला है और गुल्म, बवासीर और अरोचक इनको नाशता है॥ १०॥ क्षय, खासी, क्षतक्षीण, पांडुरोग, रक्तक्षय, इन रोगोंमें हित पदार्थसे संयुक्त किया गुड़ अतिपथ्य माना है ॥ ११ ॥ अथ गुडकी खांडका गुण । गुडखण्डश्च मधुरः सितश्च वातपित्तहा ॥ किञ्चिच्छीतगुणोपेतो बल्यो वृष्यो रुचिप्रदः ॥ १२ ॥ गुड़ की खांड मधुर है, सफेद है, वातको और पित्तको नाशती है, कुछ शीतगुणसे संयुक्त है बलमें हित है, वीर्य्यको देती है और रुचिको भी देती है ॥ १२ ॥