भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

अ० १०] भाषाटीकासमेत। ( ७३ ) अब गुणोंसे अधिक संयुक्त हुए ईखके वर्गको कहता हूं, यह ईक्षुवर्ग उत्तम रसायन है, बलप्रद है, रोगोंको दूर करता है ॥ १ ॥ स्वादु ईखके गुण। स्निग्धं च तर्पणं वापि बृंहणं च सजीवनम् ॥ २ ॥ स्वादु ईख चिकना है, तृप्तिको करता है, धातुओंको पुष्ट करता है और जीवनरूप है ॥२॥ अथ सफेद ईखका गुण। तद्वातपित्तशमनश्च तथैव वृष्य अन्तर्विदाहकफकृत्प्रथितः सितेक्षुः ॥ ३ ॥ सफेद ईख वातको और पित्तको शांत करता है, वीर्यको बढाता है, और शरीरके भीतर दाह और कफकारक प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥ अथ काले ईखके गुण। तद्वत् सुकृष्णो भवते गुणानां वृष्यो भवेत्तर्पणदाहहन्ता ॥ क्षारः स किञ्चिन्मधुरो रसेन शोषापहर्त्ता व्रणशोफकारी ॥ ४ ॥ काला ईख सफेद ईखके गुणोंसे संयुक्त होता है, वीर्यको बढ़ाता है, तृप्तिको और दाहको नाशता है, कुछ खारा है, रसकरके मधुर है, शोषको हरता है, घावको और शोजाको करता है ॥४॥ अथ यंत्रसे निकाले हुए रसका गुण। यन्त्रेण पीडितरसः कथितो गुरुश्च वृष्यः कफं च कुरुतेऽथ सुशी- तलश्च ॥ पाके विदाहबलकृच्च सुशोभनश्च संसेवितो रुधिरपि- त्तरुजं निहन्ति ॥ ५ ॥ यंत्रसे निकाला हुआ ईखका रस भारी है, वीर्यको करता है, कफको करता है, सुन्दर शीतल है, पाककालमें दाहको करता है, बलको उपजाता है, सुन्दर शोभित है और सेवित किया रक्त और पित्तके रोगको नाशता है ॥ ५ ॥ अथ दांतोंसे पीडित किये रसका गुण। दन्तैर्विपीडितरसो रुचिकृद्गुरुश्च सन्तर्पणो बलकरः कफकृ- च्छ्रमघ्नः ॥ विष्टम्भकश्च रुधिरस्य तथैव पित्तदोषं निहन्ति सकलं वमनं च शोषम् ॥ ६ ॥ दांतोंसे पीडित कर निकाला हुआ ईखका रस रुचिको करता है, भारी है, तृप्तिको करता है, बलको उपजाता है, कफको करता है, परिश्रमको नाशता है, विष्टंभको करता है, रक्तको और पित्तको नाशता है, वमनको और शोषको हरता है ॥ ६ ॥