भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

( ७२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- मनुष्यका मूत्र खारा है, चर्चरा, है, मधुर है, हलका है, नेत्रोंके रोगको रहता है, बलमें हित है, अग्निको जगाता है और कफको नाशता है ॥ ११ ॥ अथ प्रसूता और अप्रसूताके मूत्रका गुण । अप्रसूताया घनं मूत्रं प्रसूताया द्रवं लघु ॥ न किंगुणविशेषः स्यात्समता पाकवीर्य्ययोः॥ १२ ॥ नहीं प्रसूत अर्थात् बिना ब्याई हुईका मूत्र कठिन होता है, ब्याई हुईका मूत्र पतला होता है, हलका होता है और कुछ गुणमें विशेषता नहीं है,पाक कालमें और वीर्य्यमें भी समता है॥१२॥ अथ मूत्रविशेष । सौरभेयकंमूत्रं तु घनं सान्द्रं प्रशस्यते ॥ तच्च वृषणहीनानां कि- ञ्चिल्लघुतरं मतम् ॥ १३ ॥ वृषमूत्रं च शोफघ्नं क्रिमिदोषविनाश- नम्॥कामलाग्रहणीपाण्डुनाशनं चाग्निदीपनम् ॥१४॥अजागवि- गतं मूत्रं पाने शस्तं भिषग्वर ॥ आविकं माहिषं चाश्वं तैलपाके विधीयते ॥ १५ ॥ गजमूत्रप्रलेपं च कण्डूदद्रूविसर्पनुत् ॥ का- रभं खरमूत्रं वा तैले नस्ये विधायकम् ॥१६॥ इति आत्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे मूत्रवर्गो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ वृषभका मूत्र कठिन और मोटा, श्रेष्ठ होता है । बधिया किये बैलका मूत्र कुछ हलका है ॥ १३ ॥ बैलका मूत्र शोजाको हरता है, कृमिदोषको नाशता है और कामला, ग्रहणी, पांडुरोगको नाशता है और अग्निको जगाता है ॥ १४ ॥ बकरीका और गायका मूत्र पीनेमें श्रेष्ठ है । हे वैद्यवर ! मेढाका मूत्र, भैंसाका मूत्र, घोड़ेका मूत्र ये तीनों तेलपाकमें हित हैं ॥ १५ ॥ हस्तीके मूत्रका लेप खाज, दद्रू, विसर्प इनको नाशता है । ऊटका मूत्र और गधेका मूत्र तेलमें और नस्यमें उत्तम है ॥ १६ ॥ इति बेरीनिवासि- बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मूत्रवर्गो नाम नवमोध्यायः ॥ ९ ॥ दशमोऽध्यायः १०. अथ इक्षुवर्ग । अथातः संप्रवक्ष्यामि इक्षुवर्ग गुणाधिकम् ॥ रसायनोत्तमं बल्यं रोगवारणमुत्तमम् ॥ १ ॥