हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( ७१ ) अथ भैंसाके मूत्रका गुण । सारं सतिक्तं कटुकं कषायं प्रभेदि वातस्य शमं करोति ॥ पित्तप्रकोपं कुरुते सदा च कुष्ठार्शपाण्डूदरशूलनाशम् ॥ ६ ॥ भैंसाका मूत्र घना है, कडुआ है, चर्चरा है, कसैला है, भेदन करता है, वातको शांत करता है, सब कालमें पित्तको कुपित करता है और पांडु, बवासीर, कुष्ठ, उदररोग और शूल इनको नाशता है ॥ ६ ॥ अथ हस्तीके मूत्रका गुण । सुतिक्तं लवणं भेदि वातघ्नं कफकोपनम् ॥ क्षौरमण्डलकुष्ठानां नाशनं गजमूत्रकम् ॥ ७ ॥ हस्तीका मूत्र सुंदर, कडुआ है, सलोना है, भेदन करता है, वातको नाशता है, कफको कोपता है और धूर्त अर्थात् दुराचारियोंके मंडल और कुष्ठोंको नाशता है ॥ ७ ॥ अथ घोडेके मूत्रका गुण । कफकासहरं छर्दिकिमिकुष्ठविनाशनम् ॥ दीपनं कटु तीक्ष्णोष्णं वातश्लेष्मविकारनुत् ॥ ८ ॥ घोडेका मूत्र खांसीको और कफको हरता है, छर्दि, कमि और कुष्ठ इनको नाशता है, अग्निको जगाता है, चर्चरा है, तीक्ष्ण है, गरम है, वात और कफके विकारको नाशता है ॥ ८ ॥ अथ ऊँटके मूत्रका गुण । औष्ट्रं कफहरं रूक्षं क्रिमिदद्रुविनाशनम् ॥ श्रेष्ठं कुष्ठोदरोन्मादशोषाशं क्रिमिवातनुत् ॥ ९ ॥ ऊंटका मूत्र कफको हरता है, रूखा है, कृमिरोगको और दद्रुको नाशता है, श्रेष्ठ है और कुष्ठ, उदररोग, उन्माद, शोष, बवासीर, कृमि और वात इनको नाशता है ॥ ९ ॥ अथ गधेके मूत्रका गुण । गार्दभं नामनं मूत्रं तैले योज्यं क्वचिद्भवेत् ॥ सक्षारं तिक्तकटुकमुन्मादकुष्ठरोगनुत् ॥ १० ॥ गधेका मूत्र टेढा कर देता है और किसी तेलमें युक्त करनेके योग्य है, खारा है, तिक्त हैं, कडुआ है, चर्चरा है, उन्मादको और कुष्ठको नाशता है ॥ १० ॥ अथ नरके मूत्रका गुण । मानुषं क्षारकटुकं मधुरं लघु चोच्यते ॥ चक्षूरोगहरं बल्यं दीपनं कफनाशनम् ॥ ११ ॥ १ 'सारो बले स्थिरांशे च मज्जि पुंसि जले घने । न्याय्ये क्लीबे त्रिषु वरे सांद्रं मृदि वने घने' इति । मेदिनी । २ 'क्षारो रसान्तरे धूर्ते लवणे काचभस्मनोः' इति मेदिनी ।