हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- नवमोऽध्यायः ९. अथ मूत्रवर्गः । मूत्रं गोऽजाविमाहिष्यं गजाश्वोष्ट्रखरोद्भवम् ॥ मूत्रं मानुषजं चान्यत्समासेन गुणाञ्छृणु ॥ १ ॥ गाय, बकरी, भेड, भैंस, हस्ती, घोडा, ऊंट, गधा और मनुष्य इनके मूत्रोंके गुणोंको विस्तारसे सुनो ॥ १ ॥ अथ गोमूत्रके गुण । तीक्ष्णं चोष्णं क्षारमेवं कषायं बल्यं मेध्यं श्लेष्मवातान्निहन्ति ॥ भेदि रक्तपित्तशमं करोति गुल्मानाहोन्माददोषापहं च॥ २ ॥ भ्रूशङ्खहनुकण्ठकमुखानां च रोगान्गुल्मातिसारगुदमारुतनेत्र- गदान्॥कासं सकुष्ठं जठरकृमिकोशजालं गोमूत्रमेकमपि पीत- महानि हन्ति ॥ ३ ॥ गायका मूत्र तीक्ष्ण है, गरम है, खारा है, कसैला है, बलमें हित है, पवित्र है, कफको और वातको नाशता है, भेदित करनेवाला है, रक्तपित्तको शांत करता है और गुल्म, अफारा, उन्माद दोष इन्होंको हरता है ॥ २ ॥ और भुकुटी, कनपटी, ठोडी, कंठ, मुख, इनके रोगोंको और गुल्म, अतीसार, बवासीर, वातरोग, नेत्ररोग, खांसी, कुष्ठ, पेटमें कीडोंका समूह इन्होंको कई दिन पीनेसे नाशता है ॥ ३ ॥ अथ बकरीके मूत्रका गुण । आजं मूत्रं तीक्ष्णमुष्णं कषायं योज्यं पाने शूलगुल्मार्त्तिनाशम्॥ कासे श्वासे कामलापाण्डुरोगे दुर्नाम्न्येतच्छ्रेष्ठमस्तीति वैद्याः॥४॥ बकरीका मूत्र तीक्ष्ण है, गर्म है, कसैला है, गुल्मको और शूलको नाशता है और खांसी श्वास, कामला, पांडुरोग, बवासीरइनमें श्रेष्ठ है ऐसा वैद्य कहते हैं ॥ ४ ॥ अथ मेंढाके मूत्रका गुण । सक्षारं कटुकं तीक्ष्णं मूत्रं वातघ्नमाविकम् ॥ दुर्नामोदरशूलघ्नं कुष्ठमेहविशोधनम् ॥ ५ ॥ मेढाका मूत्र क्षार है, कडुआ है, तीक्ष्ण है, वातको नाशता है और कुष्ठ, बवासीर, उदर- रोग, शूल और प्रमेह इनको नाशता है ॥ ५ ॥