भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अ० ८ ] भाषाटीकासमेत । (६९) अथ दूधसे ही निकाले घृतका गुण । दूधसे निकाला घृत तृप्तिको करता है, नेत्ररोगको नाशता है, हड्डियोंको बढ़ाता है, विषों को दूर करता है और दाहको हरता है ॥ ७९ ॥ वृद्धिं करोति चास्थां वै तत्प्रोक्तं च विषापहम् ॥ तर्पणं नेत्ररोगघ्नं दाहनुत्पयसो घृतम् ॥ ७९ ॥ अथ पुराने घृतका गुण । सर्पिर्जीर्णं तच्च सन्धुक्षणे च मूर्च्छाकुष्ठोन्मादकर्णाक्षिशूले ॥ शोफार्शसोर्योनिदोषे व्रणेषु शस्तं सर्पिर्जीर्णमेवं नृणां स्यात् ८०॥ पुराना घृत जठराग्निको जगाता है और मनुष्योंके मूर्च्छा, कुष्ठ, उन्माद, कर्णशूल, नेत्र- शूल, शोजा, ववासीर, योनिदोष और घाव इनमें हित है ॥ ८० ॥ अथ नारिके घृतका गुण । कफेऽनिले योनिदोषे रोगेष्वन्येषु तद्धितम् ॥ चक्षुष्यमार्त्तं स्त्रीणां च सर्पिः स्यादमृतोपमम् ॥ ८१ ॥ कफ, वात, योनिदोष, अन्य भी रोगोंमें उत्तम है, नेत्रोंमें हित है और अमृतके समान है ऐसा नारीका घृत कहा है ॥ ८१ ॥ अथ घृतका विशेष वर्णन । बलक्षये तर्पणभोजनेषु श्रमे च पित्तासृजि रेणुयुक्ते ॥ नेत्रामये कामलपाण्डुरोगे सर्पिःक्षये योग्यतमं प्रदिष्टम् ॥ ८२ ॥ ज्वरे विबन्धेषु विषूचिकायामरोचके वा शमिते तथाग्नौ ॥ पानात्यये वापि मदात्यये वा शस्तं न सर्पिः सुधियो वदन्ति ॥ ८३ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरेक्षीरवर्गो नाम अष्टमोऽध्यायः॥८॥ बलक्षयमें, तर्पणमें, भोजनमें, परिश्रममें, पित्तरक्तमें, रेणुयुक्त नेत्रके रोगमें, कामलामें, पांडु- रोगमें, क्षयमें वैद्य घृतको उत्तम कहते हैं ॥ ८२ ॥ ज्वरमें, विबन्धमें, विषूची संज्ञक हैजामें, अरोचकमें, मन्दाग्निमें, पानात्ययमें, मदात्ययमें वैद्य घृतको अच्छा नहीं मानते हैं ॥ ८३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरचिदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने क्षीरवर्गो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ 𑁋𑁋𑁋𑁋𑁋 Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu