भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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( ६८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- गायका घृत पाक कालमें मधुर है, वीर्यमें हित है और वात, पित्त, कफ इनको नाशता है, नेत्रोंमें हित है, बलको करता है, पवित्र है, गुणोंमें उत्तम है ॥ ७३ ॥ अथ बकरीके घृतका गुण । आज्यं सन्दीपनीयं च चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् ॥ कासश्वासक्षयाणाञ्च हितं पाके कफापहम् ॥ ७४ ॥ बकरीका घृत जठराग्निको जगाता है, नेत्रोंमें हित है, बलको बढ़ाता है और खांसी, श्वास, क्षय, इन रोगवालोंको हित है और पाक कालमें कफको नाशता है ॥ ७४ ॥ अथ भैसके घृतका गुण । सवातपित्तशमनं सुशीतं माहिषं घृतम् ॥ मधुरं गुरु विष्टम्भि बल्यं श्रेष्ठगुणात्मकम् ॥ ७५ ॥ भैसका घृत वातको और पित्तको शांत करता है, सुन्दर शीतल है, मधुर है, भारी है, विष्टंभी है, बलमें हित है और श्रेष्ठगुणोंवाला है ॥ ७५ ॥ अथ ऊंटनीके घृतके गुण । औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषकृमिविषापहम् ॥ दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम् ॥ ७६ ॥ ऊंटनीका घृत पाककालमें चर्रचरा है और शोष, कृमि, विष इनको नाशता है, अग्निको जगाता है, कफ और वातको नाशता है और कुष्ठ, गुल्म और उदररोग इनको हरता है ॥७६॥ अथ भेड़के घृतका गुण। पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविषापहम् ॥ वृद्धिं करोति चास्थां वै वाश्मरीशर्करापहम् ॥ ७७ ॥ मेड़का घृत पाककालमें हलका है, सब तरहके रोगोंको और विषको हरता है, हथियोंको बढ़ाता है, पथरीको और शर्कराको नाशता है ॥ ७७ ॥ अथ घोड़ीके घृतका गुण । वृद्धिं करोति देहाग्नेः पय आश्वं विषापहम् ॥ चक्षुष्यमूषणं चाग्नेर्वातदोषनिवारणम् ॥ ७८ ॥ घोड़ीका घृत देह और जठराग्निको बढ़ाता है, विषको हरता है, नेत्रोंमें हित है, शरीरमें जलन पैदा करता है या वीर्याग्नि बढ़ाता है और वातदोष हटाता है ॥ ७८ ॥