हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ६७ ) नवीन नेनू ग्राही है, सुन्दर है, उल्बण है, अग्निको जगाता है और क्षय, अरुचि, लकुवावात, तिल्लीरोग, ग्रहणी, बवासीर इनको नाशता है ॥ ६५ ॥ नेत्रोंमें हित है, शीतल है चिकना है, वीर्यको करता है, जीवोंके जीवनको बढ़ानेवाला है, क्षीणमनुष्यके धातुओंको पुष्ट करता है, अर्थात् द्रवरूप है, शीतल स्वभाववाला है, कब्जको करता है, रक्त- पित्तको और नेत्ररोगको नाशता है ॥ ६६ ॥ और स्मृति, वायु, अग्नि, वीर्य, पराक्रम, कफ और मेद इनको बढ़ाता है और वात, पित्त, कफ, उन्माद, शोजा, कान्तिहीनता और ज्वर इनको नाशता है, सब दोषोंको हरता है, शीत है, रसमें और पाकमें मधुर है ॥ ६७ ॥
अथ फेनविधि । कृष्णगोऽश्वपयःफेनमजानां वेति शस्यते ॥ मन्दाग्नीनां कृशा- नां च विशेषादतिसारिणाम् ॥ ६८ ॥ उत्साहदीपनं बल्यं मधुरं वातनाशनम् ॥ सद्यो बलकरं चैव तस्य क्षीरविलोदितम् ॥ ६९॥ क्षीणज्वरातिसारे च सामे च विषमज्वरे ॥ मन्दाग्नौ कफमा- श्रित्य पयःफेनं प्रशस्यते ॥ ७०॥ क्षीरं गवां क्षीरफेनं तक्रं वा हितमेव च ॥ पक्वाम्रभक्षणाद्वापि ग्रहणी तस्य नश्यति॥ ७१॥ ताम्बूलं नैव सेवेत क्षीरं पीत्वा तु मानवः ॥ यावत्तच्च द्रवे- त्क्षीरं भुक्तान्ताद्वापि शस्यते ॥ ७२ ॥
काली गाय और घोड़ीके दूधका झाग अथवा बकरीके दूधका झाग मंदाग्निवालोंको और कृशमनुष्योंको और विशेष करके अतिसारवालोंको अच्छा होता है ॥ ६८ ॥ दूधको मथनेसे उत्पन्नहुए झाग उत्साहको करते हैं, बलमें हित है, मधुर हैं, वातको नाशते हैं, शीघ्र बलको करते हैं ॥ ६९ ॥ क्षीणज्वर, अतीसार, आमज्वर, विषमज्वर, मंदाग्नि, कफको आश्रित होके दूधका फेन श्रेष्ठ है ॥ ७०॥ गायका दूध अथवा गायके दूधके झाग अथवा गायके दूधका तक्र हित होता है और गायके तक्रको पीनेवाला पके हुए आंबको खावे तो ग्रहणीदोषका नाश होता है ॥ ७१ ॥ दूधका पान करके नागरपानको सेवे नहीं, जबतक वह दूध द्रवभावको नहीं प्राप्त होवे और अन्यभोजनके अंतमें नागरपान अच्छा है अथवा भोजनके अंतमें दूधका पीना अच्छा है ॥ ७२ ॥
अथ गायके घृतका गुण । विपाके मधुरं वृष्यं वातपित्तकफापहम् ॥ चक्षुष्यं बलकृन्मेध्यं गव्यं सर्पिर्गुणोत्तमम् ॥ ७३ ॥