हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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( ६६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- ... आधे पानीसे संयुक्तको उदश्वित् कहते हैं और चौपाई पानीसे संयुक्तको तक्र कहते हैं ...वात कफनाशक है और उदश्वित् कफकारी है ॥ ६० ॥ अथ हाथसे मर्दित किये तक्रका गुण । करेण मर्दितं जन्तुतर्पणं बलकृन्मतम् ॥ श्रमापहरणं स्निग्धं ग्रहयर्शोऽतिसारनुत् ॥ ६१ ॥ हाथसे मर्दित किया तक्र जीवोंको तृप्त करता है, बलको करनेवाला है, परिश्रमको हरता है, चिकना है और ग्रहणीदोष, बवासीर, अतीसारको नाशता है ॥ ६१ ॥ अथ तक्रका निषेध । ऋते शोफे च क्षीणानां नोष्णकाले शरत्सु च ॥ न मूर्च्छाभ्रम- तृष्णासु तथा रक्ते सपैत्तिके ॥ न शस्तं तक्रपानं च करोति विवि- धान्गदान् ॥ ६२ ॥ शोफाके बिना क्षीणोंको और गरम कालमें, शरदऋतुमें और मूर्च्छा, भ्रम और तृषा इनमें और रक्तपित्तमें तक्रको पीना अच्छा नहीं है क्योंकि अनेक प्रकारके रोगोंको करता है ॥ ६२ ॥ तक्रपानविधि । शीतकालेऽग्निमान्द्ये च कफोच्छ्रायामयेषु च ॥ मार्गावरोधे दुष्टे- ऽग्नौ गुल्मार्शसि तथामये ॥ ६३ ॥ शस्तं प्रोक्तं च तक्रं स्यादमीषां सर्वदा हितम् ॥ सर्वकालेषु तच्छस्तमजाँ¹जिलवणान्वितम् ६४॥ शीतकालमें, मन्दाग्निमें, कफकी अधिकतासे उपजे रोगोंमें, स्रोतोंके रुकजानेमें दुष्ट हुए अग्निमें, गुल्मरोगमें, बवासीरमें ॥ ६३ ॥ मनुष्योंको तक्र हित कहा है, जीरा और नमकसे संयुक्त किया तक्र सब कालमें उत्तम है ॥ ६४ ॥ अथ नेनूकी विधि । नवनीतं नवं ग्राहि हृद्यं चोलबणदीपकम् ॥ क्षयारुच्यर्दितप्लीहग्र- हण्यर्शोविकारनुत् ॥ ६५ ॥ चक्षुष्यं शिशिरं स्निग्धं वृष्यं जी- वनबृंहणम् ॥ क्षीणे द्रवं हिमं ग्राहि रक्तपित्ताक्षिरोगनुत् ॥ ६६ ॥ स्मृतिवाय्वग्निशुक्रौजः कफमेदोविवर्द्धनम् ॥ वातपित्तकफोन्मा- दशोफालक्ष्मीज्वरापहम् ॥ सर्वदोषापहं शीतं मधुरं रसपाकयोः ६७ १ “जीरको जरणोऽजाजी कणा कृष्णो तु जीरके ” इत्यमरसिंहः ।