हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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( ६६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- ... आधे पानीसे संयुक्तको उदश्वित् कहते हैं और चौपाई पानीसे संयुक्तको तक्र कहते हैं ...वात कफनाशक है और उदश्वित् कफकारी है ॥ ६० ॥ अथ हाथसे मर्दित किये तक्रका गुण । करेण मर्दितं जन्तुतर्पणं बलकृन्मतम् ॥ श्रमापहरणं स्निग्धं ग्रहयर्शोऽतिसारनुत् ॥ ६१ ॥ हाथसे मर्दित किया तक्र जीवोंको तृप्त करता है, बलको करनेवाला है, परिश्रमको हरता है, चिकना है और ग्रहणीदोष, बवासीर, अतीसारको नाशता है ॥ ६१ ॥ अथ तक्रका निषेध । ऋते शोफे च क्षीणानां नोष्णकाले शरत्सु च ॥ न मूर्च्छाभ्रम- तृष्णासु तथा रक्ते सपैत्तिके ॥ न शस्तं तक्रपानं च करोति विवि- धान्गदान् ॥ ६२ ॥ शोफाके बिना क्षीणोंको और गरम कालमें, शरदऋतुमें और मूर्च्छा, भ्रम और तृषा इनमें और रक्तपित्तमें तक्रको पीना अच्छा नहीं है क्योंकि अनेक प्रकारके रोगोंको करता है ॥ ६२ ॥ तक्रपानविधि । शीतकालेऽग्निमान्द्ये च कफोच्छ्रायामयेषु च ॥ मार्गावरोधे दुष्टे- ऽग्नौ गुल्मार्शसि तथामये ॥ ६३ ॥ शस्तं प्रोक्तं च तक्रं स्यादमीषां सर्वदा हितम् ॥ सर्वकालेषु तच्छस्तमजाँ¹जिलवणान्वितम् ६४॥ शीतकालमें, मन्दाग्निमें, कफकी अधिकतासे उपजे रोगोंमें, स्रोतोंके रुकजानेमें दुष्ट हुए अग्निमें, गुल्मरोगमें, बवासीरमें ॥ ६३ ॥ मनुष्योंको तक्र हित कहा है, जीरा और नमकसे संयुक्त किया तक्र सब कालमें उत्तम है ॥ ६४ ॥ अथ नेनूकी विधि । नवनीतं नवं ग्राहि हृद्यं चोलबणदीपकम् ॥ क्षयारुच्यर्दितप्लीहग्र- हण्यर्शोविकारनुत् ॥ ६५ ॥ चक्षुष्यं शिशिरं स्निग्धं वृष्यं जी- वनबृंहणम् ॥ क्षीणे द्रवं हिमं ग्राहि रक्तपित्ताक्षिरोगनुत् ॥ ६६ ॥ स्मृतिवाय्वग्निशुक्रौजः कफमेदोविवर्द्धनम् ॥ वातपित्तकफोन्मा- दशोफालक्ष्मीज्वरापहम् ॥ सर्वदोषापहं शीतं मधुरं रसपाकयोः ६७ १ “जीरको जरणोऽजाजी कणा कृष्णो तु जीरके ” इत्यमरसिंहः ।
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ६७ ) नवीन नेनू ग्राही है, सुन्दर है, उल्बण है, अग्निको जगाता है और क्षय, अरुचि, लकुवावात, तिल्लीरोग, ग्रहणी, बवासीर इनको नाशता है ॥ ६५ ॥ नेत्रोंमें हित है, शीतल है चिकना है, वीर्यको करता है, जीवोंके जीवनको बढ़ानेवाला है, क्षीणमनुष्यके धातुओंको पुष्ट करता है, अर्थात् द्रवरूप है, शीतल स्वभाववाला है, कब्जको करता है, रक्त- पित्तको और नेत्ररोगको नाशता है ॥ ६६ ॥ और स्मृति, वायु, अग्नि, वीर्य, पराक्रम, कफ और मेद इनको बढ़ाता है और वात, पित्त, कफ, उन्माद, शोजा, कान्तिहीनता और ज्वर इनको नाशता है, सब दोषोंको हरता है, शीत है, रसमें और पाकमें मधुर है ॥ ६७ ॥
अथ फेनविधि । कृष्णगोऽश्वपयःफेनमजानां वेति शस्यते ॥ मन्दाग्नीनां कृशा- नां च विशेषादतिसारिणाम् ॥ ६८ ॥ उत्साहदीपनं बल्यं मधुरं वातनाशनम् ॥ सद्यो बलकरं चैव तस्य क्षीरविलोदितम् ॥ ६९॥ क्षीणज्वरातिसारे च सामे च विषमज्वरे ॥ मन्दाग्नौ कफमा- श्रित्य पयःफेनं प्रशस्यते ॥ ७०॥ क्षीरं गवां क्षीरफेनं तक्रं वा हितमेव च ॥ पक्वाम्रभक्षणाद्वापि ग्रहणी तस्य नश्यति॥ ७१॥ ताम्बूलं नैव सेवेत क्षीरं पीत्वा तु मानवः ॥ यावत्तच्च द्रवे- त्क्षीरं भुक्तान्ताद्वापि शस्यते ॥ ७२ ॥
काली गाय और घोड़ीके दूधका झाग अथवा बकरीके दूधका झाग मंदाग्निवालोंको और कृशमनुष्योंको और विशेष करके अतिसारवालोंको अच्छा होता है ॥ ६८ ॥ दूधको मथनेसे उत्पन्नहुए झाग उत्साहको करते हैं, बलमें हित है, मधुर हैं, वातको नाशते हैं, शीघ्र बलको करते हैं ॥ ६९ ॥ क्षीणज्वर, अतीसार, आमज्वर, विषमज्वर, मंदाग्नि, कफको आश्रित होके दूधका फेन श्रेष्ठ है ॥ ७०॥ गायका दूध अथवा गायके दूधके झाग अथवा गायके दूधका तक्र हित होता है और गायके तक्रको पीनेवाला पके हुए आंबको खावे तो ग्रहणीदोषका नाश होता है ॥ ७१ ॥ दूधका पान करके नागरपानको सेवे नहीं, जबतक वह दूध द्रवभावको नहीं प्राप्त होवे और अन्यभोजनके अंतमें नागरपान अच्छा है अथवा भोजनके अंतमें दूधका पीना अच्छा है ॥ ७२ ॥
अथ गायके घृतका गुण । विपाके मधुरं वृष्यं वातपित्तकफापहम् ॥ चक्षुष्यं बलकृन्मेध्यं गव्यं सर्पिर्गुणोत्तमम् ॥ ७३ ॥
( ६८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- गायका घृत पाक कालमें मधुर है, वीर्यमें हित है और वात, पित्त, कफ इनको नाशता है, नेत्रोंमें हित है, बलको करता है, पवित्र है, गुणोंमें उत्तम है ॥ ७३ ॥ अथ बकरीके घृतका गुण । आज्यं सन्दीपनीयं च चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् ॥ कासश्वासक्षयाणाञ्च हितं पाके कफापहम् ॥ ७४ ॥ बकरीका घृत जठराग्निको जगाता है, नेत्रोंमें हित है, बलको बढ़ाता है और खांसी, श्वास, क्षय, इन रोगवालोंको हित है और पाक कालमें कफको नाशता है ॥ ७४ ॥ अथ भैसके घृतका गुण । सवातपित्तशमनं सुशीतं माहिषं घृतम् ॥ मधुरं गुरु विष्टम्भि बल्यं श्रेष्ठगुणात्मकम् ॥ ७५ ॥ भैसका घृत वातको और पित्तको शांत करता है, सुन्दर शीतल है, मधुर है, भारी है, विष्टंभी है, बलमें हित है और श्रेष्ठगुणोंवाला है ॥ ७५ ॥ अथ ऊंटनीके घृतके गुण । औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषकृमिविषापहम् ॥ दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम् ॥ ७६ ॥ ऊंटनीका घृत पाककालमें चर्रचरा है और शोष, कृमि, विष इनको नाशता है, अग्निको जगाता है, कफ और वातको नाशता है और कुष्ठ, गुल्म और उदररोग इनको हरता है ॥७६॥ अथ भेड़के घृतका गुण। पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविषापहम् ॥ वृद्धिं करोति चास्थां वै वाश्मरीशर्करापहम् ॥ ७७ ॥ मेड़का घृत पाककालमें हलका है, सब तरहके रोगोंको और विषको हरता है, हथियोंको बढ़ाता है, पथरीको और शर्कराको नाशता है ॥ ७७ ॥ अथ घोड़ीके घृतका गुण । वृद्धिं करोति देहाग्नेः पय आश्वं विषापहम् ॥ चक्षुष्यमूषणं चाग्नेर्वातदोषनिवारणम् ॥ ७८ ॥ घोड़ीका घृत देह और जठराग्निको बढ़ाता है, विषको हरता है, नेत्रोंमें हित है, शरीरमें जलन पैदा करता है या वीर्याग्नि बढ़ाता है और वातदोष हटाता है ॥ ७८ ॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अ० ८ ] भाषाटीकासमेत । (६९) अथ दूधसे ही निकाले घृतका गुण । दूधसे निकाला घृत तृप्तिको करता है, नेत्ररोगको नाशता है, हड्डियोंको बढ़ाता है, विषों को दूर करता है और दाहको हरता है ॥ ७९ ॥ वृद्धिं करोति चास्थां वै तत्प्रोक्तं च विषापहम् ॥ तर्पणं नेत्ररोगघ्नं दाहनुत्पयसो घृतम् ॥ ७९ ॥ अथ पुराने घृतका गुण । सर्पिर्जीर्णं तच्च सन्धुक्षणे च मूर्च्छाकुष्ठोन्मादकर्णाक्षिशूले ॥ शोफार्शसोर्योनिदोषे व्रणेषु शस्तं सर्पिर्जीर्णमेवं नृणां स्यात् ८०॥ पुराना घृत जठराग्निको जगाता है और मनुष्योंके मूर्च्छा, कुष्ठ, उन्माद, कर्णशूल, नेत्र- शूल, शोजा, ववासीर, योनिदोष और घाव इनमें हित है ॥ ८० ॥ अथ नारिके घृतका गुण । कफेऽनिले योनिदोषे रोगेष्वन्येषु तद्धितम् ॥ चक्षुष्यमार्त्तं स्त्रीणां च सर्पिः स्यादमृतोपमम् ॥ ८१ ॥ कफ, वात, योनिदोष, अन्य भी रोगोंमें उत्तम है, नेत्रोंमें हित है और अमृतके समान है ऐसा नारीका घृत कहा है ॥ ८१ ॥ अथ घृतका विशेष वर्णन । बलक्षये तर्पणभोजनेषु श्रमे च पित्तासृजि रेणुयुक्ते ॥ नेत्रामये कामलपाण्डुरोगे सर्पिःक्षये योग्यतमं प्रदिष्टम् ॥ ८२ ॥ ज्वरे विबन्धेषु विषूचिकायामरोचके वा शमिते तथाग्नौ ॥ पानात्यये वापि मदात्यये वा शस्तं न सर्पिः सुधियो वदन्ति ॥ ८३ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरेक्षीरवर्गो नाम अष्टमोऽध्यायः॥८॥ बलक्षयमें, तर्पणमें, भोजनमें, परिश्रममें, पित्तरक्तमें, रेणुयुक्त नेत्रके रोगमें, कामलामें, पांडु- रोगमें, क्षयमें वैद्य घृतको उत्तम कहते हैं ॥ ८२ ॥ ज्वरमें, विबन्धमें, विषूची संज्ञक हैजामें, अरोचकमें, मन्दाग्निमें, पानात्ययमें, मदात्ययमें वैद्य घृतको अच्छा नहीं मानते हैं ॥ ८३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरचिदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने क्षीरवर्गो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ 𑁋𑁋𑁋𑁋𑁋 Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( ७० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- नवमोऽध्यायः ९. अथ मूत्रवर्गः । मूत्रं गोऽजाविमाहिष्यं गजाश्वोष्ट्रखरोद्भवम् ॥ मूत्रं मानुषजं चान्यत्समासेन गुणाञ्छृणु ॥ १ ॥ गाय, बकरी, भेड, भैंस, हस्ती, घोडा, ऊंट, गधा और मनुष्य इनके मूत्रोंके गुणोंको विस्तारसे सुनो ॥ १ ॥ अथ गोमूत्रके गुण । तीक्ष्णं चोष्णं क्षारमेवं कषायं बल्यं मेध्यं श्लेष्मवातान्निहन्ति ॥ भेदि रक्तपित्तशमं करोति गुल्मानाहोन्माददोषापहं च॥ २ ॥ भ्रूशङ्खहनुकण्ठकमुखानां च रोगान्गुल्मातिसारगुदमारुतनेत्र- गदान्॥कासं सकुष्ठं जठरकृमिकोशजालं गोमूत्रमेकमपि पीत- महानि हन्ति ॥ ३ ॥ गायका मूत्र तीक्ष्ण है, गरम है, खारा है, कसैला है, बलमें हित है, पवित्र है, कफको और वातको नाशता है, भेदित करनेवाला है, रक्तपित्तको शांत करता है और गुल्म, अफारा, उन्माद दोष इन्होंको हरता है ॥ २ ॥ और भुकुटी, कनपटी, ठोडी, कंठ, मुख, इनके रोगोंको और गुल्म, अतीसार, बवासीर, वातरोग, नेत्ररोग, खांसी, कुष्ठ, पेटमें कीडोंका समूह इन्होंको कई दिन पीनेसे नाशता है ॥ ३ ॥ अथ बकरीके मूत्रका गुण । आजं मूत्रं तीक्ष्णमुष्णं कषायं योज्यं पाने शूलगुल्मार्त्तिनाशम्॥ कासे श्वासे कामलापाण्डुरोगे दुर्नाम्न्येतच्छ्रेष्ठमस्तीति वैद्याः॥४॥ बकरीका मूत्र तीक्ष्ण है, गर्म है, कसैला है, गुल्मको और शूलको नाशता है और खांसी श्वास, कामला, पांडुरोग, बवासीरइनमें श्रेष्ठ है ऐसा वैद्य कहते हैं ॥ ४ ॥ अथ मेंढाके मूत्रका गुण । सक्षारं कटुकं तीक्ष्णं मूत्रं वातघ्नमाविकम् ॥ दुर्नामोदरशूलघ्नं कुष्ठमेहविशोधनम् ॥ ५ ॥ मेढाका मूत्र क्षार है, कडुआ है, तीक्ष्ण है, वातको नाशता है और कुष्ठ, बवासीर, उदर- रोग, शूल और प्रमेह इनको नाशता है ॥ ५ ॥
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( ७१ ) अथ भैंसाके मूत्रका गुण । सारं सतिक्तं कटुकं कषायं प्रभेदि वातस्य शमं करोति ॥ पित्तप्रकोपं कुरुते सदा च कुष्ठार्शपाण्डूदरशूलनाशम् ॥ ६ ॥ भैंसाका मूत्र घना है, कडुआ है, चर्चरा है, कसैला है, भेदन करता है, वातको शांत करता है, सब कालमें पित्तको कुपित करता है और पांडु, बवासीर, कुष्ठ, उदररोग और शूल इनको नाशता है ॥ ६ ॥ अथ हस्तीके मूत्रका गुण । सुतिक्तं लवणं भेदि वातघ्नं कफकोपनम् ॥ क्षौरमण्डलकुष्ठानां नाशनं गजमूत्रकम् ॥ ७ ॥ हस्तीका मूत्र सुंदर, कडुआ है, सलोना है, भेदन करता है, वातको नाशता है, कफको कोपता है और धूर्त अर्थात् दुराचारियोंके मंडल और कुष्ठोंको नाशता है ॥ ७ ॥ अथ घोडेके मूत्रका गुण । कफकासहरं छर्दिकिमिकुष्ठविनाशनम् ॥ दीपनं कटु तीक्ष्णोष्णं वातश्लेष्मविकारनुत् ॥ ८ ॥ घोडेका मूत्र खांसीको और कफको हरता है, छर्दि, कमि और कुष्ठ इनको नाशता है, अग्निको जगाता है, चर्चरा है, तीक्ष्ण है, गरम है, वात और कफके विकारको नाशता है ॥ ८ ॥ अथ ऊँटके मूत्रका गुण । औष्ट्रं कफहरं रूक्षं क्रिमिदद्रुविनाशनम् ॥ श्रेष्ठं कुष्ठोदरोन्मादशोषाशं क्रिमिवातनुत् ॥ ९ ॥ ऊंटका मूत्र कफको हरता है, रूखा है, कृमिरोगको और दद्रुको नाशता है, श्रेष्ठ है और कुष्ठ, उदररोग, उन्माद, शोष, बवासीर, कृमि और वात इनको नाशता है ॥ ९ ॥ अथ गधेके मूत्रका गुण । गार्दभं नामनं मूत्रं तैले योज्यं क्वचिद्भवेत् ॥ सक्षारं तिक्तकटुकमुन्मादकुष्ठरोगनुत् ॥ १० ॥ गधेका मूत्र टेढा कर देता है और किसी तेलमें युक्त करनेके योग्य है, खारा है, तिक्त हैं, कडुआ है, चर्चरा है, उन्मादको और कुष्ठको नाशता है ॥ १० ॥ अथ नरके मूत्रका गुण । मानुषं क्षारकटुकं मधुरं लघु चोच्यते ॥ चक्षूरोगहरं बल्यं दीपनं कफनाशनम् ॥ ११ ॥ १ 'सारो बले स्थिरांशे च मज्जि पुंसि जले घने । न्याय्ये क्लीबे त्रिषु वरे सांद्रं मृदि वने घने' इति । मेदिनी । २ 'क्षारो रसान्तरे धूर्ते लवणे काचभस्मनोः' इति मेदिनी ।
( ७२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- मनुष्यका मूत्र खारा है, चर्चरा, है, मधुर है, हलका है, नेत्रोंके रोगको रहता है, बलमें हित है, अग्निको जगाता है और कफको नाशता है ॥ ११ ॥ अथ प्रसूता और अप्रसूताके मूत्रका गुण । अप्रसूताया घनं मूत्रं प्रसूताया द्रवं लघु ॥ न किंगुणविशेषः स्यात्समता पाकवीर्य्ययोः॥ १२ ॥ नहीं प्रसूत अर्थात् बिना ब्याई हुईका मूत्र कठिन होता है, ब्याई हुईका मूत्र पतला होता है, हलका होता है और कुछ गुणमें विशेषता नहीं है,पाक कालमें और वीर्य्यमें भी समता है॥१२॥ अथ मूत्रविशेष । सौरभेयकंमूत्रं तु घनं सान्द्रं प्रशस्यते ॥ तच्च वृषणहीनानां कि- ञ्चिल्लघुतरं मतम् ॥ १३ ॥ वृषमूत्रं च शोफघ्नं क्रिमिदोषविनाश- नम्॥कामलाग्रहणीपाण्डुनाशनं चाग्निदीपनम् ॥१४॥अजागवि- गतं मूत्रं पाने शस्तं भिषग्वर ॥ आविकं माहिषं चाश्वं तैलपाके विधीयते ॥ १५ ॥ गजमूत्रप्रलेपं च कण्डूदद्रूविसर्पनुत् ॥ का- रभं खरमूत्रं वा तैले नस्ये विधायकम् ॥१६॥ इति आत्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे मूत्रवर्गो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ वृषभका मूत्र कठिन और मोटा, श्रेष्ठ होता है । बधिया किये बैलका मूत्र कुछ हलका है ॥ १३ ॥ बैलका मूत्र शोजाको हरता है, कृमिदोषको नाशता है और कामला, ग्रहणी, पांडुरोगको नाशता है और अग्निको जगाता है ॥ १४ ॥ बकरीका और गायका मूत्र पीनेमें श्रेष्ठ है । हे वैद्यवर ! मेढाका मूत्र, भैंसाका मूत्र, घोड़ेका मूत्र ये तीनों तेलपाकमें हित हैं ॥ १५ ॥ हस्तीके मूत्रका लेप खाज, दद्रू, विसर्प इनको नाशता है । ऊटका मूत्र और गधेका मूत्र तेलमें और नस्यमें उत्तम है ॥ १६ ॥ इति बेरीनिवासि- बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मूत्रवर्गो नाम नवमोध्यायः ॥ ९ ॥ दशमोऽध्यायः १०. अथ इक्षुवर्ग । अथातः संप्रवक्ष्यामि इक्षुवर्ग गुणाधिकम् ॥ रसायनोत्तमं बल्यं रोगवारणमुत्तमम् ॥ १ ॥
अ० १०] भाषाटीकासमेत। ( ७३ ) अब गुणोंसे अधिक संयुक्त हुए ईखके वर्गको कहता हूं, यह ईक्षुवर्ग उत्तम रसायन है, बलप्रद है, रोगोंको दूर करता है ॥ १ ॥ स्वादु ईखके गुण। स्निग्धं च तर्पणं वापि बृंहणं च सजीवनम् ॥ २ ॥ स्वादु ईख चिकना है, तृप्तिको करता है, धातुओंको पुष्ट करता है और जीवनरूप है ॥२॥ अथ सफेद ईखका गुण। तद्वातपित्तशमनश्च तथैव वृष्य अन्तर्विदाहकफकृत्प्रथितः सितेक्षुः ॥ ३ ॥ सफेद ईख वातको और पित्तको शांत करता है, वीर्यको बढाता है, और शरीरके भीतर दाह और कफकारक प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥ अथ काले ईखके गुण। तद्वत् सुकृष्णो भवते गुणानां वृष्यो भवेत्तर्पणदाहहन्ता ॥ क्षारः स किञ्चिन्मधुरो रसेन शोषापहर्त्ता व्रणशोफकारी ॥ ४ ॥ काला ईख सफेद ईखके गुणोंसे संयुक्त होता है, वीर्यको बढ़ाता है, तृप्तिको और दाहको नाशता है, कुछ खारा है, रसकरके मधुर है, शोषको हरता है, घावको और शोजाको करता है ॥४॥ अथ यंत्रसे निकाले हुए रसका गुण। यन्त्रेण पीडितरसः कथितो गुरुश्च वृष्यः कफं च कुरुतेऽथ सुशी- तलश्च ॥ पाके विदाहबलकृच्च सुशोभनश्च संसेवितो रुधिरपि- त्तरुजं निहन्ति ॥ ५ ॥ यंत्रसे निकाला हुआ ईखका रस भारी है, वीर्यको करता है, कफको करता है, सुन्दर शीतल है, पाककालमें दाहको करता है, बलको उपजाता है, सुन्दर शोभित है और सेवित किया रक्त और पित्तके रोगको नाशता है ॥ ५ ॥ अथ दांतोंसे पीडित किये रसका गुण। दन्तैर्विपीडितरसो रुचिकृद्गुरुश्च सन्तर्पणो बलकरः कफकृ- च्छ्रमघ्नः ॥ विष्टम्भकश्च रुधिरस्य तथैव पित्तदोषं निहन्ति सकलं वमनं च शोषम् ॥ ६ ॥ दांतोंसे पीडित कर निकाला हुआ ईखका रस रुचिको करता है, भारी है, तृप्तिको करता है, बलको उपजाता है, कफको करता है, परिश्रमको नाशता है, विष्टंभको करता है, रक्तको और पित्तको नाशता है, वमनको और शोषको हरता है ॥ ६ ॥
( ७४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ बासी रसका गुण । रसपर्य्युषितो नेष्टस्तापहैकगते गुरुः ॥ कफपित्तकरः शोषी भेदनो वाऽथ मूत्रलः ॥ ७ ॥ बासी ईखका रस अच्छा नहीं है और किसीके मतमें तापको हरता है, भारी है, कफको और पित्तको करता है,शोषको करता है,भेदन करता है, वातको उपजाता और मूत्रल है ॥७॥ अथ पक्वरसका गुण । पक्वो गुरुतरः स्निग्धः सतीक्ष्णः कफवातहा ॥ पित्तघ्नोऽपि विशेषेण गुल्मातीसारकासहा ॥ ८ ॥ पकाया हुआ ईखका रस विशेष भारी है, चिकना है,तीक्ष्ण है, कफको और वातकों नाशत है और विशेष करके पित्तको शांत करता हुआ भी गुल्म अतीसारऔर खांसी इनको नाशता है ८ अथ फाणित रसका गुण । फाणितं गुर्वभिष्यन्दि बृंहणं शुक्रलं च तत् ॥ पित्तघ्नं च श्रमहरं रक्तदोषनिषूदनम् ॥ ९ ॥ कुचल कर निकाला रस भारी है, कफको करता है, धातुओंको पुष्ट करता है, वीर्य्यको बढाता है, पित्तको नाशता है, परिश्रमको हरता है और रक्तदोषको दूर करता है ॥ ९ ॥ अथ गुडका गुण । बल्यो वृष्यो गुरुः स्निग्धो वातघ्नो मूत्रशोधनः ॥ स पुराणोऽ- धिकगुणो गुल्मार्शोऽरोचकापहः ॥ १० ॥ क्षये कासे क्षतक्षीणे पाण्डुरोगेऽसृजः क्षये ॥ हितो योग्येन संयुक्तो गुडः पथ्यतमो मतः॥ ११ ॥ गुड बलमें हित है, वीर्य्यको करता है, भारी है, चिकना है,वातको नाशता है, मूत्रको शोधता है और पुराना गुड़ अधिक गुणोंवाला है और गुल्म, बवासीर और अरोचक इनको नाशता है॥ १०॥ क्षय, खासी, क्षतक्षीण, पांडुरोग, रक्तक्षय, इन रोगोंमें हित पदार्थसे संयुक्त किया गुड़ अतिपथ्य माना है ॥ ११ ॥ अथ गुडकी खांडका गुण । गुडखण्डश्च मधुरः सितश्च वातपित्तहा ॥ किञ्चिच्छीतगुणोपेतो बल्यो वृष्यो रुचिप्रदः ॥ १२ ॥ गुड़ की खांड मधुर है, सफेद है, वातको और पित्तको नाशती है, कुछ शीतगुणसे संयुक्त है बलमें हित है, वीर्य्यको देती है और रुचिको भी देती है ॥ १२ ॥
अ० १०] भाषाटीकासमेता । (७५) अथ साधारण खांड़का गुण । वातपित्तहरं शीतं स्निग्धं बल्यं सुखप्रियम् ॥ चक्षुष्यं श्लेष्मकृच्चोक्तं खण्डं वृष्यतमं मतम् ॥ १३ ॥ खांड साधारण वातको और पित्तको हरती है, शीतल है, चिकनी है, बलमें हित है, मुखमें- प्रिय है, नेत्रोंमें हित है, कफको करती है और वीर्यको अति बढ़ाती है ॥ १३ ॥ अथ मिश्रीका गुण । सिता सुमधुरा प्रोक्ता वृष्या शुक्रविवर्द्धनी ॥ पित्तघ्नी मधुरा बल्या शर्करा पालिनी नृणाम् ॥ १४ ॥ मिश्री सुंदर मधुर है, धातुओंको पुष्ट करती है, वीर्यको बढ़ाती है पित्तको नाशती है, मधुर है, बलमें हित है, मनुष्योंकी रक्षा करती है ॥ १४ ॥ अथ सुन्दरखांडका गुण । शर्करान्या सुशीता च कासशूलसमुद्भवा ॥ हिता पित्तासृजि शोषे मूर्च्छाभ्रममदापहा ॥ १५ ॥ सफेद खांड सुंदर शीतल है, खांसीको और शूलको उपजाती है, पित्त रक्तमें हित है, शोषमें हित है और मूर्च्छा, मद, भ्रम, इनको नाशती है ॥ १५ ॥ अथ गुडकी विशेषता । गुदामये कामलशोषमेहे गुल्मामय पाण्डुहलीमके च ॥ वाते सपित्तासृजि राजरोगे रुचिप्रदो रोगहरो गुरुः स्यात् ॥१६ ॥ कासे शोषे गुडो नेष्ट अन्यत्रापि हितो मतः ॥ योगयुक्तोहि सर्वत्र हितो गुणगणालयः ॥१७॥ क्षामक्षामक्षतगतरुजाश्वासमूर्च्छा- गदीनामध्वश्रान्तिश्रममदविषमूत्रकृच्छ्राश्मरीणाम्॥जीर्णक्षाम- ज्वरविषमगे रक्तपित्तप्रकोपे तृष्णादाहक्षयरुधिरगे सर्वरोगा- न्निहन्ति ॥ १८॥ इति आत्रेयभाषितं हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने इक्षुवर्गो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ गुदारोगमें, कामलामें, शोषमें, प्रमेहमें गुल्ममें, पांडु और हलीमकमें, वातमें, रक्तपित्तमें, राजरोगमें, गुड़ रुचिको देता है और रोगको हरता है, भारी है ॥ १६ ॥ परंतु खांसी और शोषमें अकेला गुड़ अच्छा नहीं है और अन्य जगह हित है और योगोंमें युक्त किया गुड़ सब रोगोंमें हित है और गुणोंके समूहका स्थान है ॥ १७ ॥ कृश, क्षयरोग, श्वास, मूर्च्छा,
( ७६ ) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- इन रोगोंको और मार्गके चलनेसे थकना,परिश्रम, मद, विष, मूत्रकृच्छ्र, पथरी इन रोगोंको और बुढ़ापा, विषमज्वर, रक्तपित्तका प्रकोप, तृषा, दाह, क्षय, रक्तरोग इनको गुड़ हरता है ॥१८॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने इक्षुवर्गो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ एकादशोऽध्यायः ११. अथ कांजीके वर्ग । सन्धानं शीतलं स्वादु महातीसारनाशनम् ॥ कांजी शीतल है, स्वादु है, महातीसारको नाशती है । अथ चावलोंके पानीका गुण । सुस्वादु शीतलं चैव बृंहणं तण्डुलोदकम् ॥ १ ॥ चावलोंका पानी सुंदर स्वादु है, शीतल है और धातुओंको पुष्ट करता है ॥ १ ॥ अथ तुषोदकका गुण । सवातपित्तस्य हरं तुषोदं सरक्तपित्तस्य प्रभेदकञ्च ॥ विपाचनं स्याज्जरणं कृमिघ्नमजीर्णनाशं कटुक विपाके॥२॥ तुषोदक वातपित्तको हरता है, रक्तपित्तको हरता है, भेदन करता है, विशेषकरके पाचन है, जराता है, कीड़ोंको हरता है, अजीर्णको हरता है और पाककालमें चर्चरा है ॥ २ ॥ अथ जब और गेहूंकी कांजीका गुण । जातं यवाम्लं कटुकं विपाकेवातापहं श्लेष्महरं सरक्तम्॥पित्ता- प्रकोपं कुरुते सभेदि विदूषणं पित्तगदास्रजश्व ॥३॥ संदीपनं शूलहरं सुरुच्यं गोधूमजातं क्वथितं कषायम्॥सन्दीपनं स्या- ज्जरणं कफघ्नं समीरदोषं हरते ततोऽपि ॥ ४ ॥ जबोंकी कांजी पाककालमें चर्चरी है, वातको और कफको हरती है, रक्तको और पित्तको कोपती है,भेदन करती है और पित्त और रक्तको दूषित करती है ॥ ३ ॥ गेहूंकी कांजी दीपन है, शूल हरती है, रुचिकर है, कषैली है, जठराग्निको तेजकरती है, कफघ्न है और वातदोषको हरती है ॥ ४ ॥ अथ तेलयुक्त कांजीका गुण । पीतं जरयते चामं बाह्यादाहश्रमापहम् ॥ स्याच्च तत्कुष्ठकण्डूघ्नं तैलयुक्तं समीरहृत् ॥ ५ ॥
अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ७७ ) तेलसे युक्त हुई कांजी पीनेसे आमको जराती है, शरीरके बाहिरके दाहको और परिश्रमको हरती है, कुष्ठको और खाजको तथा वायुको नाशती है ॥ ५ ॥ अथ युगंधरकांजीका गुण । युगन्धराम्लं कफवातहन्तृ शूलामयानां जरणप्रकर्त्तृ ॥ तीक्ष्णं तथाम्लं श्रमदोषहन्तृ मेहार्शसो रक्तहितं मतं च ॥ ६ ॥ जवारकी कांजी कफको और वातको हरती है, शूल रोगोंको जलाती है, तीक्ष्ण है, खट्टी है, श्रम दोषको हरती है, प्रमेहमें बवासीरमें और रक्तमें हित कही गयी है ॥ ६ ॥ अथ कांजीका परिहार । शोषे मूर्च्छाज्वरार्त्तानां भ्रमके दुर्विषाद्दिते ॥ कुष्ठानां रक्तपित्तानां काञ्जिकं न प्रशस्यते ॥ ७ ॥ पाण्डुरोगे राजयक्ष्मे तथा शोफा- तुरेषु च ॥ क्षतक्षीणे पथि श्रान्ते मन्दज्वरनिपीडिते ॥ नरे नैव हितं प्रोक्तं काञ्जिकं दोषकारकम् ॥ ८ ॥ शोषमें, मूर्छा और ज्वरसे पीडितको भ्रममें, दुष्ट विषकी पीडामें, कुष्ठ और रक्तपित्तमें कांजी अच्छी नहीं है ॥ ७ ॥ पांडुरोगमें, राजरोगमें और शोजासे पीडित रोगीको और क्षतसे क्षीण हुएको और मार्गमें थके हुए और मंद ज्वरसे पीडितको कांजी अच्छी नहीं है किंतु दोषोंको करती है ॥ ८ ॥ अथ कांजीकी प्रशंसा । शूलवातार्द्दितानां तु तथा जीर्णविबन्धिनाम् ॥ श्रेष्ठं प्रोक्तं तथा- म्लं च गुणाधिक्यं नरेषु च ॥ ९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतो- त्तरे काञ्जिकवर्गो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ शूल और वातसे पीडितोंको, अजीर्ण और बद्धकोष्ठवालोंको कांजी श्रेष्ठ है और मनुष्योंमें गुणोंकी अधिकता करती है ॥ ९॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्राह्यनुवादित- हारीतसंहिताभाषाटीकायां कांजिकवर्गो नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः १२. अथ चावलोंके मंडका गुण । धान्यमण्डं पित्तहरं श्रमघ्नं चाश्मरीहरम् ॥ वातलं रक्तशमनं ग्राहि सन्दीपनं वरम् ॥ १ ॥
( ७८ ) हारितसंहिता । [ प्रथमस्थाने- चावलोंका मांड पित्तको हरता है, परिश्रमको हरता है, पथरीको हरता है, वायुको उपजात है, रक्तको शांत करता है, कब्जको करता है और अग्निको अच्छी तरह जगाता है ॥ १ ॥ अथ लाल चावलके मांडका गुण । रक्तशाल्युद्भवं मण्डं मधुरं ग्राहि शीतलम् ॥ प्रमेहानश्मरीं हन्ति वातलं पित्तहृद्वरम् ॥ २ ॥ लाल चावलोंका मांड मधुर है, कब्जको करता है, शीतल है, प्रमेहोंको और पथरीको हरता है, वातल है, पित्तको हरता है, सुन्दर है ॥ २ ॥ अथ सफेद चावलोंके मांडका गुण । मधुरं शीतलं किञ्चिच्छ्लेष्मलं शोषनाशनम् ॥ अश्मरीमेहसंच्छर्दिवातलं श्वेततण्डुलम् ॥ ३ ॥ सफेद चावलोंका मांड मधुर है, शीतल है, कुछ कफको करता है, शोषको नाशता है और पथरी, प्रमेह, छर्दि, वात इनको करता है ॥ ३ ॥ अथ जवोंके मांडका गुण ! यवमण्डं कषायं स्याद्ग्राहि चोष्णे विपाकि च ॥ जवोंका मांड कसैला है, कब्जको करता है, गरम पाकवाला है। अथ गेहूँके मांडका गुण । तद्वद्गोधूमसम्भूतं मधुरं पित्तवारणम् ॥ ४ ॥ गेहुँओंका मांड जवोंके मांडके समान गुण देता है, परंतु मधुर है और पित्तको दूर करता है ॥ ४ ॥ अथ क्षुद्र-अन्नके मांडका गुण । अन्येषां क्षुद्रधान्यानां मण्डं वातहरं स्मृतम् ॥ अन्य क्षुद्रसंज्ञक अन्नोंका मांड वातको हरनेवाला कहा है । अथ कोदूं अन्नके मांडका गुण । ग्लानिमूर्च्छाकरं सद्यः कोद्रवं न हितं मतम् ॥ ५ ॥ कोदूं अन्नका मांड ग्लानिको और मूर्च्छाको शीघ्र करता है और हित नहीं माना है ॥ ५ ॥ अथ क्षुद्र अन्नके कांजीका गुण । तद्वच्च क्षुद्रधान्याम्लं वातलं पित्तकारकम् ॥ करोति श्लीपदं गुल्मं प्रतिश्यायादिकोपनम् ॥ ६ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे मण्डवर्गो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
२. द्वितीय स्थान: निदान स्थान (त्रिदोष, ज्वर, पाण्डु, कामला)
अ० १३ ] भाषाटीकासमेता । (७९) क्षुद्र अन्नकी कांजी ग्लानिको और मूर्च्छाको शीघ्र हरती है, वातल है, पित्तको भी करती है श्लीपदको और गुल्मको करती है और जुकाम आदिको कोपती है ॥६॥ इति वेरीनिवासि- बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मंडवर्गो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः १३. अथ यूषवर्ग। प्रथम कुलथीके यूषका लक्षण । कुलत्थयूषो मधुरः कषायो भवेच्च रक्तस्य कफस्य हन्ता ॥ महाश्मरीपायुजमेदहन्ता सन्दीपनो मेहविशोषणश्च ॥ १ ॥ कुलथीका यूष मधुर है, कसैला है, रक्तसहित कफको नाशता है और पथरी, बवासीर, मेद इनको नाशता है, अग्निको जगाता है और प्रमेहको शोषता है ॥ १ ॥ अथ हरडके यूषका गुण । भवेत्तुवर्या मधुरं च यूषं विशोषणं वातनिवारणं च ॥ श्लेष्मापहं पित्तहरं ज्वराणां पृथक्पृथग्हत्क्रिमिदारुणं च ॥२॥ अरहरका यूष मधुर है, शोषता है, वातको दूर करता है, कफको और पित्तको हरता है, समस्त ज्वरोंको शांत करता है, कृमिरोगको नाशता और दारुण अर्थात् गर्म है ॥ २ ॥ अथ मूँगके यूषका गुण । शीतलं मधुरं मौद्गयूषं पित्तविकारजित् ॥ तच्च वातहरं प्रोक्तं ज्वराणां शमनं परम् ॥३॥ मूँगका यूष शीतल है, मधुर है, पित्तके विकारको जीतता है, वातको हरता है और ज्वरोंको निश्चय शांत करता है ॥ ३ ॥ अथ चनाके यूषका गुण । कषायं कटुकं चोष्णं वातघ्नं कफदोषकृत् ॥ रक्तपित्तं निहन्त्याशु चणानां यूषमुच्यते ॥ ४ ॥ चनाका यूष कसैला है, चरचरा है, गरम है, वातको नाशता है, कफको करता है और रक्त- पित्तको निश्चय नाशता है ॥ ४ ॥ १ “आढकी तु तुवर्या स्त्री” इति मेदिनी ।
( ८० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ उडदके यूषका गुण । घनं सवातं कफकृन्माषयूषं च पित्तकृत् ॥ अम्लं पर्युषितं तच्च तैलपाके च शस्यते ॥ ५ ॥ उड़दका यूष भारी है, वातको और कफको करता है, पित्तको करता है, खट्टा है और बासी हुआ यह खट्टा यूष तेलपाकमें श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥ अथ अन्ययूषोंके गुण । अन्यानि च प्रशस्तानि कुलत्थान्युषितानि च ॥ मसूरास्त्रिपुटा बल्याः कलायाद्याश्च वर्जिताः ॥ ६ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे यूषवर्गो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ और बासी हुए कुलथी आदिके भी यूष अच्छे हैं और मसूरके यूष बलमें हित हैं और मटर आदिके यूष वर्जित हैं ॥ ६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादित- हारीतसंहिताभाषाटीकायां यूषवर्गो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ चतुर्दशोऽध्यायः १४. ———oOo——— अथ तेलवसावर्ग । अथातः संप्रवक्ष्यामि तैलानां च गुणागुणान् ॥ तच्च ज्ञेयं समासेन यथायोग्यं यथाविधि ॥ १ ॥ अब तेलोंके गुणदोषको कहता हूं, वह तेल विस्तारसे यथायोग्य और यथाविधि जानना ॥ १ ॥ अथ तिलोंके तेलका गुण । कषायानुरसं स्वादु सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ॥ पित्तकृद्वातशमनं श्लेष्मरोगादिवर्द्धनम् ॥ २ ॥ अहपं रुचिकरं मेध्यं कण्डूकुष्ठवि- कारनुत् ॥ वृष्यं श्रमापहं ज्ञेयं तिलतैलं विदुबुर्धाः ॥ ३ ॥ छिन्न भिन्ने च्युते घृष्टे भग्नाग्निदाहकेऽपि च ॥ वाताभिष्यन्दिस्रुटने चाभ्यङ्गे तिलतैलकम् ॥४॥ विषे व्यालशुनः सर्पभेकाभ्यङ्गा- वगाहने ॥ पाने बस्तौ बलाशे च तिलतैलं विधीयते ॥ ५ ॥ तिलतैलं विधेयं स्यात्सर्वरोगनिवारण ॥ ६ ॥
तिलोँका तेल कँसैला है, स्वादु है, सूक्ष्म है, गरम है, फैलनेवाला है, पित्तको करता है, वातको शांत करता है और कफरोग आदिको बढ़ाता है ॥ २ ॥ अल्परूपी यह तेल रुचिको करता है, पवित्र है, खाजको और कुष्ठको नाशता है, धातुको पुष्ट करता है, परिश्रमको नाशता है ऐसे तिलोंके तेलको बुद्धिमान् कहते भये ॥ ३ ॥ और छिन्न अर्थात् तलवार आदिसे कटे, भिन्न अर्थात् बरछी आदिसे कटे,गिरे, विसे अर्थात् पत्थर आदिकी रगड़से छिले, हाड़ आदिके टूटने, अग्निसे जलने, वाताभिष्यंद, कूटने और मालिश करनेमें तिलोंका तेल उत्तम है ॥४॥ भेडिय, और कुत्ताके विषमें, सर्प, विषैले मोंडक आदिके विषमें, मालिश, स्नान, पान और वस्तिकर्म्मा इनके द्वारा चिकित्सामें और कफके रोगमें तिलोंका तेल हित है ॥ ५ ॥ और सब रोगोंके दूर करनेके लिये तिलोंके तेलका विधान है ॥ ६ ॥ अथ सरसोंके तेलका गुण। कटु तिक्तं तथा ग्राहि उष्णं स्यात्कफवातनुत् ॥ कृमिकण्डूशो- धनं स्यात्पित्तकृत्सार्षपं श्रुतम् ॥ ७ ॥ कर्णरोगे कृमिरोगे तथा वातामयेषु च॥कण्डूकुष्ठामये चैव कफमेदोगणेषु च॥८॥ प्रशस्यं सार्षपं चैव रोगाणां च विभावयेत् ॥ बस्तिकर्मणि नो शस्तं पित्तदाहकरं महत् ॥ ९ ॥ सरसोंका तेल चरचरा है,कड़ुआ है,कब्जकों करता है,गरम है,कफको और वातको नाशता है, कीड़ोंको और खाजको शोधता है और पित्तको करता है ॥ ७ ॥ और कानरोग, कृमिरोग, वातके रोग, खाज, कुष्ठ, कफका रोग, मेंद ॥ ८ ॥ इनमें उत्तम है, वस्तिकर्ममें अच्छा नहीं है, पित्त और दाहको करता है ॥ ९ ॥ अथ अलसीके तेलका गुण । अतसीप्रभवं तैलं घनं मधुरपिच्छलम् ॥ विपाके चोष्णवीर्यं च वातश्लेष्मनिवारणम् ॥ १० ॥ अलसीका तेल भारी है, मधुर है, गाढ़ा है और पाककालमें गरम वीर्यवाला है, वातको और कफको दूर करता है ॥ १० ॥ अथ एरंडके तेलका गुण । एरण्डजं घनं चापि शीतमेव मृदु स्मृतम् ॥ हृद्बस्तिजङ्घाकट्यूरूशूलानाहविबन्धनुत् ॥ ११ ॥ एरंडका तेल गाढ़ा है, शीतल है, कोमल है और हृदय, बस्तिस्थान, जांघ, कटि,ऊरु, इनमें उत्पन्न शूल, अफारा, कोष्ठबद्धताको दूर करता है ॥ ११ ॥ ६
( ८२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ तैलविशेषता । आनाहाष्ठीलवातासृक्प्लीहोदावर्त्तशूलिनाम् ॥ हन्ति वातवि- काराणां विद्ध्याच्च प्रशान्तये ॥१२॥ यावन्तः स्थावराः स्नेहाः समासेन प्रकीर्त्तिताः॥ सर्वे तैले गुणा ज्ञेयाः सर्वे चानिलनाश- नाः ॥ १३॥ सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतैलं प्रशस्यते॥ १४ ॥ अफारा, अष्ठीला, वातरक्त, तिलीरोग उदावर्त, शूल, वातरोग, इनकी शांतिके लिये तेल है ॥ १२॥ जो स्थावरसंज्ञक स्नेह विस्तारसे कहे हैं वे सब तेलके समान गुणोंको करनेवाले हैं और वातको नाशते हैं ॥ १३ ॥ सब प्रकारके तेलोंसे तिलोंका तेल श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥ अथ लाल एरंडके तेलका गुण । तैलमेरण्डजं बल्यं गुरुष्णं मधुरं तथा ॥ तीक्ष्णोष्णं पिच्छलं विस्रं रक्तमेरण्डसम्भवम् ॥ १५ ॥ लाल एरंडका तेल बलको करता है, भारी है, गरम है, मधुर है, तीक्ष्ण और गरम है, कफको करता है, कच्चे गंधवाला है ॥ १५ ॥ अथ कुसुंभके तेलका गुण । कुसुम्भतैलमुष्णं तु विपाके कटुकं गुरु ॥ विदाहकं विशेषेण सर्वदोषप्रकोपनम् ॥ १६ ॥ कुसुंभका तेल गरम है, पाककालमें चर्रचरा है, भारी है, विशेषकरके दाहको करता है और सब दोषोंको कोपता है ॥ १६ ॥ कफोद्घातानि तैलानि यान्युक्तानि च कानिचित् ॥ गुणं कर्म च विज्ञाय कफवातानि निर्दिशेत् ॥ १७ ॥ कफको नाशनेवाले जो तेल कहे हैं उनके गुण और कर्मको जानकर कफ और वात रोगमें प्रयुक्त करने ॥ १७ ॥ अथ कुरंटाके तेलका गुण । सहकारतैलमीषत्तिक्तमतिसुगन्धि वातकफहरं सूक्ष्मम् ॥ मधुरं कषायमेवं नातिरक्ते पित्तकरञ्च ॥ १८ ॥ कुरंटाका तेल कछुक कडुआ है, अतिसुगंधित है, वातको और कफको हरता है, सूक्ष्म है, मधुर है, कसैला है, रक्तको अति नहीं उपजाता है और पित्तको करता है ॥ १८ ॥ १ सम्यग्विचार्य दृष्टं पद्येऽस्मिन्नास्ति वृत्तयोगो वै । विद्वद्भिः क्षन्तव्यं ह्यार्षश्वायं महर्षिभिः प्रोक्तः सहकारपुष्पस्य कुरंटकपुष्पेण साम्यमतो लक्षण्या सहकारस्यार्थः कुरण्टक इति ।
अ० १४ ] भाषाटीकासमेता । (८३) अथ तेलकी विशेषता । सौवर्चलेङ्गुदीपीलुशिंशपासारसम्भवम् ॥ सरलागुरुदेवादिपाद- पैः सम्भवं तु यत् ॥ १९ ॥ तुम्बुरुत्थं करञ्जोत्थं ज्योतिष्मत्युद्भवं तथा ॥ अर्शःकुष्ठकृमिश्लेष्मशुक्रमेदोऽनिलापहम् ॥ २० ॥ करञ्जारिष्टके तिक्ते नात्युष्णेन विनिर्दिशेत् ॥ २१ ॥ काला नमक, हिङ्घोट, पीलू, सीसमका सार इनका तेल और सरलवृक्ष, अगर, देवदार इनका तेल ॥ १९ ॥ धनियांका तेल, करंजुआका तेल, मालकांगनीका तेल ये बवासीर, कुष्ठ, कृमिरोग, कफ, वीर्य्य, मेद और वात इनको नाशते हैं ॥ २० ॥ करंजुआका तेल और नींवका तेल अतिगरम नहीं कहा है ॥ २१ ॥ अथ स्वच्छ तिवसका तेल, आच्छोडका तेल, नारियलका तेल तथा महुवाके तेलका गुण । कषायं मधुरं तिक्तं सारणं व्रणशोधनम् ॥ अच्छातिमुक्तकाच्छोडनालिकेरमधूकजम् ॥ २२ ॥ अतिशुद्ध तिवसका तेल, अच्छोडका तेल, नारियलका और महुवाका तेल कसैला है, मधुर है, कडुआ है, दोषोंको दूर करता है, घावको शोधता है ॥ २२ ॥ अथ काकड़ी, खीरा, कोहला, लहेंसवा, पीलू इनके तेलका गुण। त्रपुष्युर्वारूकूष्माण्डश्लेष्मातकपीलूद्भवम् ॥ वातपित्तहृदशोंघ्नं श्लेष्मलं गुरु शीतलम् ॥ २३ ॥ काकड़ी, खीरा, कुम्हड़ा, लहेसुवा, पीलू इनका तेल वात, पित्त और बवासीर इनको नाशता है, कफको करता है, भारी है, शीतल है ॥ २३ ॥ अथ सालपर्णी और टेशूके तेलका गुण । पित्तश्लेष्मप्रशमनं श्रीपर्णीकिंशुकोद्भवम् ॥ २४ ॥ सालपर्णी और टेशूका तेल पित्तको और कफको नाशता है ॥ २४ ॥ अथ वसावर्ग । वसा मज्जा च वातघ्नी बलपित्तकफप्रदा ॥ सौकरी माहिषी वसा वातला श्लेष्मवर्द्धनी ॥ २५ ॥ सर्पनकुलगौधेया व्रणकुष्ठघ्नी विलेपनादेव॥ मत्स्यशिशुमारमकरग्राहादीनां वसाप्येवम् ॥ सा-
( ८४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने विसर्पहरा हृद्या कुष्ठरोगविनाशिनी ॥ २६ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने तैलवसावर्गो नाम चतुर्दशोऽध्यायः १४॥ वसा, चरबी, मज्जा अर्थात् हड्डियोंका स्नेह वातको नाशता है और बल, पित्त और कफ इनको देता है, सूकरकी और भैंसकी वसा वातको करती है और कफको बढ़ाती है ॥ २५ ॥ सर्प, नोला, गोहकी वसा लेप करनेसे घावको और कुष्ठको नाशती है और मच्छ, शिशुमार, मकरमच्छ, ग्राह आदिकी भी वसा लेप करनेसे घावको और कुष्ठको नाशती है परंतु यह वसा विसर्परोगको हरती है, हृदयको हित है और कुष्ठको विशेषकरके हरती है ॥ २६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने तैलवसावर्गो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ पञ्चदशोऽध्यायः १५. अथ धान्यवर्ग । प्रथम शालिचावलका वर्णन । रक्तशालिर्महाशालिः कलमा षष्टिकापरा ॥ खञ्जरीटा पसाही च जीरकान्या कपिञ्जला ॥ १ ॥ सौगन्धी शूकला चान्या बि- लंवासी कचोरका॥ गरुडा रुक्मवन्ती च कलमान्या तथापरा॥ बिल्वजा मागधी पीता ता अष्टादश शालयः ॥ २ ॥ रक्तशाली, महाशालि, कलमा, साठी, खंजरीटा, पसही जीरका, कपिञ्जला ॥ १ ॥ सौगंधी शूकला, बिलबासी, कचेरका, गरुडा, रुक्मवंती, कलमा, बिल्वजा, मागधी, पीता; ऐसे अठारह प्रकारके शालिचावल कहे हैं ॥ २ ॥ अथ शालियोंके गुण दोष । रक्तशालिस्त्रिदोषघ्नी चक्षुष्या मूत्ररोगहा ॥ महाशालिर्गुरुर्वृष्या चक्षुष्या बलवर्द्धिनी ॥३॥ शीता गुरुस्त्रिदोषघ्नी मधुरापरषष्टिका ॥ ४ ॥ जीरका वातपित्तघ्नी कलमा श्लेष्मपित्तहा ॥ कपिञ्जला श्लेष्मला स्यान्मागधी कफवातला ॥५॥ बिल्वासी गुरुश्चापि पित्तघ्नी शुक्रवर्द्धिनी ॥ शूकला पित्तवातघ्नी कचोरा पित्तनाशिनी ॥६॥ गरुडान्या च वातघ्नी पित्तमूत्रगदापहा ॥ रुक्मवन्ती लघु
अ० १९] भाषाटीकासमेता । (८५) रुचिबलपुष्टिकरा मता॥७॥ कलमान्या लघुः पथ्या वातश्ले- ष्मविवर्द्धिनी ॥बिल्वजा मागधी पीता सामान्यास्ता गुणागुणैः ॥८॥ रुचिकृद्वलकृन्मूत्रदोषघ्नी च श्रमापहा ॥ दग्धग्रामाचले जाताः शालयो लघुपाकिनः ॥९॥ सुपथ्या बद्धविण्मूत्रा रूक्षाः श्लेष्मापकर्षिणः ॥ केदारप्रभवा वृक्षा वातपित्तविनाशिनः॥१०॥ रक्तपित्तविकारघ्ना वातलाः कफकारकाः॥देशे देशे विभिन्नानि नामानि परिलक्षयेत् ॥११॥ समान्गुणैश्च सर्वास्तान्भूमिभागो- द्भवान्विदुः॥१२॥शालयश्छिन्नरोहाश्च मूत्रला वातला हिमाः १३ रक्तशालिचावल त्रिदोषको नाशता है, नेत्रोंमें हित है, मूत्ररोगको नाशता है। महाशालि भारी है, धातुको पुष्ट करता है, नेत्रोंमें हित है, बलको बढ़ाता है ॥ ३ ॥ साठी शीतल है, भारी है, त्रिदोषको हरता है और मधुर है॥४॥जीरका वातको और पित्तको हरता है। कुलमा कफको और पित्तको नाशता है । कंपिंजला कफको करता है। मागधी कफको और वातको करता है ॥५॥ बिलवासी भारी है, पित्तको नाशता है, वीर्यको बढ़ाता है। शूकला पित्तको और बातको नाशता है। कंचोरा पित्तको नाशता है॥६॥ गरुडा वातको नाशता है,पित्तको और मूत्ररोगको हरता है। रुक्मवंती हलकी है और रुचि, बल,पुष्टि इनको करता है ॥७॥ अन्यप्रकारका कलमा हलका है, पथ्य है, वातको और कफको बढ़ाता है और बिल्वजा, मागधी, पीता ये तीनों गुण और दोषों करके समान हैं ॥८॥ खंजरीटा शालि रुचिको और बलको करता है, मूत्रदोषको नाशता है और परिश्रमको हरता है। दग्ध ग्राममें और पर्वतमें उपजे शालिचावल हलके पाकवाले हैं ॥९॥ खेतमें उपजे शालि चावल सुन्दर पथ्य हैं, विष्ठाको और मूत्रको बांधते हैं, रूखे हैं, कफको नाशते हैं, वातको और पित्तको नाशते हैं॥१०॥कोई शालि रक्तपित्तके विकारको नाशते हैं, वातल हैं और कफको करते हैं। इन शालियोंके नाम देशदेशमें भिन्न जानने ॥११॥ पृथिवीके भागोंसे उपजे सब प्रकारके शालि गुणोंसे समान जानने ॥ १२ ॥ रोया शालि मूत्रको उपजाते हैं, वातको उपजाते और शीतल हैं ॥ १३ ॥ अथ क्षुद्रधान्यवर्ग । श्यामाकः कोद्रवः कण्डूर्मर्कटी कपिकच्छुरा ॥ क्षुद्रधान्यमिदं प्रोक्तं शृणु पुत्र प्रवक्ष्यते ॥ १४ ॥ श्यामाक, कोदू, कंडू,मर्कटी अर्थात् मकडा, कपिकच्छुरा इन नामोंसे क्षुद्रधान्य कहा है,अब मैं कहता हूँ हे पुत्र ! सुन ॥ १४ ॥