हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ तैलविशेषता । आनाहाष्ठीलवातासृक्प्लीहोदावर्त्तशूलिनाम् ॥ हन्ति वातवि- काराणां विद्ध्याच्च प्रशान्तये ॥१२॥ यावन्तः स्थावराः स्नेहाः समासेन प्रकीर्त्तिताः॥ सर्वे तैले गुणा ज्ञेयाः सर्वे चानिलनाश- नाः ॥ १३॥ सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतैलं प्रशस्यते॥ १४ ॥ अफारा, अष्ठीला, वातरक्त, तिलीरोग उदावर्त, शूल, वातरोग, इनकी शांतिके लिये तेल है ॥ १२॥ जो स्थावरसंज्ञक स्नेह विस्तारसे कहे हैं वे सब तेलके समान गुणोंको करनेवाले हैं और वातको नाशते हैं ॥ १३ ॥ सब प्रकारके तेलोंसे तिलोंका तेल श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥ अथ लाल एरंडके तेलका गुण । तैलमेरण्डजं बल्यं गुरुष्णं मधुरं तथा ॥ तीक्ष्णोष्णं पिच्छलं विस्रं रक्तमेरण्डसम्भवम् ॥ १५ ॥ लाल एरंडका तेल बलको करता है, भारी है, गरम है, मधुर है, तीक्ष्ण और गरम है, कफको करता है, कच्चे गंधवाला है ॥ १५ ॥ अथ कुसुंभके तेलका गुण । कुसुम्भतैलमुष्णं तु विपाके कटुकं गुरु ॥ विदाहकं विशेषेण सर्वदोषप्रकोपनम् ॥ १६ ॥ कुसुंभका तेल गरम है, पाककालमें चर्रचरा है, भारी है, विशेषकरके दाहको करता है और सब दोषोंको कोपता है ॥ १६ ॥ कफोद्घातानि तैलानि यान्युक्तानि च कानिचित् ॥ गुणं कर्म च विज्ञाय कफवातानि निर्दिशेत् ॥ १७ ॥ कफको नाशनेवाले जो तेल कहे हैं उनके गुण और कर्मको जानकर कफ और वात रोगमें प्रयुक्त करने ॥ १७ ॥ अथ कुरंटाके तेलका गुण । सहकारतैलमीषत्तिक्तमतिसुगन्धि वातकफहरं सूक्ष्मम् ॥ मधुरं कषायमेवं नातिरक्ते पित्तकरञ्च ॥ १८ ॥ कुरंटाका तेल कछुक कडुआ है, अतिसुगंधित है, वातको और कफको हरता है, सूक्ष्म है, मधुर है, कसैला है, रक्तको अति नहीं उपजाता है और पित्तको करता है ॥ १८ ॥ १ सम्यग्विचार्य दृष्टं पद्येऽस्मिन्नास्ति वृत्तयोगो वै । विद्वद्भिः क्षन्तव्यं ह्यार्षश्वायं महर्षिभिः प्रोक्तः सहकारपुष्पस्य कुरंटकपुष्पेण साम्यमतो लक्षण्या सहकारस्यार्थः कुरण्टक इति ।