भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 548 में से

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पृष्ठ 113

तिलोँका तेल कँसैला है, स्वादु है, सूक्ष्म है, गरम है, फैलनेवाला है, पित्तको करता है, वातको शांत करता है और कफरोग आदिको बढ़ाता है ॥ २ ॥ अल्परूपी यह तेल रुचिको करता है, पवित्र है, खाजको और कुष्ठको नाशता है, धातुको पुष्ट करता है, परिश्रमको नाशता है ऐसे तिलोंके तेलको बुद्धिमान् कहते भये ॥ ३ ॥ और छिन्न अर्थात् तलवार आदिसे कटे, भिन्न अर्थात् बरछी आदिसे कटे,गिरे, विसे अर्थात् पत्थर आदिकी रगड़से छिले, हाड़ आदिके टूटने, अग्निसे जलने, वाताभिष्यंद, कूटने और मालिश करनेमें तिलोंका तेल उत्तम है ॥४॥ भेडिय, और कुत्ताके विषमें, सर्प, विषैले मोंडक आदिके विषमें, मालिश, स्नान, पान और वस्तिकर्म्मा इनके द्वारा चिकित्सामें और कफके रोगमें तिलोंका तेल हित है ॥ ५ ॥ और सब रोगोंके दूर करनेके लिये तिलोंके तेलका विधान है ॥ ६ ॥ अथ सरसोंके तेलका गुण। कटु तिक्तं तथा ग्राहि उष्णं स्यात्कफवातनुत् ॥ कृमिकण्डूशो- धनं स्यात्पित्तकृत्सार्षपं श्रुतम् ॥ ७ ॥ कर्णरोगे कृमिरोगे तथा वातामयेषु च॥कण्डूकुष्ठामये चैव कफमेदोगणेषु च॥८॥ प्रशस्यं सार्षपं चैव रोगाणां च विभावयेत् ॥ बस्तिकर्मणि नो शस्तं पित्तदाहकरं महत् ॥ ९ ॥ सरसोंका तेल चरचरा है,कड़ुआ है,कब्जकों करता है,गरम है,कफको और वातको नाशता है, कीड़ोंको और खाजको शोधता है और पित्तको करता है ॥ ७ ॥ और कानरोग, कृमिरोग, वातके रोग, खाज, कुष्ठ, कफका रोग, मेंद ॥ ८ ॥ इनमें उत्तम है, वस्तिकर्ममें अच्छा नहीं है, पित्त और दाहको करता है ॥ ९ ॥ अथ अलसीके तेलका गुण । अतसीप्रभवं तैलं घनं मधुरपिच्छलम् ॥ विपाके चोष्णवीर्यं च वातश्लेष्मनिवारणम् ॥ १० ॥ अलसीका तेल भारी है, मधुर है, गाढ़ा है और पाककालमें गरम वीर्यवाला है, वातको और कफको दूर करता है ॥ १० ॥ अथ एरंडके तेलका गुण । एरण्डजं घनं चापि शीतमेव मृदु स्मृतम् ॥ हृद्बस्तिजङ्घाकट्यूरूशूलानाहविबन्धनुत् ॥ ११ ॥ एरंडका तेल गाढ़ा है, शीतल है, कोमल है और हृदय, बस्तिस्थान, जांघ, कटि,ऊरु, इनमें उत्पन्न शूल, अफारा, कोष्ठबद्धताको दूर करता है ॥ ११ ॥ ६

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