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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

२. द्वितीय स्थान: निदान स्थान (त्रिदोष, ज्वर, पाण्डु, कामला)

अ० १३ ] भाषाटीकासमेता । (७९) क्षुद्र अन्नकी कांजी ग्लानिको और मूर्च्छाको शीघ्र हरती है, वातल है, पित्तको भी करती है श्लीपदको और गुल्मको करती है और जुकाम आदिको कोपती है ॥६॥ इति वेरीनिवासि- बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मंडवर्गो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः १३. अथ यूषवर्ग। प्रथम कुलथीके यूषका लक्षण । कुलत्थयूषो मधुरः कषायो भवेच्च रक्तस्य कफस्य हन्ता ॥ महाश्मरीपायुजमेदहन्ता सन्दीपनो मेहविशोषणश्च ॥ १ ॥ कुलथीका यूष मधुर है, कसैला है, रक्तसहित कफको नाशता है और पथरी, बवासीर, मेद इनको नाशता है, अग्निको जगाता है और प्रमेहको शोषता है ॥ १ ॥ अथ हरडके यूषका गुण । भवेत्तुवर्या मधुरं च यूषं विशोषणं वातनिवारणं च ॥ श्लेष्मापहं पित्तहरं ज्वराणां पृथक्पृथग्हत्क्रिमिदारुणं च ॥२॥ अरहरका यूष मधुर है, शोषता है, वातको दूर करता है, कफको और पित्तको हरता है, समस्त ज्वरोंको शांत करता है, कृमिरोगको नाशता और दारुण अर्थात् गर्म है ॥ २ ॥ अथ मूँगके यूषका गुण । शीतलं मधुरं मौद्गयूषं पित्तविकारजित् ॥ तच्च वातहरं प्रोक्तं ज्वराणां शमनं परम् ॥३॥ मूँगका यूष शीतल है, मधुर है, पित्तके विकारको जीतता है, वातको हरता है और ज्वरोंको निश्चय शांत करता है ॥ ३ ॥ अथ चनाके यूषका गुण । कषायं कटुकं चोष्णं वातघ्नं कफदोषकृत् ॥ रक्तपित्तं निहन्त्याशु चणानां यूषमुच्यते ॥ ४ ॥ चनाका यूष कसैला है, चरचरा है, गरम है, वातको नाशता है, कफको करता है और रक्त- पित्तको निश्चय नाशता है ॥ ४ ॥ १ “आढकी तु तुवर्या स्त्री” इति मेदिनी ।

( ८० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ उडदके यूषका गुण । घनं सवातं कफकृन्माषयूषं च पित्तकृत् ॥ अम्लं पर्युषितं तच्च तैलपाके च शस्यते ॥ ५ ॥ उड़दका यूष भारी है, वातको और कफको करता है, पित्तको करता है, खट्टा है और बासी हुआ यह खट्टा यूष तेलपाकमें श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥ अथ अन्ययूषोंके गुण । अन्यानि च प्रशस्तानि कुलत्थान्युषितानि च ॥ मसूरास्त्रिपुटा बल्याः कलायाद्याश्च वर्जिताः ॥ ६ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे यूषवर्गो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ और बासी हुए कुलथी आदिके भी यूष अच्छे हैं और मसूरके यूष बलमें हित हैं और मटर आदिके यूष वर्जित हैं ॥ ६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादित- हारीतसंहिताभाषाटीकायां यूषवर्गो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ चतुर्दशोऽध्यायः १४. ———oOo——— अथ तेलवसावर्ग । अथातः संप्रवक्ष्यामि तैलानां च गुणागुणान् ॥ तच्च ज्ञेयं समासेन यथायोग्यं यथाविधि ॥ १ ॥ अब तेलोंके गुणदोषको कहता हूं, वह तेल विस्तारसे यथायोग्य और यथाविधि जानना ॥ १ ॥ अथ तिलोंके तेलका गुण । कषायानुरसं स्वादु सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ॥ पित्तकृद्वातशमनं श्लेष्मरोगादिवर्द्धनम् ॥ २ ॥ अहपं रुचिकरं मेध्यं कण्डूकुष्ठवि- कारनुत् ॥ वृष्यं श्रमापहं ज्ञेयं तिलतैलं विदुबुर्धाः ॥ ३ ॥ छिन्न भिन्ने च्युते घृष्टे भग्नाग्निदाहकेऽपि च ॥ वाताभिष्यन्दिस्रुटने चाभ्यङ्गे तिलतैलकम् ॥४॥ विषे व्यालशुनः सर्पभेकाभ्यङ्गा- वगाहने ॥ पाने बस्तौ बलाशे च तिलतैलं विधीयते ॥ ५ ॥ तिलतैलं विधेयं स्यात्सर्वरोगनिवारण ॥ ६ ॥

तिलोँका तेल कँसैला है, स्वादु है, सूक्ष्म है, गरम है, फैलनेवाला है, पित्तको करता है, वातको शांत करता है और कफरोग आदिको बढ़ाता है ॥ २ ॥ अल्परूपी यह तेल रुचिको करता है, पवित्र है, खाजको और कुष्ठको नाशता है, धातुको पुष्ट करता है, परिश्रमको नाशता है ऐसे तिलोंके तेलको बुद्धिमान् कहते भये ॥ ३ ॥ और छिन्न अर्थात् तलवार आदिसे कटे, भिन्न अर्थात् बरछी आदिसे कटे,गिरे, विसे अर्थात् पत्थर आदिकी रगड़से छिले, हाड़ आदिके टूटने, अग्निसे जलने, वाताभिष्यंद, कूटने और मालिश करनेमें तिलोंका तेल उत्तम है ॥४॥ भेडिय, और कुत्ताके विषमें, सर्प, विषैले मोंडक आदिके विषमें, मालिश, स्नान, पान और वस्तिकर्म्मा इनके द्वारा चिकित्सामें और कफके रोगमें तिलोंका तेल हित है ॥ ५ ॥ और सब रोगोंके दूर करनेके लिये तिलोंके तेलका विधान है ॥ ६ ॥ अथ सरसोंके तेलका गुण। कटु तिक्तं तथा ग्राहि उष्णं स्यात्कफवातनुत् ॥ कृमिकण्डूशो- धनं स्यात्पित्तकृत्सार्षपं श्रुतम् ॥ ७ ॥ कर्णरोगे कृमिरोगे तथा वातामयेषु च॥कण्डूकुष्ठामये चैव कफमेदोगणेषु च॥८॥ प्रशस्यं सार्षपं चैव रोगाणां च विभावयेत् ॥ बस्तिकर्मणि नो शस्तं पित्तदाहकरं महत् ॥ ९ ॥ सरसोंका तेल चरचरा है,कड़ुआ है,कब्जकों करता है,गरम है,कफको और वातको नाशता है, कीड़ोंको और खाजको शोधता है और पित्तको करता है ॥ ७ ॥ और कानरोग, कृमिरोग, वातके रोग, खाज, कुष्ठ, कफका रोग, मेंद ॥ ८ ॥ इनमें उत्तम है, वस्तिकर्ममें अच्छा नहीं है, पित्त और दाहको करता है ॥ ९ ॥ अथ अलसीके तेलका गुण । अतसीप्रभवं तैलं घनं मधुरपिच्छलम् ॥ विपाके चोष्णवीर्यं च वातश्लेष्मनिवारणम् ॥ १० ॥ अलसीका तेल भारी है, मधुर है, गाढ़ा है और पाककालमें गरम वीर्यवाला है, वातको और कफको दूर करता है ॥ १० ॥ अथ एरंडके तेलका गुण । एरण्डजं घनं चापि शीतमेव मृदु स्मृतम् ॥ हृद्बस्तिजङ्घाकट्यूरूशूलानाहविबन्धनुत् ॥ ११ ॥ एरंडका तेल गाढ़ा है, शीतल है, कोमल है और हृदय, बस्तिस्थान, जांघ, कटि,ऊरु, इनमें उत्पन्न शूल, अफारा, कोष्ठबद्धताको दूर करता है ॥ ११ ॥ ६

( ८२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ तैलविशेषता । आनाहाष्ठीलवातासृक्प्लीहोदावर्त्तशूलिनाम् ॥ हन्ति वातवि- काराणां विद्ध्याच्च प्रशान्तये ॥१२॥ यावन्तः स्थावराः स्नेहाः समासेन प्रकीर्त्तिताः॥ सर्वे तैले गुणा ज्ञेयाः सर्वे चानिलनाश- नाः ॥ १३॥ सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतैलं प्रशस्यते॥ १४ ॥ अफारा, अष्ठीला, वातरक्त, तिलीरोग उदावर्त, शूल, वातरोग, इनकी शांतिके लिये तेल है ॥ १२॥ जो स्थावरसंज्ञक स्नेह विस्तारसे कहे हैं वे सब तेलके समान गुणोंको करनेवाले हैं और वातको नाशते हैं ॥ १३ ॥ सब प्रकारके तेलोंसे तिलोंका तेल श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥ अथ लाल एरंडके तेलका गुण । तैलमेरण्डजं बल्यं गुरुष्णं मधुरं तथा ॥ तीक्ष्णोष्णं पिच्छलं विस्रं रक्तमेरण्डसम्भवम् ॥ १५ ॥ लाल एरंडका तेल बलको करता है, भारी है, गरम है, मधुर है, तीक्ष्ण और गरम है, कफको करता है, कच्चे गंधवाला है ॥ १५ ॥ अथ कुसुंभके तेलका गुण । कुसुम्भतैलमुष्णं तु विपाके कटुकं गुरु ॥ विदाहकं विशेषेण सर्वदोषप्रकोपनम् ॥ १६ ॥ कुसुंभका तेल गरम है, पाककालमें चर्रचरा है, भारी है, विशेषकरके दाहको करता है और सब दोषोंको कोपता है ॥ १६ ॥ कफोद्घातानि तैलानि यान्युक्तानि च कानिचित् ॥ गुणं कर्म च विज्ञाय कफवातानि निर्दिशेत् ॥ १७ ॥ कफको नाशनेवाले जो तेल कहे हैं उनके गुण और कर्मको जानकर कफ और वात रोगमें प्रयुक्त करने ॥ १७ ॥ अथ कुरंटाके तेलका गुण । सहकारतैलमीषत्तिक्तमतिसुगन्धि वातकफहरं सूक्ष्मम् ॥ मधुरं कषायमेवं नातिरक्ते पित्तकरञ्च ॥ १८ ॥ कुरंटाका तेल कछुक कडुआ है, अतिसुगंधित है, वातको और कफको हरता है, सूक्ष्म है, मधुर है, कसैला है, रक्तको अति नहीं उपजाता है और पित्तको करता है ॥ १८ ॥ १ सम्यग्विचार्य दृष्टं पद्येऽस्मिन्नास्ति वृत्तयोगो वै । विद्वद्भिः क्षन्तव्यं ह्यार्षश्वायं महर्षिभिः प्रोक्तः सहकारपुष्पस्य कुरंटकपुष्पेण साम्यमतो लक्षण्या सहकारस्यार्थः कुरण्टक इति ।

अ० १४ ] भाषाटीकासमेता । (८३) अथ तेलकी विशेषता । सौवर्चलेङ्गुदीपीलुशिंशपासारसम्भवम् ॥ सरलागुरुदेवादिपाद- पैः सम्भवं तु यत् ॥ १९ ॥ तुम्बुरुत्थं करञ्जोत्थं ज्योतिष्मत्युद्भवं तथा ॥ अर्शःकुष्ठकृमिश्लेष्मशुक्रमेदोऽनिलापहम् ॥ २० ॥ करञ्जारिष्टके तिक्ते नात्युष्णेन विनिर्दिशेत् ॥ २१ ॥ काला नमक, हिङ्घोट, पीलू, सीसमका सार इनका तेल और सरलवृक्ष, अगर, देवदार इनका तेल ॥ १९ ॥ धनियांका तेल, करंजुआका तेल, मालकांगनीका तेल ये बवासीर, कुष्ठ, कृमिरोग, कफ, वीर्य्य, मेद और वात इनको नाशते हैं ॥ २० ॥ करंजुआका तेल और नींवका तेल अतिगरम नहीं कहा है ॥ २१ ॥ अथ स्वच्छ तिवसका तेल, आच्छोडका तेल, नारियलका तेल तथा महुवाके तेलका गुण । कषायं मधुरं तिक्तं सारणं व्रणशोधनम् ॥ अच्छातिमुक्तकाच्छोडनालिकेरमधूकजम् ॥ २२ ॥ अतिशुद्ध तिवसका तेल, अच्छोडका तेल, नारियलका और महुवाका तेल कसैला है, मधुर है, कडुआ है, दोषोंको दूर करता है, घावको शोधता है ॥ २२ ॥ अथ काकड़ी, खीरा, कोहला, लहेंसवा, पीलू इनके तेलका गुण। त्रपुष्युर्वारूकूष्माण्डश्लेष्मातकपीलूद्भवम् ॥ वातपित्तहृदशोंघ्नं श्लेष्मलं गुरु शीतलम् ॥ २३ ॥ काकड़ी, खीरा, कुम्हड़ा, लहेसुवा, पीलू इनका तेल वात, पित्त और बवासीर इनको नाशता है, कफको करता है, भारी है, शीतल है ॥ २३ ॥ अथ सालपर्णी और टेशूके तेलका गुण । पित्तश्लेष्मप्रशमनं श्रीपर्णीकिंशुकोद्भवम् ॥ २४ ॥ सालपर्णी और टेशूका तेल पित्तको और कफको नाशता है ॥ २४ ॥ अथ वसावर्ग । वसा मज्जा च वातघ्नी बलपित्तकफप्रदा ॥ सौकरी माहिषी वसा वातला श्लेष्मवर्द्धनी ॥ २५ ॥ सर्पनकुलगौधेया व्रणकुष्ठघ्नी विलेपनादेव॥ मत्स्यशिशुमारमकरग्राहादीनां वसाप्येवम् ॥ सा-

( ८४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने विसर्पहरा हृद्या कुष्ठरोगविनाशिनी ॥ २६ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने तैलवसावर्गो नाम चतुर्दशोऽध्यायः १४॥ वसा, चरबी, मज्जा अर्थात् हड्डियोंका स्नेह वातको नाशता है और बल, पित्त और कफ इनको देता है, सूकरकी और भैंसकी वसा वातको करती है और कफको बढ़ाती है ॥ २५ ॥ सर्प, नोला, गोहकी वसा लेप करनेसे घावको और कुष्ठको नाशती है और मच्छ, शिशुमार, मकरमच्छ, ग्राह आदिकी भी वसा लेप करनेसे घावको और कुष्ठको नाशती है परंतु यह वसा विसर्परोगको हरती है, हृदयको हित है और कुष्ठको विशेषकरके हरती है ॥ २६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने तैलवसावर्गो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ पञ्चदशोऽध्यायः १५. अथ धान्यवर्ग । प्रथम शालिचावलका वर्णन । रक्तशालिर्महाशालिः कलमा षष्टिकापरा ॥ खञ्जरीटा पसाही च जीरकान्या कपिञ्जला ॥ १ ॥ सौगन्धी शूकला चान्या बि- लंवासी कचोरका॥ गरुडा रुक्मवन्ती च कलमान्या तथापरा॥ बिल्वजा मागधी पीता ता अष्टादश शालयः ॥ २ ॥ रक्तशाली, महाशालि, कलमा, साठी, खंजरीटा, पसही जीरका, कपिञ्जला ॥ १ ॥ सौगंधी शूकला, बिलबासी, कचेरका, गरुडा, रुक्मवंती, कलमा, बिल्वजा, मागधी, पीता; ऐसे अठारह प्रकारके शालिचावल कहे हैं ॥ २ ॥ अथ शालियोंके गुण दोष । रक्तशालिस्त्रिदोषघ्नी चक्षुष्या मूत्ररोगहा ॥ महाशालिर्गुरुर्वृष्या चक्षुष्या बलवर्द्धिनी ॥३॥ शीता गुरुस्त्रिदोषघ्नी मधुरापरषष्टिका ॥ ४ ॥ जीरका वातपित्तघ्नी कलमा श्लेष्मपित्तहा ॥ कपिञ्जला श्लेष्मला स्यान्मागधी कफवातला ॥५॥ बिल्वासी गुरुश्चापि पित्तघ्नी शुक्रवर्द्धिनी ॥ शूकला पित्तवातघ्नी कचोरा पित्तनाशिनी ॥६॥ गरुडान्या च वातघ्नी पित्तमूत्रगदापहा ॥ रुक्मवन्ती लघु

अ० १९] भाषाटीकासमेता । (८५) रुचिबलपुष्टिकरा मता॥७॥ कलमान्या लघुः पथ्या वातश्ले- ष्मविवर्द्धिनी ॥बिल्वजा मागधी पीता सामान्यास्ता गुणागुणैः ॥८॥ रुचिकृद्वलकृन्मूत्रदोषघ्नी च श्रमापहा ॥ दग्धग्रामाचले जाताः शालयो लघुपाकिनः ॥९॥ सुपथ्या बद्धविण्मूत्रा रूक्षाः श्लेष्मापकर्षिणः ॥ केदारप्रभवा वृक्षा वातपित्तविनाशिनः॥१०॥ रक्तपित्तविकारघ्ना वातलाः कफकारकाः॥देशे देशे विभिन्नानि नामानि परिलक्षयेत् ॥११॥ समान्गुणैश्च सर्वास्तान्भूमिभागो- द्भवान्विदुः॥१२॥शालयश्छिन्नरोहाश्च मूत्रला वातला हिमाः १३ रक्तशालिचावल त्रिदोषको नाशता है, नेत्रोंमें हित है, मूत्ररोगको नाशता है। महाशालि भारी है, धातुको पुष्ट करता है, नेत्रोंमें हित है, बलको बढ़ाता है ॥ ३ ॥ साठी शीतल है, भारी है, त्रिदोषको हरता है और मधुर है॥४॥जीरका वातको और पित्तको हरता है। कुलमा कफको और पित्तको नाशता है । कंपिंजला कफको करता है। मागधी कफको और वातको करता है ॥५॥ बिलवासी भारी है, पित्तको नाशता है, वीर्यको बढ़ाता है। शूकला पित्तको और बातको नाशता है। कंचोरा पित्तको नाशता है॥६॥ गरुडा वातको नाशता है,पित्तको और मूत्ररोगको हरता है। रुक्मवंती हलकी है और रुचि, बल,पुष्टि इनको करता है ॥७॥ अन्यप्रकारका कलमा हलका है, पथ्य है, वातको और कफको बढ़ाता है और बिल्वजा, मागधी, पीता ये तीनों गुण और दोषों करके समान हैं ॥८॥ खंजरीटा शालि रुचिको और बलको करता है, मूत्रदोषको नाशता है और परिश्रमको हरता है। दग्ध ग्राममें और पर्वतमें उपजे शालिचावल हलके पाकवाले हैं ॥९॥ खेतमें उपजे शालि चावल सुन्दर पथ्य हैं, विष्ठाको और मूत्रको बांधते हैं, रूखे हैं, कफको नाशते हैं, वातको और पित्तको नाशते हैं॥१०॥कोई शालि रक्तपित्तके विकारको नाशते हैं, वातल हैं और कफको करते हैं। इन शालियोंके नाम देशदेशमें भिन्न जानने ॥११॥ पृथिवीके भागोंसे उपजे सब प्रकारके शालि गुणोंसे समान जानने ॥ १२ ॥ रोया शालि मूत्रको उपजाते हैं, वातको उपजाते और शीतल हैं ॥ १३ ॥ अथ क्षुद्रधान्यवर्ग । श्यामाकः कोद्रवः कण्डूर्मर्कटी कपिकच्छुरा ॥ क्षुद्रधान्यमिदं प्रोक्तं शृणु पुत्र प्रवक्ष्यते ॥ १४ ॥ श्यामाक, कोदू, कंडू,मर्कटी अर्थात् मकडा, कपिकच्छुरा इन नामोंसे क्षुद्रधान्य कहा है,अब मैं कहता हूँ हे पुत्र ! सुन ॥ १४ ॥

( ८६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ श्यामक और कोदूके गुण दोष । श्यामाकः शोषणो रूक्षो वातलः कफवारणः॥ कोद्रवो रूक्षो ग्राही स्याद्रक्तपित्तविशोषणः ॥ १५ ॥ नाधिककफकृत् प्रोक्तो रुच्यः स्वादुः प्रकीर्तितः ॥ १६ ॥ श्यामक शोषनेवाला है, रूखा है,वातल है, कफको दूर करता है। कोदूं रूखा है, कब्जको करता है और रक्तपित्तको शोषता है ॥ १५ ॥ और कफकी अधिकताको नहीं करता है, रुचिमें हित है और स्वादु है ॥ १६ ॥ अथ विदलान्नका गुण । विदलान्नानि वक्ष्यामि शृणु पुत्र यथाक्रमम् ॥ यवगोधूमचण- का माषो मुद्गाढकी तथा ॥१७॥ मकुष्ठकः कुलत्थश्च मसूर- स्त्रिपुटस्तथा ॥ निष्पावकः कलायश्च विदलान्नं प्रकीर्त्तितम् १८ हे पुत्र ! विदल संज्ञक अन्नोंको कहता हूँ सुन । जव, गेहूं, चना, उड़द, मूग, तूरीअन्न॥ १७॥ मोठ, कुलथी, मसूर, चौला, रेवसारी, मटर इनको विदल अन्न कहते हैं ॥ १८ ॥ अथ जवोंका गुण । रूक्षः शीतो गुरुः स्वादुः कषायो मधुरो यवः ॥ वृष्यो ग्राही कफघ्नश्च स्यात्पित्तश्वासकासनुत् ॥ १९ ॥ जव रूखा है, शीतल है, भारी है, स्वादु है, कसैला है, मधुर है, वीर्यमें हित है कब्जको करता है कफको नाशता है, पित्त, श्वास और खाँसीको हरता है ॥ १९ ॥ अथ गेहूंका गुण । मधुरो गुरुविष्टम्भी वृष्यो बल्योऽथ बृंहणः ॥ ईषत्कषायो मधुरो गोधूमः स्यात्रिदोषहा ॥ २० ॥ गेहूँ मधुर है, भारी है, विष्टंभी है, वीर्यमें हित है, बलको करता है, धातुओंको बढ़ाता है, कुछ कसैला, मधुर है और त्रिदोषको नाशता है ॥ २० ॥ अथ तिलोंका गुण । तिलो विपाके मधुरो बलिष्ठः स्निग्धो व्रणालेपनपथ्य उक्तः ॥ बल्योऽग्निमेधाजननो वरेण्यो मूत्रस्य दोषापहरो गुरुश्च॥२१॥ तिलेषु सर्वेष्वसितः प्रधानो मध्यः सितो हीनतरास्तथान्ये २२॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ८७ ) तिल पाककालमें मधुर है, अतिबलवाला है, चिकना है, घावपे लेप करनेमें पथ्य है, बलमें हित है, अग्निको और बुद्धिको देता है, सुंदर है, मूत्रके दोषको हरता है और भारी है॥२१॥ सब प्रकारके तिलोंमें काला तिल प्रधान है और सफेद तिल मध्यम है और अन्य प्रकारके तिल- हीन गुणवाले हैं ॥ २२ ॥ अथ चनाका गुण । रक्ते कफे पीनसके तु कण्ठे गलामये वातरुजे सपित्ते ॥शीतः प्रतिश्यायकृमीन्निहन्ति शुष्कस्तथार्द्रश्चणकः प्रशस्तः ॥ २३॥ रक्त, कफ, पीनस, कंठरोग, गलरोग, वातरोग और पित्त इनमें चना हित है, शीतल है, सखरमा और कीडोंको नाशता है, सूखे और गीले चने अच्छे कहे हैं ॥ २३ ॥ अथ उड़दका गुण । स्निग्धोऽथ वृष्यो मधुरश्च बल्यो मरुत्कफानां परिबृंहणश्च ॥ पाकेऽम्लकोष्णो विदितो हिमश्च माषोऽथ हृद्यः कथितो नरैश्च २४ उड़द चिकना है, वीर्यमें हित है, मधुर है, बलमें हित है, वायुको और कफको बढ़ाता है, पाककालमें खट्टा है, कुछ गरम है, शीतल और सुंदर है ॥ २४ ॥ अथ मूंगका गुण । शीतः कषायो मधुरो लघुः स्यात्पित्तास्रदोषस्य हरः सरश्च॥ विपाकतोऽसौ कटुकप्रधानो मुद्गस्तथान्यः कथितोऽभिरम्यः२५ मूँग शीतल है,मधुर है,हलका है,पित्त और रक्तके दोषको हरता है,सर है, पाककालमें चरचरा है और रमणीक है ॥ २५ ॥ अथ तुवरका गुण । मृदुः कषाया च सरक्तपित्तं वातं कफं हन्ति मुखव्रणञ्च ॥ गुल्मज्वरारोचककासछर्दिहृद्रोगदुर्नामहराढकी स्यात् ॥२६॥ तुवर अर्थात् अरहर कसैला है,कोमल है और रक्तपित्त,वात,कफ,मुखका घाव,गुल्म, ज्वर, अरोचक, खाँसी, छर्दि, हृद्रोग और बवासीर इनको हरती है ॥ २६ ॥ अथ मोठके गुण । स रक्तपित्तंकफवातहन्ता चोष्णः कषायो मधुरः प्रदिष्टः ॥ ग्राही सुशीतो गुदकीलगुल्मं मकुष्ठकः सर्वगदान्निहन्ति ॥२७॥ मोठ रक्तपित्त, कफ,और वात इनको नाशती है,गरम है,कसैला है,मधुर है, कब्जको करती है, शीतल है और बवासीर, गुल्म और सब रोगोंको हरती है ॥ २७ ॥

( ८८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ कुलथीका गुण । उष्णो जयेन्मारुतपीनसं तु कासप्रतिश्यायविबन्धगुल्मान् ॥ हिक्कां सरक्तं तु बलाशपित्तं निहन्ति मेदश्च कुलत्थकोऽयम्॥२८॥ कुलथी गर्म है, वात, पीनस, खांसी, खेहर, बंधा, गुल्म, हिचकी इनको नाशती है और लाल कुलथी कफ, पित्त, मेद इनको हरती है ॥ २८ ॥ अथ चौलाका गुण । रूक्षो विशोषी मधुरः प्रदिष्टः स्नायुं करोत्यस्थिगतं बलिष्ठम् ॥ विबन्धशूलभ्रमशोफकर्ता दाहार्शहृद्रोगविकारकारी ॥२९॥ चौला रूखा है, विशेष करके शोषता है, मधुर है, हड्डीके नसको बलवाला बनाता है और शूल, बँधा, भ्रम और शोजा इनको करता है और दाह,हृद्रोग, बवासीर इनको करता है॥२९॥ अथ मटरका गुण । किञ्चित्कषाया मधुराः प्रदिष्टा रक्तप्रशान्तिं जनयन्ति बल्याः॥ किञ्चित्सवातं विनिहन्ति पित्तं कलायका मुद्गसमानरूपाः॥३०॥ मटर कछुक कसैला है, मधुर है,रक्तको शांत करता है,बलमें हित है, वातको और पित्तको कछुक नाशता है, यह मूंगके समान रूपवाला होता है ॥ ३० ॥ अथ मसूरका गुण । रूक्षो विशोषी मधुरः प्रदिष्टः शूलार्त्तिगुल्मग्रहणीविकारान् ॥ करोति वातामयवर्द्धनं च पित्तासृजं ग्राहहरो मसूरः ॥३१॥ मसूर रूखा है,शोषी है,मधुर है और शूल,गुल्म और ग्रहणीदोष इनको करता है,वातरोगको बढ़ाता है, पित्त रक्तको उपजाता है, कब्जको नाशता है ॥ ३१ ॥ अथ धान्यवर्गका उपसंहार । इति प्रदिष्टो बहुधान्यवर्गो ग्रन्थस्य विस्तारभयाच्च किञ्चित् ॥ ये ये प्रसिद्धाःसुतरां हि लोके तेषां गुणाः श्रेष्ठतमाः प्रदिष्टाः ॥३२॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने धान्यवर्गो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस तरह धान्यवर्ग बहुत है किन्तु विस्तारके भयसे जो जो प्रसिद्ध और श्रेष्ठ हैं उन्हींके गुण कहे हैं ॥ ३२ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथम- स्थाने धान्यवर्गो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । (८९) षोडशोऽध्यायः १६. अथ शाकवर्ग । शाकं चतुर्विधं प्रोक्तं पत्रं पुष्पं फलं तथा ॥ कन्दं चापि समुद्दिष्टं वक्ष्याम्येतत्पृथक्पृथक् ॥ १ ॥ द्विविधं शाकमुद्दिष्टं गुरु विद्यात्त- थोत्तरम् ॥ प्रायः सर्वाणि शाकानि विष्टम्भीनि गुरूणि च ॥ २ ॥ रूक्षाणि बहुवर्चांसि सृष्टविण्मरुतानि च ॥ पत्र, पुष्प, फल, कंद इन भेदोंसे शाक चार प्रकारका कहा है उसे पृथक् पृथक् कहता हूँ ॥ १ ॥ शाक २ प्रकारका कहा है इनमें उत्तरोत्तर भारी है अर्थात् कन्द सबसे भारी है और विशेष करके सब शाक विष्टम्भको करती हैं, भारी हैं ॥ २ ॥ रूखी हैं बहुत मलवाली हैं विष्ठा और अधोवातको करती हैं । अथ पृथक् पृथक् शाकोंके गुणदोष । जीवंती शाकके गुण । चक्षुष्या सर्वरोगघ्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥ ३ ॥ जीवंती शाक नेत्रोंमें हित है, सब रोगोंको नाशती है, मधुर और शीतल है ॥ ३ ॥ अथ चौलाई शाकके गुण । स्वादुपाकमसृक्पित्तविषघ्नं तण्डुलीय कम् ॥ विविधवातविड़्हन्ता मूत्रवातकफे हितः ॥ ४ ॥ चौलाई शाक पाककालमें स्वादु है और रक्तपित्त और विष इनको नाशती है, अनेक प्रकारके वात और विष्ठाको हरती है और मूत्र, वात और कफ इनमें हित है ॥ ४ ॥ अथ कासविंदाके शाकके गुण । मधुरः कफवातघ्नः पाचनः कण्ठशोधनः ॥ विशेषतः पित्तहर इत्युक्तः कासमर्दकः ॥ ५ ॥ कासविंदाशाक मधुर है, कफको और वातको नाशता है, पाचन है, कंठको शोधता है और विशेष करके पित्तको हरता है ॥ ५ ॥ अथ जयंती और मकोह शाकके गुण । जयंती वातकफकृत्पित्तसंशमनी तथा ॥ त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी ॥ ६ ॥

( ९० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- जयंती शाक वातको और कफको करता है, पित्तको शांत करता है । मकोह विशेष शाक त्रिदोषकों शांत करता है, वीर्यमें हित है और रसायन है ॥ ६ ॥ अथ बथुवा और चिल्ली शाकके गुण । वास्तुकं मधुरं हृद्यं वातपित्तार्शसां हितम् ॥ तद्वच्चिल्ली तु विज्ञेया वातपित्तविकारिणाम् ॥ ७ ॥ बथुवा शाक मधुर है, हृदयकी हित है, वात, पित्त और बवासीरवालोंको हित है । चिल्लीशाक भी बथुवाके समान गुणोंको देता है परंतु वात पित्तके विकारवालोंको अच्छा है ॥ ७ ॥ अथ केंतकी आर मेथी शाकके गुण । केतकी वातला वृष्या तन्द्रानिद्राकरी मता ॥ मेथिका वातशमनी वेजिका वातला मता ॥ ८ ॥ केतकीशाक वातल है, वीर्यमें हित है, तद्राको और नींदको करता है । मेथी शाक वातकों शांत करता है । वेजिका शाक वातको करता है ॥ ८ ॥ अथ सरसों और सापके शाकका गुण । सार्षपं च त्रिदोषघ्नं रुचिदं चाग्निवर्द्धनम् ॥ शतपुष्पा त्रिदोषघ्नी मेध्या पथ्या रुचिप्रदा ॥ ९ ॥ सरसोंका शाक त्रिदोषको नाशता है, रुचिको देता है, अग्निको बढाता है, सौंफका शाक त्रिदोषको नाशता है, पवित्र है, पथ्य है, रुचिको देता है ॥ ९ ॥ अथ कटेली और कुसुंभा शाकके गुण । जरांत्री सिंहिका प्रोक्ता सातीसारे प्रशस्यते ॥ कुसुम्भं रुचिकृद्वा- तं हन्ति बल्यं रुचिप्रदम् ॥ १० ॥ किञ्चिद्वातावहं स्वादु वि- पाके च कफापहम् ॥ किञ्चिच्चाम्लं भवेत्क्षारं प्रशस्तमग्निमान्द्य- के ॥ ११ ॥ भेदनं रूक्षमधुरं कषायमतिवातलम् ॥ कटेलीका शाक वृद्धतासे रक्षा करता है, अतिसारमें श्रेष्ठ है । कुसुंभाका शाक रुचिको करता है, वातको हरता है और बलमें हित है, प्रीति बढ़ाता है ॥ १० ॥ कुछ उदरमें वातको करता है, पाककालमें चूका स्वादु है, कफको हरता है, कुछ खट्टा है, खारा है और मंदाग्निमें श्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ भेदन है, रूखा है, मधुर है, कसैला है, अति वातल है । अथ चांगेरी शाकके गुण । उष्णा कषायमधुरा चाङ्गेरीवह्निदीपनी ॥ १२ ॥ चांगेरी ( लोणी ) शाक गरम है, कसैला है, मधुर है और अग्निको जगाता है ॥ १२ ॥ १. जरया वृद्धावस्थया त्राय्यत इति जरात्री ।

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ९१ ) अथ दूसरे शाकोंके गुण । कफादनी तथा फञ्जी तिलपर्णी तु सिंहिका ॥ चक्रमर्दन इत्यन्ये दुर्जरा वातकोपना ॥ १३ ॥ कफादनी, फंजी,तिलवन,सिंहिका,चकोंड़ा ये शाक दुर्जर हैं और वातको कोपते हैं ॥ १३॥ अथ कफकारक और वातल शाक । पिण्डालुको बला भिण्डी चिञ्चुकान्या बलादनी ॥ एते श्लेष्मकराः शाका वातलाग्निप्रशान्तकाः ॥ १४ ॥ श्वेतारतालु, खरेंहटी, भिंडी चिंचुका, बलादनी ये शाक कफको करते हैं, वातल हैं, अग्निको मंद करते हैं ॥ १४ ॥ अथ शाकोंके विशेष गुण । सर्वे शाका दृष्टिहरा वीर्य्यत्वात्तण्डुलीयकम्॥तथैव शतपुष्पं च जयन्ती कासमर्द्दकम्॥१५॥आलुषंकं च वेताग्रं गुडूची चाप- मर्दकम् ॥ किराततिक्तसहितास्तिलाः पित्तहरा मताः ॥१६॥ सब शाक दृष्टिको हरते हैं और वीर्यपनेसे चौलाई, सौंफ, जयंती, कासविंदा ॥ १५ ॥ आळू, बेंतकी कोपल, गिलोय, चापमर्दक, चिरायता ये शाक कडुवे हैं और पित्तको हरने- वाले माने हैं ॥ १६ ॥ अथ अन्यप्रकारके शाक । कूष्माण्डकालिङ्गकलिङ्गचिर्भटं पटोलपुष्पं च तथैव तुण्डी ॥ बीजं तु कर्कोटककारवेल्लं कोशातकीवेल्लिफलानि चैव॥ १७॥ कुम्हडा, कलिंगड,: इंद्रजव, लाल तूबी, परवल, मीठी तोरी, ककोडा, करेला, कडुई तोरी, वेलिफल ये भी सब शाक कहे हैं ॥ १७ ॥ अथ कुम्हड़ाका गुण । कूष्माण्डं त्रिविधं ज्ञेयं बाल्यं मध्यं तथोत्तमम् ॥ वातघ्नं रोचकं बाल्यं मध्यमं स्यात्त्रिदोषहृत् ॥१८॥शोफं वातकफौ हन्ति रक्त- पित्तनिबर्हणम् ॥ १९ ॥ कुम्हडा ३ प्रकारका जानना एक बालक,दूसरा मध्य, तीसरा उत्तम । बालक कुम्हड़ा वातको नाशता है, रुचिको उपजाता है मध्यम । कुम्हड़ा त्रिदोषको हरता है ॥ १८ ॥ उत्तम कुम्हड़ा सोजा, वात और कफ इनको हरता है और रक्तपित्तको दूर करता है ॥ १९ ॥

( ९२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ कुकडूके शाकका गुण । कलिङ्गं कफकृद्वातकरणं पित्तनाशनम् ॥ २० ॥ तरबूजका शाक कफको करता है, वातको हरता है और पित्तको नाशता है ॥ २० ॥ अथ करेलाका गुण । कारवेल्लश्च वातघ्नः कफघ्नः पित्तकारकः ॥ उष्णो रुचिकरः प्रोक्तो रक्तदोषकरो नृणाम् ॥ २१ ॥ करेला वातको नाशता है, कफको हरता है, पित्तको करता है, गरम है, रुचिको करता है और मनुष्योंके रक्तके दोषको करता है ॥ २१ ॥ अथ लालतूरीके पुष्पका गुण । पुष्पं तु चैर्भटं चैव दोषत्रयकरं स्मृतम् ॥ अपक्वं जीर्णकफकृत्पक्वं किंचिद्विशिष्यते ॥ २२ ॥ तूंबाका फूल त्रिदोषको करता है, नहीं पका हुआ अजीर्णको और कफको करता है और पकाहुआ कुछ विशेष अच्छा होजाता है ॥ २२ ॥ अथ तोरी, ककोडा, कडुई तोरीका गुण । तुण्डीरमग्निरुचिकृद्वातपित्तनिवारणम् ॥ कर्कोटकं त्रिदोषघ्नं रु- चिकृन्मधुरं तथा ॥ २३ ॥ कोशातकीफलं स्वादु मधुरं वातपि- त्तनुत् ॥ विपाके च कफं हन्ति ज्वरे शस्तं प्रदिश्यते ॥ २४ ॥ तोरी शाक अग्निको और रुचिको करता है, वातको और पित्तको दूर करता है । ककोड़ा त्रिदोषको नाशता है, रुचिको उपजाता है और मधुर है ॥ २३ ॥ कडुई तोरी स्वादु है, पाक- में मधुर है, वातको और पित्तको नाशती है, कफको हरती है और ज्वरमें श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥ अथ परवलका गुण । पटोलपत्रं विनिहन्ति पित्तं नालं कफघ्नं प्रवदन्ति धीराः ॥ फलं च तस्यास्तु त्रिदोषशान्तिं करोति नूनं ज्वरिणो हितं स्यात् ॥२५॥ परवलका पत्ता पित्तको हरता है और परवलका नाल कफको नाशता है और परव- लका फल त्रिदोषको शांत करता है और ज्वरवालेको निश्चय हित है ( ये सब वेलियोंके शाक कहे )॥ २५ ॥ अथ बैंगनका गुण । निद्राकरं प्रीतिकरं गुरु स्यात्सवातलं कासविकारकारि ॥ श्रेष्ठं सुदीर्घं कफवर्धनं च सश्वासकासारुचिवर्धनं च ॥ २६ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ९३ ) बैंगन नींदको और प्रीतिको करता है, भारी है, वातल है, खांसीके विकारको करता है और सुंदर, लंबा बैंगन श्रेष्ठ है, कफको बढ़ाता है और श्वास, खांसी, रुचि इनको बढ़ाता है ॥२६॥ अथ बड़ी कटेलीका गुण । तथा बृहत्याः फलमेव शस्तं सन्दीपनं स्यात्कफवातनाशनम् ॥ कण्डूविसर्पज्वरकामलानां तथारुचौ शस्तमिदं वदंति ॥ २७ ॥ बड़ी कटेलीका फल श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है, कफको और वातको नाशता है और खाज, विसर्प, ज्वर, कामला, अरुचि इनमें उत्तम है (ये फलशाकके गुण कहे) ॥ २७ ॥ अथ कंदशाक । कन्दशाकान्प्रवक्ष्यामि शृणु पुत्र पृथक्पृथक् ॥ सूरणः पिण्ड- पिण्डालू पलाण्डुर्गुञ्जनस्तथा॥२८॥ताम्बूलवर्णः कन्दःस्याद्धस्ति- कन्दस्तथापरः॥वराहकन्दश्चाप्यन्यः कन्दशाकाइमे स्मृताः२९ कंदशाकोंको पृथक् पृथक् कहता हूं । हे पुत्र ! सुन । जिमीकंद, पिंडशाक, आलू, प्याज, गाजर ॥ २८ ॥ रतालु, हस्तिकंद, वराहकंद ये कंदशाक कहे हैं ॥ २९ ॥ अथ जमीकंदका गुण । दीपनः सूरणो रुच्यः कफघ्नो विशदो लघुः ॥ विशेषात्सर्वपथ्यः स्यात्प्लीहगुल्मविनाशनः ॥ ३० ॥ जमीकंद अग्निको जगाता है, कफको नाशता है, रुचिमें हित है, सुंदर है,हलका है, विशेष करके पथ्य है, तिल्लीरोगको और गुल्मको नाशता है ॥ ३० ॥ अथ आम्लिकाकंदका गुण । आम्लिकायाः स्मृतः कन्दो ग्रहण्यर्शोहितो लघुः ॥३१॥ आम्लिका कंद हलका है, ग्रहणीदोष और बवासीरमें हित है ॥ ३१ ॥ अथ पिंडशाकका गुण । पिण्डको वातलः श्लेष्मी ग्राही वृष्यो महागुरुः ॥ पिंडशाक वातको करता है, कफवाला है, ग्राही है, वीर्यमें हित है, बहुत भारी है ॥ अथ आलूका गुण । पिण्डालुकः श्लेष्मकरः शुक्रवृद्धिकरो मृदुः ॥ ३२ ॥ पिंडालू कफको करता है, वीर्यको बढ़ाता है और कोमल है ॥ ३२ ॥ अथ प्याजका गुण । पलाण्डुर्वातकफहा शुक्रलः शूलगुल्मनुत् ॥ प्याज वातको और कफको नाशता है,वीर्यको बढ़ाता है,शूलको और गुल्मको नाशता है। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( ९४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ रतालूका गुण । ताम्बूलपर्णः कन्दः स्याच्छुक्रलो विशदो लघुः ॥ ३३ ॥ रतालूकंद वीर्यको बढ़ाता है, सुंदर है और हलका है ॥ ३३ ॥ अथ हस्तिकंदका गुण । हस्तिकन्दो गुरुर्ग्राही शुक्रवृद्धिप्रदो मतः ॥ हस्तिकंद भारी है, कब्जको करता है, वीर्यको बढ़ाता है ॥ अथ वाराहकंदका गुण । वराहकन्दश्चार्शोघ्नो वातगुल्मनिवारणः ॥ ३४ ॥ वराहकंद बवासीरको नाशता है, वातको और गुल्मको दूर करता है ॥ ३४ ॥ अन्ये तेऽज्ञातकन्दाश्च ते न प्रोक्ता मयाऽनघ ॥ सर्वेषां कन्द- शाकानां सूरणः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ३५ ॥ दीपनोऽर्शस्तथा गुल्म- क्रिमीप्लीहविनाशनः ॥ दद्रूणां रक्तपित्तानां कुष्ठानां न प्रशस्यते ॥ ३६ ॥ एते कन्दाः समाख्याताः श्रीमन्तो हि भिषग्वर ॥ ३७ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने शाकवर्गोनाम षोड- शोऽध्यायः ॥ १६ ॥ अन्य भी कंद हैं वे अप्रसिद्ध हैं इस वास्ते मैंने नहीं कहे हैं परंतु सब प्रकारके कंद शाकों- में जमीकंद श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥ और अग्निको जगाता है बवासीर, गुल्म, कृमिरोग, तिल्लीरोग इन्होंको नाशता है परंतु दद्रू रक्तपित्त और कुष्ठको अच्छा नहीं है ॥ ३६ ॥ हे वैद्यवर ! शोभासे युक्त हुए कंद मैंने अच्छी तरह कहे हैं ॥ ३७ ॥ इति बेरीनिवासिबुध- शिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने शाकवर्गो नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ सप्तदशोऽध्यायः १७. अथ फलवर्ग । आम्रं जम्बूश्च कोलश्च दाडिमामलकं तथा ॥ खर्जूरश्च परूषश्च मातुलुंगपियालजम् ॥ १ ॥ नारंगं वाल्मिका चैव द्राक्षा च करम- र्दकम् ॥ क्षीरिका मधुराश्चैव फलवर्गे प्रकीर्तिताः ॥ २ ॥

.अ० १७] भाषाटीकासमेता । (९५) आम, जामुन, बेर, अनार, आमला, छुहारा अथवा खजूरिया, फालसा, बिजौरा, चिरौंजी ॥ १ ॥ नारंगी, अमली, दाख, करौंदा, खिरनी, सुन्दर खजूर फल ये सब फलवर्गमें कहे हैं ॥ २ ॥ अथ आमके फलका गुण । अपक्वमाम्रं फलमेव शस्तं संग्राहि पित्तासृजि कोपनं च ॥ तथा विपक्वं मधुरं च चाम्लं भेद्यं सपित्तामयनाशनं च ॥ ३ ॥ कुछेक पका हुआ आमका फल श्रेष्ठ है, कब्जको करता है, पित्तको और रक्तको कोपता है और विशेष पका हुआ आमका फल मधुर है, खट्टा है, दस्तावर है और पित्तके रोगको नाशता है ॥ ३ ॥ अथ जामन बेर अनार चिरौंजीके गुण । जम्बूग्राही मधुरकफहा रोचनो वातहारी कोलं चाम्लं मधुरम- थवा श्लेष्मलं ग्राहि शस्तम्॥ श्रेष्ठं वातादिकरुजहरं दाडिमं चा- मयघ्नं तत्प्रोक्तं च मधुरमुदितं स्वादु राजादनं च ॥ ४ ॥ जामुनका फल कब्जको करता है, मधुर है, कफको नाशता है, रुचिको करता है और वातको हरता है । बेर खट्टा है अथवा मधुर है, कफको करता है, कब्जको करता है, सुन्दर है । अनारका फल श्रेष्ठ है, वात आदिकी पीडाको हरता है और रोगको नाशता है । खिरना मधुर है और स्वादु कहा है ॥ ४ ॥ अथ विशेषवर्णन । परूषककरहपीलुकानां पियालसिंहीकरमर्दकानाम् ॥ फलानि मेहं विनिहंति पित्तं हन्याच्च सर्वार्तुरसंधिवातम्॥५॥ फालसा, करहा, पीलू, चिरौंजी, कटेली, करौंदी इनके फल प्रमेहको और पित्तको हरते हैं और रोगीके संपूर्ण शरीरके वातको हरते हैं ॥ ५ ॥ अथ बिजौराका गुण । स्यान्मातुलुङ्गः कफवातहंता हन्ता क्रिमीणां जठरामयघ्नः ॥ संदुष्टरक्तस्य विकारपित्तसंदीपनः शूलविकारहारी॥६॥ श्वास- कासारुचिहरं तृष्णाघ्नं कण्ठशोधनम् ॥ दीपनं लघु रुच्यं च मातुलुङ्गमुदाहृतम्॥७॥त्वक् तिक्ता दुर्जरा तिष्या क्रिमिवात- कफापहा ॥ स्वादु शीतं गुरु स्निग्धं करहं वातापित्तजित्॥८॥ मध्यं श्लेष्मातकं छर्दिकफारोचकनाशनम् ॥ दीपनं लघु संग्राहि गुल्मार्शो हन्ति केशरम्॥ ९ ॥ पित्तमारुतहद्धातपित्तलं बद्धकेश- १ छन्दोभंगः प्रथमचरणेऽस्य पद्यस्य ।

( ९६ ) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- रम् ॥ हृद्यं वर्णकरं रुच्यं रक्तमांसबलप्रदम् ॥ १० ॥ शूलाजीर्ण- विरुद्धेषु मन्दाग्नौकफमारुते॥अरुचौ श्वासकासे च स्वरसोऽस्यो- पदिश्यते ॥११॥ रसोऽतिमधुरो हृद्यो वीर्य्यं पित्तानिलापहम्॥ कफकृद्दुर्जरः पाके मातुलुङ्गकटाहकः ॥ १२ ॥ चेतोहारी पृथ- गति कटुत्वं च धत्तेऽभितोऽयं हृद्रोगानाहगुल्मश्वसनकफकरो ग्रीष्मकालेऽपहन्ता ॥ १३ ॥ वीर्य्यकृच्चार्शहृत्काले स्यात्तथा क्रिमिहन्मतम्॥तिक्तं पुष्पं च बीजं च गुल्मनुत्स्यात्तथापरम् १४ बिजौरा कफको और वातको नाशता है और कृमिरोगको हरता है और पेटके रोगको दूर करता है, दूषित हुए रक्तविकारको और पित्तको दूर करता है अग्निको जगाता है, और शूल- विकारको नाशता है ॥ ६ ॥ और विजौराका फल श्वास, खांसी, अरुचि इनको नाशता है, तृषाको हरता है, कंठको शोधता है, अग्निको जगाता है, हलका है, रुचिमें हित है ॥ ७ ॥ विजौराकी छाल कडुई है, दुर्जर है, खट्टी है और कृमि, वात, कफ इनको नाशती है और बिजौराकी कोंपल स्वादु है, शीतल है, भारी है, चिकनी है, वातको और पित्तको जीतती है ॥ ८ ॥ और बिजौराका गूदा कफको नाशता है, छर्दिको और कफ और अरोचकको नाशता है और बिजौराका केसर अग्निको जगाता है, हलका है, कब्जको करता है, गुल्मको और बवा- सीरको नाशता है॥ ९ ॥ पित्तको और वातको हरता है और केसरसे संयुक्त हुआ बिजौराका फल पित्तको और वातको करता है, सुन्दर है, वर्णको करता है, रुचिमें हित है और रक्त, मांस, बल इनको देता है ॥ १० ॥ और बिजौराका स्वरस शूल, अजीर्ण, मन्दाग्नि, कफ, वात, अरुचि, श्वास, खांसी इनमें उत्तम है ॥ ११ ॥ और बिजौराका रस अति मधुर है, सुन्दर है, वीर्य्यको देता है, पित्तको और वातको नाशता है, कफको करता है और पाकका- लमें दुर्जर है ॥ १२ ॥ और चित्तको हरता है, तिससे पृथक् अति चरचरापनाको धरता है और हृद्रोग, अफारा, गुल्म, श्वास इनको अन्य कालमें करता है और गरमकालमें नाशता है ॥ १३ ॥ बिजौराके फूल और बीज सुन्दर कालमें वीर्य्यको करते हैं बवासीरको दूर करते हैं, कृमिको हरते हैं, कडुवे हैं और गुल्मको नाशते हैं ॥ १४ ॥ अथ निंबूका गुण। निम्बुकं क्रिमिसमूहनाशनं तीक्ष्णमुष्णमुदरग्रहापहम् ॥ वातपि- त्तकफशूलिनां हितं नष्टधान्यरुचिशोधनं परम् ॥ १५ ॥ त्रिदो- षसद्योज्वरपीडितानां दोषाश्रितानां च सवज्जलानाम् ॥ मल- ग्रहे बद्धगुदे हितं च विषूचिकायां मुनयो वदन्ति ॥ १६ ॥ १ " आहतातत्क्षणाकृष्टद्रव्यात्क्षुण्णात् समुद्धरेत् । वस्त्रनिष्पीडितो यः स रसः स्वरस उच्यते" ॥ २ चरणद्वयात्मकस्यास्य श्लोकस्य प्रथमे पादे मन्दाक्रान्ता द्वितीये स्रग्धरेति ।

अ० १७] भाषाटीकासमेता । (९७) नींबू कीड़ोंके समूहको नाशता है, तीक्ष्ण है, गरम है, पेटके कब्जको हरता है और वात, पित्त, कफ इनके शूलवालोंको हित है और नष्ट अन्नमें रुचिको शोधता है ॥ १५ ॥ त्रिदोष और तत्काल उपजे ज्वरसे पीड़ितको और दोषसे आश्रितोंको और पानी झरनेवालोंको और विष्ठाके बन्धमें और बद्ध गुदरोगमें और विसूचिका अर्थात् हैजाके भेदमें हित है ऐसे मुनिजन कहते हैं ॥ १६ ॥ अथ नारंगीका गुण । नारङ्गं स्वादु गुणोपपन्नं संदीपनं रोचकमर्शसां च ॥ त्रिदोषहच्छूलक्रिमीन्निहन्ति मन्दाग्निकासश्वसनापहारि ॥ १७॥ नारंगी फल स्वादु है, गुणवाला है, अग्निको जगाता है, बवासीरमें रुचिको उपजाता है और त्रिदोष, शूल, कृमि, मंदाग्निरोग, खाँसी, श्वास इनको नाशता है ॥ १७ ॥ अथ इमलीका गुण । अपक्वमम्लीफलमम्लमस्ति तदस्रपित्तामकरं विदाहि ॥ वातामये शूलगदे प्रशस्तं पक्वं तथा शीतगुणोपपन्नम् ॥ १८ ॥ कच्ची इमली खट्टी होती है, वह रक्तपित्त और आमके रोगोंको उत्पन्न करती है तथा विदाही होती है। पकी हुई इमलीका फल वातरोगमें और शूलमें श्रेष्ठ है और शीतल होता है ॥ १८ ॥ अथ दाखका गुण । द्राक्षाफलं मधुरमम्लकषाययुक्तं क्षारेण पित्तमरुतां कफहारि शीघ्रम् ॥श्रेष्ठं निहन्ति रुधिरामयदाहशोषमूर्च्छाज्वरश्वसनका- सविनाशकारि ॥ १९ ॥ कषायन्ना विपाके च द्राक्षा चैव कफे हिता ॥ २० ॥ दाख मधुर है, खट्टा है, कसैला है, खारेपनेसे पित्त, वात, कफ इनको शीघ्र हरता है, श्रेष्ठ है और रक्तरोग, दाह, शोष, मूर्च्छा, ज्वर, श्वासरोग, खांसी इनको नाशता है ॥ १९ ॥ और पाककालमें कसैलेपनेको नाशता है और कफमें हित है ॥ २० ॥ अथ नारियलका गुण । नालिकेरं सुमधुरं गुरु स्निग्धंच शीतलम् ॥ हृद्यं सबृंहणं बस्ति- शोधनं रक्तपित्तनुत ॥ २१॥ विष्टम्भि पक्वं मतिमन्नपक्वं कफवा- तलम् ॥ बृंहणं शीतलं वृष्यं नालिकेरफलं विदुः ॥ २२ ॥ नारियल मधुर है, भारी है, चिकना है, शीतल है, हृदयको हित है, धातुओंको पुष्ट करता है, बस्तिको शोधता है, रक्तपित्तको नाशता है ॥ २१ ॥ विष्टंभी है ये सब पके हुए के गुण हैं, हे बुद्धिमन् ! नहीं पका हुआ नारियल कफको और वातको करता है, धातुओंको बढ़ाता है, शीतल है और वीर्यमें हित है ॥ २२ ॥ ७

(९८) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ केलेके फलका गुण । हृद्यं मनोज्ञं कफवृद्धिकारि शान्तं च सन्तर्पणमेव बल्यम् ॥ रक्तं सपित्तं श्वसनं च दाहं रम्भाफलं हन्ति सदा नराणाम् ॥ २३ ॥ संग्राह्यपक्वं किल शीतलं च कषायकं वातकफं करोति ॥ विष्ट- म्भि बल्यं गुरु दुर्जरं च आरण्यरम्भाफलमेव तद्वत् ॥ २४ ॥ पकाहुआ केलेका फल हृदयको हित है, मनोहर है, कफको बढ़ाता है, शांतिको करता है, तृप्तिको करता है, बलमें हित है और रक्तपित्त, श्वासदोग, दाह इनको सबकालमें नाशता है ॥ २३॥ नहीं पका हुआ केलेका फल कब्जको करता है, शीतल है, कसैला है, वातको और कफको करता है, विष्टंभी है, बलमें हित है, भारी है, दुर्जर है और वनके केलेका फल भी इन्ही गुणोंवाला है ॥ २४ ॥ अथ कैथाका गुण । कपित्थकाम्लं मधुरं कषायं विषेधं गुरु ॥ कासातिसारहृद्रो- गच्छर्द्यामयकफापहम् ॥ २५॥ कपित्थं मधुरं शीतं कषायं ग्राहकं लघु ॥ २६ ॥ कैथा फलका आमचूर खट्टा है, मधुर है, कसैला हैं, दस्त बन्द करता है, भारी है और खांसी, अतीसार, हृद्रोग, छर्दि, और कफरोग, इनको नाशता है ॥ २५ ॥ कैथा मधुर है, शीतल है, कसैला है, कब्जको करता है और हलका है ॥ २६ ॥ अथ खजूरिया अथवा छुहारेका गुण । अपक्वं खर्जूरफलं त्रिदोषशमनं मतम् ॥ पक्वमेव हितं श्रेष्ठं त्रिदोषशमनं परम् ॥ २७ ॥ नहीं पका हुआ खजूरिया अथवा छुहारा त्रिदोषको शांत करता है और पका हुआ हितकर श्रेष्ठ है और निश्चय त्रिदोषकों शांत करता है ॥ २७ ॥ अथ सुपारीका गुण । कषायमधुरं भेदि पूगं पित्तकफापहम् ॥ २८ ॥ सुपारीका फल कसैला है, मधुर है, मलको पतला करता है, पित्तको और कफको नाशता है ॥ २८ ॥ अथ नागरपानका गुण । नागवल्लीदलं हृद्यं सुगन्धि कफवातजित् ॥ २९॥ नागरपान हृदयको हितकर है, सुगंधवाला है, कफको और वातको जीतता है ॥ २९ ॥ १ विषेण सीदत्यवसादं करोत्युदरस्येति ।