भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

( ८६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ श्यामक और कोदूके गुण दोष । श्यामाकः शोषणो रूक्षो वातलः कफवारणः॥ कोद्रवो रूक्षो ग्राही स्याद्रक्तपित्तविशोषणः ॥ १५ ॥ नाधिककफकृत् प्रोक्तो रुच्यः स्वादुः प्रकीर्तितः ॥ १६ ॥ श्यामक शोषनेवाला है, रूखा है,वातल है, कफको दूर करता है। कोदूं रूखा है, कब्जको करता है और रक्तपित्तको शोषता है ॥ १५ ॥ और कफकी अधिकताको नहीं करता है, रुचिमें हित है और स्वादु है ॥ १६ ॥ अथ विदलान्नका गुण । विदलान्नानि वक्ष्यामि शृणु पुत्र यथाक्रमम् ॥ यवगोधूमचण- का माषो मुद्गाढकी तथा ॥१७॥ मकुष्ठकः कुलत्थश्च मसूर- स्त्रिपुटस्तथा ॥ निष्पावकः कलायश्च विदलान्नं प्रकीर्त्तितम् १८ हे पुत्र ! विदल संज्ञक अन्नोंको कहता हूँ सुन । जव, गेहूं, चना, उड़द, मूग, तूरीअन्न॥ १७॥ मोठ, कुलथी, मसूर, चौला, रेवसारी, मटर इनको विदल अन्न कहते हैं ॥ १८ ॥ अथ जवोंका गुण । रूक्षः शीतो गुरुः स्वादुः कषायो मधुरो यवः ॥ वृष्यो ग्राही कफघ्नश्च स्यात्पित्तश्वासकासनुत् ॥ १९ ॥ जव रूखा है, शीतल है, भारी है, स्वादु है, कसैला है, मधुर है, वीर्यमें हित है कब्जको करता है कफको नाशता है, पित्त, श्वास और खाँसीको हरता है ॥ १९ ॥ अथ गेहूंका गुण । मधुरो गुरुविष्टम्भी वृष्यो बल्योऽथ बृंहणः ॥ ईषत्कषायो मधुरो गोधूमः स्यात्रिदोषहा ॥ २० ॥ गेहूँ मधुर है, भारी है, विष्टंभी है, वीर्यमें हित है, बलको करता है, धातुओंको बढ़ाता है, कुछ कसैला, मधुर है और त्रिदोषको नाशता है ॥ २० ॥ अथ तिलोंका गुण । तिलो विपाके मधुरो बलिष्ठः स्निग्धो व्रणालेपनपथ्य उक्तः ॥ बल्योऽग्निमेधाजननो वरेण्यो मूत्रस्य दोषापहरो गुरुश्च॥२१॥ तिलेषु सर्वेष्वसितः प्रधानो मध्यः सितो हीनतरास्तथान्ये २२॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu