हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १९] भाषाटीकासमेता । (८५) रुचिबलपुष्टिकरा मता॥७॥ कलमान्या लघुः पथ्या वातश्ले- ष्मविवर्द्धिनी ॥बिल्वजा मागधी पीता सामान्यास्ता गुणागुणैः ॥८॥ रुचिकृद्वलकृन्मूत्रदोषघ्नी च श्रमापहा ॥ दग्धग्रामाचले जाताः शालयो लघुपाकिनः ॥९॥ सुपथ्या बद्धविण्मूत्रा रूक्षाः श्लेष्मापकर्षिणः ॥ केदारप्रभवा वृक्षा वातपित्तविनाशिनः॥१०॥ रक्तपित्तविकारघ्ना वातलाः कफकारकाः॥देशे देशे विभिन्नानि नामानि परिलक्षयेत् ॥११॥ समान्गुणैश्च सर्वास्तान्भूमिभागो- द्भवान्विदुः॥१२॥शालयश्छिन्नरोहाश्च मूत्रला वातला हिमाः १३ रक्तशालिचावल त्रिदोषको नाशता है, नेत्रोंमें हित है, मूत्ररोगको नाशता है। महाशालि भारी है, धातुको पुष्ट करता है, नेत्रोंमें हित है, बलको बढ़ाता है ॥ ३ ॥ साठी शीतल है, भारी है, त्रिदोषको हरता है और मधुर है॥४॥जीरका वातको और पित्तको हरता है। कुलमा कफको और पित्तको नाशता है । कंपिंजला कफको करता है। मागधी कफको और वातको करता है ॥५॥ बिलवासी भारी है, पित्तको नाशता है, वीर्यको बढ़ाता है। शूकला पित्तको और बातको नाशता है। कंचोरा पित्तको नाशता है॥६॥ गरुडा वातको नाशता है,पित्तको और मूत्ररोगको हरता है। रुक्मवंती हलकी है और रुचि, बल,पुष्टि इनको करता है ॥७॥ अन्यप्रकारका कलमा हलका है, पथ्य है, वातको और कफको बढ़ाता है और बिल्वजा, मागधी, पीता ये तीनों गुण और दोषों करके समान हैं ॥८॥ खंजरीटा शालि रुचिको और बलको करता है, मूत्रदोषको नाशता है और परिश्रमको हरता है। दग्ध ग्राममें और पर्वतमें उपजे शालिचावल हलके पाकवाले हैं ॥९॥ खेतमें उपजे शालि चावल सुन्दर पथ्य हैं, विष्ठाको और मूत्रको बांधते हैं, रूखे हैं, कफको नाशते हैं, वातको और पित्तको नाशते हैं॥१०॥कोई शालि रक्तपित्तके विकारको नाशते हैं, वातल हैं और कफको करते हैं। इन शालियोंके नाम देशदेशमें भिन्न जानने ॥११॥ पृथिवीके भागोंसे उपजे सब प्रकारके शालि गुणोंसे समान जानने ॥ १२ ॥ रोया शालि मूत्रको उपजाते हैं, वातको उपजाते और शीतल हैं ॥ १३ ॥ अथ क्षुद्रधान्यवर्ग । श्यामाकः कोद्रवः कण्डूर्मर्कटी कपिकच्छुरा ॥ क्षुद्रधान्यमिदं प्रोक्तं शृणु पुत्र प्रवक्ष्यते ॥ १४ ॥ श्यामाक, कोदू, कंडू,मर्कटी अर्थात् मकडा, कपिकच्छुरा इन नामोंसे क्षुद्रधान्य कहा है,अब मैं कहता हूँ हे पुत्र ! सुन ॥ १४ ॥