भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

( ८४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने विसर्पहरा हृद्या कुष्ठरोगविनाशिनी ॥ २६ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने तैलवसावर्गो नाम चतुर्दशोऽध्यायः १४॥ वसा, चरबी, मज्जा अर्थात् हड्डियोंका स्नेह वातको नाशता है और बल, पित्त और कफ इनको देता है, सूकरकी और भैंसकी वसा वातको करती है और कफको बढ़ाती है ॥ २५ ॥ सर्प, नोला, गोहकी वसा लेप करनेसे घावको और कुष्ठको नाशती है और मच्छ, शिशुमार, मकरमच्छ, ग्राह आदिकी भी वसा लेप करनेसे घावको और कुष्ठको नाशती है परंतु यह वसा विसर्परोगको हरती है, हृदयको हित है और कुष्ठको विशेषकरके हरती है ॥ २६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने तैलवसावर्गो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ पञ्चदशोऽध्यायः १५. अथ धान्यवर्ग । प्रथम शालिचावलका वर्णन । रक्तशालिर्महाशालिः कलमा षष्टिकापरा ॥ खञ्जरीटा पसाही च जीरकान्या कपिञ्जला ॥ १ ॥ सौगन्धी शूकला चान्या बि- लंवासी कचोरका॥ गरुडा रुक्मवन्ती च कलमान्या तथापरा॥ बिल्वजा मागधी पीता ता अष्टादश शालयः ॥ २ ॥ रक्तशाली, महाशालि, कलमा, साठी, खंजरीटा, पसही जीरका, कपिञ्जला ॥ १ ॥ सौगंधी शूकला, बिलबासी, कचेरका, गरुडा, रुक्मवंती, कलमा, बिल्वजा, मागधी, पीता; ऐसे अठारह प्रकारके शालिचावल कहे हैं ॥ २ ॥ अथ शालियोंके गुण दोष । रक्तशालिस्त्रिदोषघ्नी चक्षुष्या मूत्ररोगहा ॥ महाशालिर्गुरुर्वृष्या चक्षुष्या बलवर्द्धिनी ॥३॥ शीता गुरुस्त्रिदोषघ्नी मधुरापरषष्टिका ॥ ४ ॥ जीरका वातपित्तघ्नी कलमा श्लेष्मपित्तहा ॥ कपिञ्जला श्लेष्मला स्यान्मागधी कफवातला ॥५॥ बिल्वासी गुरुश्चापि पित्तघ्नी शुक्रवर्द्धिनी ॥ शूकला पित्तवातघ्नी कचोरा पित्तनाशिनी ॥६॥ गरुडान्या च वातघ्नी पित्तमूत्रगदापहा ॥ रुक्मवन्ती लघु