हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ९० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- जयंती शाक वातको और कफको करता है, पित्तको शांत करता है । मकोह विशेष शाक त्रिदोषकों शांत करता है, वीर्यमें हित है और रसायन है ॥ ६ ॥ अथ बथुवा और चिल्ली शाकके गुण । वास्तुकं मधुरं हृद्यं वातपित्तार्शसां हितम् ॥ तद्वच्चिल्ली तु विज्ञेया वातपित्तविकारिणाम् ॥ ७ ॥ बथुवा शाक मधुर है, हृदयकी हित है, वात, पित्त और बवासीरवालोंको हित है । चिल्लीशाक भी बथुवाके समान गुणोंको देता है परंतु वात पित्तके विकारवालोंको अच्छा है ॥ ७ ॥ अथ केंतकी आर मेथी शाकके गुण । केतकी वातला वृष्या तन्द्रानिद्राकरी मता ॥ मेथिका वातशमनी वेजिका वातला मता ॥ ८ ॥ केतकीशाक वातल है, वीर्यमें हित है, तद्राको और नींदको करता है । मेथी शाक वातकों शांत करता है । वेजिका शाक वातको करता है ॥ ८ ॥ अथ सरसों और सापके शाकका गुण । सार्षपं च त्रिदोषघ्नं रुचिदं चाग्निवर्द्धनम् ॥ शतपुष्पा त्रिदोषघ्नी मेध्या पथ्या रुचिप्रदा ॥ ९ ॥ सरसोंका शाक त्रिदोषको नाशता है, रुचिको देता है, अग्निको बढाता है, सौंफका शाक त्रिदोषको नाशता है, पवित्र है, पथ्य है, रुचिको देता है ॥ ९ ॥ अथ कटेली और कुसुंभा शाकके गुण । जरांत्री सिंहिका प्रोक्ता सातीसारे प्रशस्यते ॥ कुसुम्भं रुचिकृद्वा- तं हन्ति बल्यं रुचिप्रदम् ॥ १० ॥ किञ्चिद्वातावहं स्वादु वि- पाके च कफापहम् ॥ किञ्चिच्चाम्लं भवेत्क्षारं प्रशस्तमग्निमान्द्य- के ॥ ११ ॥ भेदनं रूक्षमधुरं कषायमतिवातलम् ॥ कटेलीका शाक वृद्धतासे रक्षा करता है, अतिसारमें श्रेष्ठ है । कुसुंभाका शाक रुचिको करता है, वातको हरता है और बलमें हित है, प्रीति बढ़ाता है ॥ १० ॥ कुछ उदरमें वातको करता है, पाककालमें चूका स्वादु है, कफको हरता है, कुछ खट्टा है, खारा है और मंदाग्निमें श्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ भेदन है, रूखा है, मधुर है, कसैला है, अति वातल है । अथ चांगेरी शाकके गुण । उष्णा कषायमधुरा चाङ्गेरीवह्निदीपनी ॥ १२ ॥ चांगेरी ( लोणी ) शाक गरम है, कसैला है, मधुर है और अग्निको जगाता है ॥ १२ ॥ १. जरया वृद्धावस्थया त्राय्यत इति जरात्री ।