भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ९१ ) अथ दूसरे शाकोंके गुण । कफादनी तथा फञ्जी तिलपर्णी तु सिंहिका ॥ चक्रमर्दन इत्यन्ये दुर्जरा वातकोपना ॥ १३ ॥ कफादनी, फंजी,तिलवन,सिंहिका,चकोंड़ा ये शाक दुर्जर हैं और वातको कोपते हैं ॥ १३॥ अथ कफकारक और वातल शाक । पिण्डालुको बला भिण्डी चिञ्चुकान्या बलादनी ॥ एते श्लेष्मकराः शाका वातलाग्निप्रशान्तकाः ॥ १४ ॥ श्वेतारतालु, खरेंहटी, भिंडी चिंचुका, बलादनी ये शाक कफको करते हैं, वातल हैं, अग्निको मंद करते हैं ॥ १४ ॥ अथ शाकोंके विशेष गुण । सर्वे शाका दृष्टिहरा वीर्य्यत्वात्तण्डुलीयकम्॥तथैव शतपुष्पं च जयन्ती कासमर्द्दकम्॥१५॥आलुषंकं च वेताग्रं गुडूची चाप- मर्दकम् ॥ किराततिक्तसहितास्तिलाः पित्तहरा मताः ॥१६॥ सब शाक दृष्टिको हरते हैं और वीर्यपनेसे चौलाई, सौंफ, जयंती, कासविंदा ॥ १५ ॥ आळू, बेंतकी कोपल, गिलोय, चापमर्दक, चिरायता ये शाक कडुवे हैं और पित्तको हरने- वाले माने हैं ॥ १६ ॥ अथ अन्यप्रकारके शाक । कूष्माण्डकालिङ्गकलिङ्गचिर्भटं पटोलपुष्पं च तथैव तुण्डी ॥ बीजं तु कर्कोटककारवेल्लं कोशातकीवेल्लिफलानि चैव॥ १७॥ कुम्हडा, कलिंगड,: इंद्रजव, लाल तूबी, परवल, मीठी तोरी, ककोडा, करेला, कडुई तोरी, वेलिफल ये भी सब शाक कहे हैं ॥ १७ ॥ अथ कुम्हड़ाका गुण । कूष्माण्डं त्रिविधं ज्ञेयं बाल्यं मध्यं तथोत्तमम् ॥ वातघ्नं रोचकं बाल्यं मध्यमं स्यात्त्रिदोषहृत् ॥१८॥शोफं वातकफौ हन्ति रक्त- पित्तनिबर्हणम् ॥ १९ ॥ कुम्हडा ३ प्रकारका जानना एक बालक,दूसरा मध्य, तीसरा उत्तम । बालक कुम्हड़ा वातको नाशता है, रुचिको उपजाता है मध्यम । कुम्हड़ा त्रिदोषको हरता है ॥ १८ ॥ उत्तम कुम्हड़ा सोजा, वात और कफ इनको हरता है और रक्तपित्तको दूर करता है ॥ १९ ॥