हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ९३ ) बैंगन नींदको और प्रीतिको करता है, भारी है, वातल है, खांसीके विकारको करता है और सुंदर, लंबा बैंगन श्रेष्ठ है, कफको बढ़ाता है और श्वास, खांसी, रुचि इनको बढ़ाता है ॥२६॥ अथ बड़ी कटेलीका गुण । तथा बृहत्याः फलमेव शस्तं सन्दीपनं स्यात्कफवातनाशनम् ॥ कण्डूविसर्पज्वरकामलानां तथारुचौ शस्तमिदं वदंति ॥ २७ ॥ बड़ी कटेलीका फल श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है, कफको और वातको नाशता है और खाज, विसर्प, ज्वर, कामला, अरुचि इनमें उत्तम है (ये फलशाकके गुण कहे) ॥ २७ ॥ अथ कंदशाक । कन्दशाकान्प्रवक्ष्यामि शृणु पुत्र पृथक्पृथक् ॥ सूरणः पिण्ड- पिण्डालू पलाण्डुर्गुञ्जनस्तथा॥२८॥ताम्बूलवर्णः कन्दःस्याद्धस्ति- कन्दस्तथापरः॥वराहकन्दश्चाप्यन्यः कन्दशाकाइमे स्मृताः२९ कंदशाकोंको पृथक् पृथक् कहता हूं । हे पुत्र ! सुन । जिमीकंद, पिंडशाक, आलू, प्याज, गाजर ॥ २८ ॥ रतालु, हस्तिकंद, वराहकंद ये कंदशाक कहे हैं ॥ २९ ॥ अथ जमीकंदका गुण । दीपनः सूरणो रुच्यः कफघ्नो विशदो लघुः ॥ विशेषात्सर्वपथ्यः स्यात्प्लीहगुल्मविनाशनः ॥ ३० ॥ जमीकंद अग्निको जगाता है, कफको नाशता है, रुचिमें हित है, सुंदर है,हलका है, विशेष करके पथ्य है, तिल्लीरोगको और गुल्मको नाशता है ॥ ३० ॥ अथ आम्लिकाकंदका गुण । आम्लिकायाः स्मृतः कन्दो ग्रहण्यर्शोहितो लघुः ॥३१॥ आम्लिका कंद हलका है, ग्रहणीदोष और बवासीरमें हित है ॥ ३१ ॥ अथ पिंडशाकका गुण । पिण्डको वातलः श्लेष्मी ग्राही वृष्यो महागुरुः ॥ पिंडशाक वातको करता है, कफवाला है, ग्राही है, वीर्यमें हित है, बहुत भारी है ॥ अथ आलूका गुण । पिण्डालुकः श्लेष्मकरः शुक्रवृद्धिकरो मृदुः ॥ ३२ ॥ पिंडालू कफको करता है, वीर्यको बढ़ाता है और कोमल है ॥ ३२ ॥ अथ प्याजका गुण । पलाण्डुर्वातकफहा शुक्रलः शूलगुल्मनुत् ॥ प्याज वातको और कफको नाशता है,वीर्यको बढ़ाता है,शूलको और गुल्मको नाशता है। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu